Sunday, January 27, 2019

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट


बेर्टोल्ट ब्रेष्ट
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जनरल तुम्हारा टैंक एक शक्तिशाली वाहन है
वनों को तहस नहस करता है
सैकडों लोगों को खत्म करता है 
पर इसमें एक दोष है
इसे चालक चाहिये
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जनरल तुम्हारा बमवर्षक शक्तिशाली हैं
यह तूफ़ान से तेज उड़ता हैं
और हाथी से अधिक वज़न ढोता है
पर इनमें एक दोष है
इसे एक मिस्त्री चाहिये
               ——
जनरल मानव बहुत उपयोगी है
वह उड़ सकता है मार सकता है
पर उसमें एक दोष है
वह सोच सकता है
                 ~~
*बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (महान जर्मन कवि और नाटककार)
*अंग्रेजी से अनुवाद : जसबीर चावला 

Thursday, January 24, 2019

१५० साल पहले सामाजिक क्रांति की मशाल जलाती तीन डाक्टर नायिकाएँ

१५० साल पहले सामाजिक क्रांति की मशाल जलाती तीन डाक्टर नायिकाएँ
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                                       🔴 जसबीर चावला🔴
🔵 नायिका क्रमांक एक : रुखमाबाई (22 नवंबर 1864-25 सितंबर 1955) का नाम सामने आते एक विद्रोही महिला सामने आती है,जिसनें जिसनें 150 वर्ष पूर्व रूढीवादी हिंदू समाज का विरोध किया,अपनी मर्जी के बिना हुए बाल विवाह को चुनोती दी,तलाक लिया और पढ़ाई कर पहली महिला चिकित्सक बनी।ओपनिवेशिक काल में बाल विवाह की सामाजिक चुनोती से तब उसनें परंपरागत हिंदू समाज की चूलें हिला दी।
रुखमाबाई का जन्म मराठी सुतार जाति के जनार्दन पाँडूरंग और जयंतिबाई के घर हुआ था।जन्म के 2 वर्ष बाद उसके पिता चल बसे।तब उसकी माँ कि उम्र 17 थी।पिता कि मृत्यु के 6 वर्ष बाद उसकी माँ ने समाज सुधारक, ख्यात डाक्टर,विधुर सखाराम से पुनर्विवाह कर लिया।रुखमा का विवाह 11 वर्ष की उम्र में 19 वर्ष के दादाजी भीखाजी से हुआ।दादाजी भीखाजी से उम्मीद थी कि वह शिक्षा लेकर,कामकाजी और ''अच्छा आदमी" बनेगा। वह घरजँवाई बन कर रह रहा था.6 माह बाद जब रुखमाबाई किशोरी हो गई तो पति नें चाहा कि 'गर्भाधान' की परंपरागत रस्में हो जायें।ससुर और सुधारक डॉ सखाराम अर्जुन नें उसके रंगढंग देख कर साफ मना किया।
इस बीच दादाजी की माँ की मृत्यु हो गई और वह डॉ सखाराम अर्जुन की इच्छा के विरुद्ध अपनें मामा के घर आ गया।वह 20 वर्ष का होकर कालेज में पढनें की उम्र में 6 टी क्लास में पढ़ना नहीं चाहता था।"अच्छा आदमी" बनने का दबाव भी उसे पसंद नहीं था।उसनें क़र्ज़ा कर लिया था,जिसे वह रुखमा कि संपत्ति बेच कर चुकाना चाहता था।मामा के घर के वातावरण से वह और उच्छृंखल बन गया।
उधर रुखमाबाई नजदीक के चर्च की लायब्रेरी से पुस्तके घर लाकर पढने लगी।वह माँ के साथ नियमित जाती,और वहाँ पिता के समाज सुधारक भारतीय-युरोपियन, महिला-पुरुष मित्रों की संगत से उसका मानसिक विकास तेजी से होनें लगा।वह आर्य महिला समीति की बैठकों में जाती।उसनें पिता के समर्थन से पति के घर जाकर रहनें से स्पष्ट इंकार किया।इस पर दादाजी नें 1884 वकीलों के माध्यम से उसे दंपत्ति की तरह रहने अर्थात "वैवाहिक संबंधों का पुनर्स्थापन" के लिये कानूनी नोटिस भेजा।जवाब में रुखमाबाई की तरफ से डॉ सखाराम अर्जुन नें वकीलों द्वारा जवाब भेज कर उसे भेजनें से पुन:मना किया।
उसके पति नें 1885 में अदालत का सहारा लिया।मामला जज राबर्ट हिल पिन्हे के पास आया।जज ने निर्णय में लिखा कि इंग्लिश कानून के अनुसार "वैवाहिक संबंधो का पुनर्स्थापन" Restitution Of Conjugal Rights यहाँ लागू नहीं होगा और हिंदू कानून में भी ऐसी कोई मिसाल नहीं है।लिखा कि रुखमाबाई बच्ची है और उसकी तुलना वयस्क महिला से नहीं की जा सकती।उसकी शादी अबोध "असहाय बच्चे" की शादी है।अत:दादाजी का केस ख़ारिज हो गया।
