Tuesday, August 18, 2015

भेड़िया न्याय

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भेड़िया न्याय 
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याद है पुरानी कहानी 
भेड़िये ने मेमने से क्या कहा था
गंदा क्यों कर रहा है पानी
भेड़िया जानता था
मेमना चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकता
मेमना ढलान पर था
भेड़िया ऊंचाई पर पर
भेड़िया तब भी जानता था
मेमना उसे पिछले वर्ष कैसे दे सकता था गाली
अजन्मा था मेमना 
भेड़िया कुतर्क न भी करता
गाली मेमने के बाप ने दी
बाप के बाप ने दी
यूँ ही उसे खा लेता तो क्या ग़लत होता 
मेमना आहार श्रृंखला में जायज़ भोजन था उसका
नैतिक / प्राकृतिक / धार्मिक / विधिक हर प्रकार से 
भेड़िये की पहचान उजागर थी
बिना बात बिना तर्क भी खा सकता था
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भेड़ियों का कायाकल्प हुआ 
भेड़ियों ने मुखोटे पहने  
भेड़ों के भेष धरे 
धार्मिक परिवेश ओढ़े
अन्याय की कुर्सी पर जा बैठे
हँस रहे अपनी बदली भूमिका पर
रणनीतिक कुटिलता पर
जिसका जब जहाँ चाहें शिकार कर रहे 
जनतंत्र का गला सतत घोंट रहे.

🦉 जसबीर चावला















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