Monday, August 17, 2015

स्वीकार

स्वीकार 
———
पिछलग्गू रहा नहीं
अगुआ की चाह नहीं
अंदर घना अंधेरा है
बाहर निकलो
हाथ दो हाथ लो 
चल सको साथ चलो


             

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