जज पिन्हे के बाद मामला अपील के लिये जज सर चार्ल्स सार्जेंट और एल एच बेले के पास आया,जिन्होंने फैसले को बरकरार रखा।इस बीच देश में इस फैसले को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई।निर्णय की कटू आलोचना होनें लगी।कहा गया कि यह हिंदूओं के खिलाफ है।जज हिंदू कानून कि पवित्रता नहीं जानते।हिंदू संवेदनशीलता का आदर नहीं किया।जज आक्रामक तरीके से समाज सुधार करना चाहते है।सार्वजनिक बहस विवाद के कई बिंदुओं के आसपास घूमती रही।'हिंदू बनाम अंग्रेजी कानून','बाहरी बनाम अंदर से सुधार','प्राचीन हिंदू रीति-रिवाजों का सम्मान हुआ या नहीं' 'सामाजिक सुधार बनाम रुढिवाद' जैसे मसलों पर भारत और इंग्लेंड में खूब बहस हुई।
फैसले कि कटू आलोचना करनें वालों में 'बाल गंगाधर तिलक' भी थे जो अपने समाचार पत्र 'मराठा' में और विश्वनाथ नारायण मांडलिक अपनें एंग्लो-मराठी साप्ताहिक में निरंतर लिख रहे थे।उधर रुखमाबाई के पक्ष में 'टाईम्स ऑफ इंडिया 'कई लेख छपे।कई माह बाद पता चला कि इन लेखों को रुखमाबाई खुद छ्दम नाम से लिख रही थी।लार्ड किपलिंग नें भी बहस में भाग लिया4 मार्च 1887 को न्यायमूर्ति फ्रान ने दादाजी की अपील हिंदू लॉ की रोशनी में स्वीकार करते हुए रुखमाबाई को पति के घर जाने या छै माह की क़ैद की सजा का आदेश दिया।रुखमा तब 23 वर्ष की थी।उसनें पति के बदले जेल जाना पसंद किया।इस फैसले से देश में सामाजिक बहस फिर गर्मा गई।तिलक नें 'केसरी' में लिखा "हिंदुत्व खतरे" में है,और यह अंग्रेजी शिक्षा का दुष्परिणाम है।मैक्स मुलर ने लिखा कि ऐसे मामलों का कानूनी हल नहीं होता और यह शिक्षा का सुपरिणाम है कि रुखमा पढ़ लिख कर स्वनिर्णय लेनें में सक्षम हो सकी।देश विदेश के समाचार पत्रों,पत्रिकाओ में खूब लिखा गया।अनेकों चिंतको,कानूनविदों ने बहस में भाग लिया।महिलाओं के पक्ष में ढेरों आवाजें उठी।इस बहस के कारण ही 1991 के कानून में महिलाओं की विवाह की उम्र 10 से बढ़कर 12 हुई।
पति से तलाक रुखमाबाई के जीवन का दूसरा मोड़ साबित हुआ।कुशाग्र रुखमाबाई ने पढ़ने में मन लगाया।कामा हास्पीटल के डॉ एडिथ पेचे ने उसे समर्थन दिया और उसके लिये पैसों का इंतज़ाम भी किया।इंदौर के तत्कालिन राजा 'शिवाजीराव होल्कर' ने "रुढिवाद के विरुद्ध अदम्य साहस" के लिये उसे 500 रुपये दिये।"रुखमाबाई डिफ़ेंस कमेटी" बनी।एक्टिविस्ट इवा मेक लर्न और वाल्टर मेक लर्न ने सहायता कि।रुखमाबाई को इंग्लेंड में डाक्टरी पढनें के लिये मुहिम छेड़ दी गई।1889 में रुखमाबाई इंग्लेंड  चली गई और 1889 में उसने वहाँ "लंदन स्कूल ऑफ मेडिसीन फ़ार विमेन" से डॉक्टर ऑफ मेडिसीन की डिग्री प्राप्त की एवं "रायल फ्री हास्पीटल" से भी शिक्षा ली।प्रसंगवश कादंम्बिनी गांगुली और आनंदी गोपाल जोशी नें 1886 में मेडिकल डिग्री ली।मेडिकल प्रेक्टिस करनें वाली वह दूसरी भारतीय महिला बनी।
1895 में रुखमाबाई भारत लौटी और सूरत के महिला अस्पताल में "चीफ मेडिकल आफिसर" बनी।1918 उन्होनें राजकोट में महिला हास्पीटल में रहनें के बदले अपनी सेवा निवृति 1929 तक "विमेन मेडिकल सर्विस" को तरजीह दी।बाद में वे स्थाई रूप से मुंबई बस गई जहाँ हमारी इस नायिका की मृत्यु 25 सेप्टेम्बर 1955 को हुई।उन्होने पर्दा प्रथा के विरोध में पुस्तक लिखी।उनके जीवन पर मराठी में फ़ीचर फिल्म "डाक्टर रुखमाबाई" में बनी।उनके मुकदमें पर 2008 में Enslaved Daughters:Colonialism,Law and Women's Rights" नाम की पुस्तक सुधीर चंद्रा नें लिखी।2017 में गूगल ने उनके जन्म दिवस पर सम्मान में गूगल डूडल बनाया।
🔵 नायिका क्रमांक दो : कादंम्बिनी गांगुली (1861-1923) भारत की उन दो महिलाओं में से एक थी जिन्होनें न केवल भारत या दक्षिणी एशिया की प्रथम ग्रेजुएट महिला होनें का स्थान प्राप्त किया बल्कि सारे  ब्रिटिश साम्राज्य जिसके अंतर्गत संसार की एक चौथाई आबादी आती थी,की भी पहली महिला बनी।कलकत्ता शासकीय स्कूल के हेडमास्टर ब्रजकिशोर बसु जो,के यहाँ उनका जन्म हुआ था।उनके पिता प्रगतिशील विचारों के थे और ब्रम्होसमाज में सक्रीय थे।वे उसे पढ़ाना चाहते थे,लेकिन तात्कालिन रूढ़िवादी समाज में पढ़ना आसान नहीं था।लड़कियों का कोई स्कूल प्रायमरी लेवल के आगे नहीं था।तभी अवसर आया।ब्रिटिश महिला अन्नेट्टी सुशान अक्रोयड नें उनके पिता ब्रज किशोर बसु,द्वारकानाथ गांगुली और अन्य ब्रम्होसमाज के लोगों के सहयोग से 1872 में गर्ल्स हायस्कूल की स्थापना की,जिसमें कादंम्बिनी नें दाख़िला लिया।अन्नेट्टी सुशान द्वारा विवाह कर लेनें से संचालन में व्यवधान आया,लेकिन द्वारकानाथ गांगुली के प्रयासों से स्कूल पुन: 1876 में प्रारंभ हो गया।1878 में स्कूल 'बेथून स्कूल' में मर्ज़ हो गया।स्कूल नें कलकत्ता विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम अपनाया और कादंम्बिनी नें 1879 में इस स्कूल से पहली महिला के रूप में डिस्टिंकशन के साथ इंटर की परीक्षा पास की।1883 में कादंम्बिनी और एक बंगाली क्रिश्चियन छात्रा चंद्रमुखी बोस ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की।चंद्रमुखी बसु ने बाद में एम ए कर पहली महिला पोस्टग्रेजुएट होनें का सम्मान पाया।
सामाजिक कारणों से जब लड़कियाँ पढ़ाई से ड्राप ले रही थी,कादंम्बिनी ने कलकत्ता मेडिकल कालेज में एडमिशन के लिये अर्ज़ी दी।इसके पहले सरला बसु नाम की  छात्रा को एडमिशन नहीं मिला और वह मद्रास पढ़ने चली गई।कालेज छात्राओं को एडमिशन नहीं देना चाहता था।उनकी भी अर्जी ठुकरा दी। कालेज के कई अध्यापकों नें एडमिशन का विरोध किया।आखिर द्वारकानाथ गांगुली द्वारा कानूनी कार्रवाही के डर से कादंम्बिनी मेडिकल में दाख़िला लेनें में सफल हुई।महिलाओं का इतना विरोध था कि एग्जामिनर नें उन्हे जानबूझ कर फायनल में एक नंबर से फेल कर दिया।तब कालेज नें उन्हे अतिरिक्त एक नंबर देकर मेडिकल प्रेक्टिस के लिये स्वीकृति दी.19 वी शताब्दी में जब इंग्लेंड अमेरिका में भी महिलाओं का मेडिकल में प्रवेश एक कठीन कार्य था ऐसे में धारा के विपरीत जाकर अल्प विकसित गुलाम भारत में किसी महिला द्वारा सशक्त विरोध कर इस पेशे में जाना कादंम्बिनी की जीवटता को दर्शाता है।वह 1886 में 'GBMC'-'ग्रेजुएट ऑफ बंगाल मेडिकल कालेज कलकत्ता' बनी।वह साउथ एशिया की पहली मेडिकल ग्रेजुएट भी बनी।जल्दी ही कादंम्बिनी को 'लेडी डफ़रिन मेडिकल हास्पीटल' में 300 रुपयों के वेतन पर रख लिया गया।उनकी प्रायवेट प्रेक्टिस भी खूब चली।वे नेपाल के शाही परिवार की महिलाओं की डाक्टर भी रही।
रुढ़ीग्रस्त हिंदू समाज उनके प्रति घोर शंकालु,आलोचक और काम में बाधाएँ पैदा करता था।प्रसिद्ध बाँग्लाभाषी समाचार पत्र 'बंगबासी' उनके प्रति महिला होनें के कारण शत्रुता,नफरत और आलोचना का भाव रखता था।डाक्टर होनें के नाते उन्हें रात में भी मरीज़ों को देखने जाना होता था और अक्सर लौटनें में देर हो जाती।1891 में समाचार पत्र ने उन्हें वैश्या समान बताया।कादंम्बिनी,उनके पति और प्रगतिशील ब्रम्होसमाज नें मुक़ाबला किया और समाचार पत्र को अदालत में घसीट लिया।संपादक महेशचंद्र को 6 माह की सजा हुई और 100 रुपयों का जुर्माना भरना पड़ा।नौकरी के दौरान निंदा करते हुए उन्हें अप्रशिक्षित लिखा।कादंम्बिनी नें इसे चेलेंज माना और उच्च शिक्षा के लिये 1893 में ब्रिटेन चली गई।उसनें एडिनबर्ग से LRCP ग्लासगो से LRCS और डबलिन विश्वविद्यालयों से GFPS मेडिकल डिप्लोमा प्राप्त किये।वह भारत की पहली ऐसी महिला बनी जिसनें ब्रिटेन से मेडिकल की पढ़ाई डिस्टिंकशन के साथ की।कितनें लोगों को पता होगा कि आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में किसी महिला का दाख़िला होने के एक साल पूर्व ही एक भारतीय महिला कादंम्बिनी गांगुली कलकत्ता युनिवर्सिटी में दाख़िला ले चुकी थी। 
संयोग देखिये।पढ़ाई के दौरान उनका विवाह अपनें स्कूल के हेडमास्टर और संस्थापकों में में से एक,प्रगतिशील ब्रम्होसमाजी द्वारकानाथ गांगुली के साथ 21 वर्ष की आयु में हुआ।तब द्वारकानाथ गांगुली 39 साल के विधुर थे और उनके 6 बच्चे थे।उनसे भी दो बच्चे और हुए।इस विवाह का ब्रम्होसमाज सहित कईयों नें विरोध किया था।उनके पति की मृत्यु सन 1898 में हुई।

कादंम्बिनी न केवल प्रख्यात डाक्टर थी बल्कि प्रगतिशील समाज सुधारक भी थी।कढ़ाई कला में प्रवीण थी।राजनैतिक कार्यों में भाग लेती थी।उन्होंने शहरी महिलाओं के सर्वांगीण उत्थान के प्रति समर्पण के साथ साथ पति के साथ आसाम के चाय बगानों और बिहार की कोयला खदान महिला मज़दूरों के लिये भी काम किया।उन्हे उनके पति सहित महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये याद किया जाता है।वे पाँचवी 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' 1889 में महिला प्रतिनिधी बनी।1906 में बंगाल विभाजन के बाद कलकत्ता में महिलाओं के साथ एकजुटता पर कान्फ्रेंस की और 1908 तक इस संगठन की अध्यक्ष रही।दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी के सत्याग्रह के पक्ष में खुल कर आवाज उठाई।गाँधीजी की गिरफ़्तारी के विरोध में 'ट्रांसवाल इंडियन एसोसिएशन' बनाकर समर्थन दिया।1915 में कलकत्ता मेडिकल कालेज नें छात्राओं को कान्फ्रेंस में रोकने पर कादंम्बिनी नें जबरदस्त प्रतिरोध किया और कालेज को पालिसी बदलना पड़ी।अपनी मृत्यु के दिन 3 अक्टूबर 1923 को किसी मरीज को देख कर लौटी ही थी।कि थोड़ी देर में 61 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। 

🔵 नायिका क्रमांक तीन : बंबई निवासी 
आनंदीबाई गोपालराव जोशी नें (31 मार्च 1865 - 26 फरवरी 1887) संयुक्त राज्य अमेरिका में पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली से दो साल अध्ययन करके ग्रेजुएशन कर डिग्री प्राप्त करनें वाली पहली भारतीय महिला चिकित्सक बनीउसके पति का नाम गोपालराव जोशी था।आनंदी से उम्र में काफ़ी बड़ा होनें के बावजूद गोपालराव महिला शिक्षा का पक्षधर था और उस समय के हिसाब से प्रगतिशील भी।जब महिलाएँ कई कारणों से पतियों से पिटती थी,गोपालराव आनंदी को मेडिकल की पढ़ाई करने के लिये पीटता था।
मूल रूप से यमुना के नाम से,आनंदी जोशी का जन्म पुणे (महाराष्ट्र) में हुआ था।बाद में परिवार कल्याण आ गया।तब की प्रथानुसार माँ के आग्रह से उसकी शादी 9 वर्ष की उम्र में अपनें से 20 वर्ष बड़े विधुर गोपालराव जोशी से हुई,जो पोस्ट आफिस में क्लर्क था।शादी के बाद उसका नाम बदल कर आनंदी गोपाल जोशी हो गया।गोपालराव जोशी का नौकरी में स्थानांतरण होता रहता था और अंत में वे कलकत्ता नौकरी में आ गये।
चौदह वर्ष की आयु में,आनंदी ने एक लड़के को जन्म दिया,लेकिन चिकित्सीय देखभाल की कमी से बच्चा दस दिनों तक ही जीवित रहा।आनंदी के जीवन का यह एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और इसनें उन्हें चिकित्सक बनने के लिए प्रेरित किया।
गोपालराव ने प्रसिद्ध मिशनरी रायल वाईल्डर को 1880 में पत्र भेजा जिसमें अपनी पत्नी को डाक्टर बनाने और खुद के लिये अमेरिका में नौकरी की बात लिखी।वाईल्डर नें उसी पत्रावली को 'प्रिसटोन मिशनरी रिव्यू' में प्रकाशित करवा दिया।न्यू जर्सी की एक महिला थियोडिका कारपेंटर नें उसे पढ़ा।वह आनंदीबाई की लगन और पति के पत्नी के प्रति सोच से प्रभावित हुई और उसने आनंदीबाई जोशी को अमेरिका में आवास देनें का प्रस्ताव दिया।
जोशी दंपत्ति के कलकत्ता निवास के समय ही आनंदी का स्वास्थ गिरता जा रहा था।उसे चक्कर आने,सिरदर्द,बुखार ,साँस उखड़ने जैसी समस्या थी।थियोडिका कारपेंटर ने उसके लिये अमेरिका से दवाइयाँ भेजी।गोपालराव का स्थानांतरण सेरामपुर हो गया।उसनें आनंदी को गिरते स्वास्थ के बावजूद अकेले ही अमेरिका में मेडिकल की शिक्षा के लिये राज़ी कर लिया।वह उसे उच्च शिक्षा दिलाकर महिलाओं के लिये एक आदर्श स्थापित करना चाहता था।
जोशी दंपत्ति के इस निश्चय से भारतीय पंरपरावादी रुढ़ीग्रस्त समाज में जबरदस्त हलचल शुरु हुई और उनका विरोध हुआ।आनंदी नें सेरामपुर कालेज के हाल में लोगों को संबोधित कर बतलाया कि वह अमेरिका से मेडिकल की डिग्री क्यों लेना चाहती है।उसनें महिलाओं को मेडिकल सहायता न मिलनें,अपनें बच्चे की मौत,अपने गिरते स्वास्थ पर चर्चा की और कहा कि डाक्टर बनकर वह मेडिकल कालेज खोलेगी।उसके भाषण की सारे देश मे खूब चर्चा और स्वागत हुआ।उसे अमेरिका भेजनें के लिये लोगों ने दान दिया।अमेरिका के एक डाक्टर थोरबन दंपति ने सुझाया कि उसे "वुमनस् मेडिकल कालेज ऑफ  पेन्सिलवेनिया" में जाना चाहिये।
आनंदी नें "वुमनस् मेडिकल कालेज ऑफ  पेन्सिलवेनिया" के डीन से सम्पर्क किया और उन्हे एडमिशन मिल गई।आनंदी 1883 में कलकत्ता से जहाज से न्यूयार्क रवाना हुई और जहाँ उनका स्वागत थियोडिका कारपेंटर परिवार ने किया।आनंदी ने मेडिकल कालेज में 19 वर्ष की उम्र में पढाई शुरु की।उसका स्वास्थ वहाँ भी ठीक नहीं रहता था।खानपान कि विभिन्नता और ठंड के कारण उसे टी बी हो गई।फिर भी जीवट और उत्साह से लबरेज़ आनंदी ने 1885 में "ग्रेजुएट विथ एम डी" कर ली।उसकी थिसिस का विषय था "हिंदू महिलाओं में प्रसूति की समस्याएँ"।महारानी विक्टोरिया ने उसके डाक्टर बनने पर बधाई का तार भेजा।
1886 के अंत में,आनंदी भारत लौटी।देश में उनका भव्य स्वागत हुआ।कोल्हापुर के राजा नें उन्हें 'अलबर्ट एडवर्ड अस्पताल' में महिला वार्ड की चिकित्सा प्रभारी नियुक्त किया।दुर्भाग्य,अगले ही वर्ष 26 फरवरी 1887 को 22 साल की उम्र में,उनकी मृत्यु टी बी से हो गई।उनकी मृत्यु से देश में शोक छा गया।अमेरिका में उनका मित्र परिवार थियोडिसिया कारपेंटर भी दुखी थे।उन्होंने उनकी राख को अमेरिका बुला कर न्यूयार्क के 'अपनें परिजनों की क़ब्रों के साथ ग्रामीण क़ब्रिस्तान' में दफ़नाया।
खगोल शास्त्रियों ने आनंदी जोशी को इसी वर्ष 2018 में अंतरिक्ष में अमर कर दिया है।शुक्र ग्रह का एक क्रेटर (सुप्त ज्वालामुखी का मुख) जो कि 34.3 वर्ग किलोमीटर का होकर,उत्तर में 5.5 अक्षांस और पूर्व में 288.8 देशांतर है,का नाम 'जोशी' रखा गया है।दूरदर्शन ने उनके जीवन पर "आनंदी गोपाल जोशी" नाम का सिरियल बनाया।1888 में अमेरिकन नारीवादी लेखिका कैरोलिन वेल्स नें और डॉ.अंजली कीर्तनें नें उनके जीवन पर पुस्तकें लिखी। 'दि इंस्टिट्यूट फ़ॉर रिसर्च एंड डाक्युमेंटेशन इन सोशल सायंस' लखनऊ मेडिसीन में विशिष्ट योगदान देनें वालों को 'आनंदीबाई पुरस्कार' देता है।महाराष्ट्र सरकार उनके नाम से मेडिकल में फ़ेलोशिप देती है।इसी वर्ष 2018 गुगल नें उनके सम्मान में गूगल डूडल बनाया है।

कौन थी विश्वयुद्ध में जासूसी करने वाली भारतीय राजकुमारी नूर

कौन थी विश्वयुद्ध में जासूसी करने वाली भारतीय राजकुमारी नूर 
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                         🔵 जसबीर चावला 🔵

यह गाथा है भारतीय मूल की एक ऐसी खूबसूरत लड़की कि,जिसका परिवार भारत की आजादी के बहुत पहले से ब्रिटेन में रहनें के कारण वह वहाँ का नागरिक है।लड़की का मन बच्चों सा निश्छल और करुणामय,है।वह बुद्ध और गाँधीजी के नान वायलेंस मिशन से प्रभावित है।कई भाषाओं की जानकार है।वीणा और पियानों दोनों खूब बजा लेती है।कलात्मक रुचियों की धनी,अपनें सूफी गुरु पिता के मानवतावादी विचारों की है।लड़की का पूरा नाम है नूर-उन-निसा इनायत खान।अचानक द्वितीय विश्व युद्ध में नाजियों द्वारा फ्रांस पर आक्रमण के बाद नूर की ज़िंदगी बदल जाती है।परिस्थितियों के दबाव नें नूर को ब्रिटेन की तरफ से लडाई की नई भूमिका में उतार दिया।युद्ध और अहिंसा,कला की दोहरी मानसिकता के कारण वह कई बार कठोर निर्णयों के दौरान असमंजस में पड़ जाती है।

नूर का जन्म 1 जनवरी 1914 को मास्को में हुआ।पिता इनायत खान भारतीय मूल के अभिजात्य,उदार वादी मुस्लिम थे और इंग्लेंड में रहते थे।इनायत खान की माँ,नूर की दादी मैसूर के शासक रहे टीपू सुल्तान की वंशज थी इसलिये लेखिका शबानी बसु अपनी पुस्तक में नूर को प्रिंसेस लिखा।इनायत 1910 से वहाँ सूफी संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरु थे और युरोप,अमेरिका में सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश फैलाते थे।उनका विवाह 1913 में अमरीकी मूल की महिला रे बेकर से हुआ जो बदल कर अमीना बेगम हुआ।1921 में वे लंदन से पेरिस में आ गये और शानदार भवन 'फज़ल मंज़िल' में रहने लगे।उनकी आध्यात्मिक सूफी मान्यताओं का नूर पर आजीवन गहरा प्रभाव रहा।1927 में भारत की यात्रा के दौरान हजरत इनायत खान की मृत्यु हो गई।बेगम अमीना पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।महज तेरह वर्ष की उम्र में नूर अपनी माँ,भाइयों विलायत,हिदायत और बहन खैर-उन-निसा की देखभाल करते हुए घर की मुखिया बन गईं।

नूर की प्रतिभाशाली थी और उसकी रुचियां विविध और कलात्मक थीं।उसने 1931 में लंदन में अध्ययन शुरू किया।रेडियो पेरिस और 'ले फिगरो' के लिए कहानियां लिखीं।बुद्ध की जातक कथाओं पर आधारित बच्चों के लिये कहानियाँ लिखी। बाल मनोविज्ञान अध्ययन के लिये एक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया।

जब जर्मनों ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो नूर अपनी अभिरुचियों को परे कर,इंग्लेंड में नवंबर 1940 में वायु सेना में महिला सहायक के रूप में भर्ती हो गई।उसने एडिनबर्ग में वायरलेस ऑपरेटर के रूप में छह महीने का प्रशिक्षण लिया।1942 में उन्नत वायरलेस कोर्स में भाग लिया।गुप्तचरी का यह उसका पहला प्रशिक्षण था। 

पाँच महीने बाद उसका नाम एसओई (स्पेशल आपरेशन एग्जिक्युटिव) के 'एफ' सेक्शन (फ्रेंच सेक्शन) में काम के लिये प्रस्तावित किया गया।एसओई के 'एफ' विभाग को ऐसे वायरलेस ऑपरेटरों की आवश्यकता थी जो धाराप्रवाह फ्रेंच बोल सकते हों और तकनीकी कौशल भी जानते हों।नूर इस पर खरी उतरती थी।उन दिनों इंग्लेंड के कई गुप्तचर फ्रांस पहुँचते ही जर्मन गेस्टापो द्वारा पकड़े गये थे,अत:दक्ष वायरलेस आपरेटरों की बहुत जरुरत थी।नूर ने इस चेलेंजिग जॉब को तुरंत हाँ कर दी।

फरवरी 1943 में उसका प्रशिक्षण शुरू किया तीन अन्य महिलाओं योलंडे नेकमैन,सेसिली लेफोर्ट और यवोन कॉर्मेउ के साथ वह छै पुरुषों की बैच में शामिल हुई।उसनें पहिचान छुपानें के लिये नर्स की ड्रेस पहनी।वहाँ तीन सप्ताह के पाठ्यक्रम में सशस्त्र और निहत्थे मुकाबला करना,वायरलेस और क्रॉस-कंट्री नेवीगेशन का गहन प्रशिक्षण शामिल था। प्रशिक्षण के दौरान दो अन्य महिला सैनिकों कि तुलना में नूर की रिपोर्ट उत्साहवर्धक नहीं थी।हाँलाकि वह दूसरों की अपेक्षा अधिक शारीरिक व्यायाम करती थी लेकिन दोहरी मानसिकता के कारण हथियारों से डरती भी थी।उसकी कठोर मेहनत पैराशूट प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त नहीं थी।आखिर उसने एसओई के रेडियो स्कूल और फिनिशिंग स्कूल में ट्रेनिंग ली।उसके प्रशिक्षक ने उसके स्वभाव के बारे में प्रशंसा करके हुए कहा कि उसमें गहरी नैतिक प्रतिबद्धता थी,लेकिन सच्चाई यह भी थी कि एसओई के सैनिकों को क्रूर निर्णय भी लेनें होते हैं।वहाँ मानवता,आदर्शवाद नहीं चलता।प्रशिक्षण के दौरान एक नक़ली हमले में वह दुश्मन द्वारा पकड़े जानें के दबाव का सामना नहीं कर सकी।उसकी योग्यता पर सवाल खड़े हुए,लेकिन एफ सेक्शन के प्रमुख बकमास्टर ने कहा कि दक्ष वायरलेस ऑपरेटरों की तुरंत आवश्यकता है और नूर जानें को भी इच्छुक है।वह चुनी गई।

नूर को कोड नाम 'मेडेलीन' देकर फ्रांस भेजा गया।वह बकमास्टर की टीम की पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर थी।उसकी झूठी पहचान एक आया की थी।उसका फ़्रेंच राशन कार्ड और परमिट बनवा कर उसे 'एल' गोलियाँ भी दी कि पकड़ी जाने पर निगल कर जान दे दे।नूर ने उत्तर-पश्चिमी फ्रांस में एक गुप्त लैंडिंग क्षेत्र के के लिये 'आरएएफ' के विमान से उड़ान भरी।उनकी तीनों साथी डायना राउडन,सेसिली लेफोर्ट,भी अलग जहाज से फ्रांस गई।वहाँ उनका इंतजार कर रहा ब्रिटिश गुप्तचर सेवा का हेनरी डेरीकोर्ट भी था,जो जर्मनी के लिये भी काम करने वाला डबल एजेंट था।उसके द्वारा गेस्टापो को पता था कि कब और कहाँ ये उड़ानें उतरेंगी।इन पर निगाह रखनें के लिये गेस्टापो ने अपनें जासूस नियुक्त कर दिये।

नूर को फ्रांस में एमिल गैरी के घर जाना था।एमिल गैरी ब्रिटिश गुप्तचर फ़्रांसिस सुट्टिल के 'प्रास्पर' नेट वर्क के आधीन था,जिसनें जासूसी का विशाल नेटवर्क पूरे उत्तरी फ्रांस में फैला रखा था।नूर का परिचय सुट्टिल,उनके वायरलेस ऑपरेटर गिल्बर्ट नॉर्मन और एंटेलम से हुआ।गिल्बर्ट नॉर्मन उसे अपने रेडियो ठिकाने पर ले गया,जहां से नूर ने अपने पहुँचने का पहला संदेश प्रेषित किया।अगले कुछ महीनों के दौरान बीस महत्वपूर्ण जानकारियाँ भेजी।
गुप्तचरी का काम ठीक चल रहा था कि अचानक आफत आ गई थी। 24 जून को घटनाओं की एक दुर्भाग्यपूर्ण श्रृंखला में सुट्टिल,नॉर्मन और सैकड़ो जासूसों को परिवारों सहित गिरफ्तार कर लिया।सुट्टिल का नेट वर्क 'प्रास्पर' ध्वस्त हो गया।गिरफ्तारी से बचने के लिये नूर,गैरी और अन्य गुप्तचरों ने नए सुरक्षित ठिकाने ढूँढे।जहाँ कई वायरलेस आपरेटर सुरक्षित जगहों पर चले गये वहीं नूर ने लंदन जानें के बजाय गोपनीय सूचनाएँ भेजनें के लिये वहीं रुकना बेहतर समझा।वह नेटवर्क फिर से खड़ा करना चाहती थी।यह एक तरह का अविवेकी निर्णय था,लेकिन एफ सेक्शन के लिए एक साहसी और निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण भी था।इतनी गिरफ़्तारियों के बाद स्थिति भ्रामक हो रही थी।नॉर्मन की गिरफ्तारी के बाद जर्मनों ने उसके कोड और वायरलेस सेट से इंगलेंड झूठे संदेश भेजे।लंदन में बकमास्टर भ्रांति में थे कि नार्मन मुक्त है या नहीं।उसने एक अधिकारी को पेरिस में स्थिति का आकलन करनें भेजा।हालत और बिगड़े जब उसका वायरलेस ऑपरेटर भी गेस्टापो ने पकड़ लिया।वे उससे नॉर्मन के सेट का उपयोग करवाने लगे।नूर का काम और भी महत्वपूर्ण हो गया।भारी वायरलेस सेट को सूटकेस में भरकर वह पेरिस की सड़कों पर वाहन से स्थान बदल बदल कर गोपनीय सूचनाएँ भेजती रही।
अगस्त में ग़द्दार हेनरी डेरीकोर्ट ने नूर के वायरलेस से कुछ गुप्तचरों को लंदन वापस उड़ान से भेजनें की बात की।नूर नें भी बकमास्टर को पत्र भेजा,लेकिन वह नहीं जानती थी कि गेस्टापो बहुत नज़दीक है।डेरीकोर्ट ने उसके गोपनीय दस्तावेज,पत्र,सूचनाएँ,और फ़ोटोग्राफ गेस्टापो के पास पहुँचा दिये थे।नूर को सुरक्षित ठिकाने छोड़कर पुराने दोस्तों के घरों पर शरण लेने का जोखिम उठाना पड़ा।बालों को डाई करके रंग बदलना और काले चश्मे पहन कर पहिचान छुपाना रोज का काम था।गेस्टापो से बचने के लिये नित्य की भागदौड़ ने उसे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत तोड़ा।बकमास्टर ने अक्टूबर के मध्य में उसके लंदन वापस लौटने के लिये उड़ान की व्यवस्था की पर वह उड़ान कभी नहीं पकड़ पाई।
चार महीनों तक जर्मनों के हाथों से बचनें के बाद नूर का दुर्भाग्य शुरु हो गया।गेरी की बहन रेमी ने उसकी गुप्त जानकारी जर्मन जासूसों को एक लाख फ्रेंक में बेच दी।दो जर्मन अधिकारियों ने भी बाद में स्वीकारा कि नूर को पकड़वाने के पीछे एक फ्रांसीसी महिला का हाथ था।
उसे फ्रांस में जर्मनों के एवेन्यू फॉक स्थित एसडी मुख्यालय में लाया गया।नूर ने वहाँ चालाकी की।स्नान करने के बहाने बाथरूम का दरवाजा बंद कर रोशनदान से बाहर निकल कर भागनें का प्रयास किया।वह पकड़ी गई।दुबारा उसने एमआई 6 के (ब्रिटिश सेना का गुप्तचर विभाग) के पूर्व प्रमुख स्टार और एसओइ के लोन फेय के साथ पाँचवे माले से भागनें का प्रयास किया।स्टार ने एक पेंचकस चुरा कर लोन फेय को और फेय नें नूर को,ताकि भाग सकें।कंबल और चादरें जोड़कर रस्सियाँ बनाई गई लेकिन नूर बाथरूम की राड हटा नहीं पाई।सारे काम में बहुत समय लग गया।सबेरे के तीन बज गये।तभी आरएएफ़ के विमानों ने हवाई हमला कर दिया।अफ़रा तफ़री मच गई।जर्मन चौकन्ने हो गये।बंदियों की सेल की तलाशी में बनाई रस्सियाँ मिल गई।फेय को तो भागते समय गोली से घायल कर पकड़ा गया।सारा प्लान फेल हो गया।
नूर से जर्मनों ने सूचनाएँ उगलवानें के लिये जबरदस्त मशक़्क़त की।इस पूछताछ से नूर ने अपनें प्रशिक्षण काल के सारे आलोचकों को गलत साबित कर दिया जिन्हे उसकी क्षमता में विश्वास नहीं था।पूछताछ करनें वाला जर्मन अर्नस्ट वोग्ट कोई भी सूचना नहीं निकाल सका।वायरलेस विशेषज्ञ जोसेफ गोएट्ज़ ने भी बाद में स्वीकार किया कि "मेडलेइन" से हमें कुछ नहीं मिला।युद्ध के बाद जर्मन एसडी कमांडों हेंस किफ़र ने भी पुष्टि की कि वे नूर की किसी भी सूचना पर भरोसा नहीं कर सके।
दूसरी बार भागने के प्रयास के बाद किफर गुस्से में था।उसनें उन सबको वहीं गोली मारने की धमकी दी और उसने फिर न भागनें का आश्वासन चाहा।स्टार ने तो हाँ कर दी पर फेय और नूर ने साफ इंकार किया।उसनें नूरऔर तीन अन्य महिला एसओई एजेंट,योलांडे बेकमैन,इलियान प्लेमैन और मैडेलिन डैमेरमेंट को कार्लज़ूए ट्रेन स्टेशन से म्यूनिख के लिए ट्रेन में सवार कर दिया।तीनों को बदनाम फ़ौर्ज़ाइम जेल में रखा गया जहाँ व्यक्ति की पहिचान और आजादी सदा के लिये गुम हो जाती है।जनवरी 1945 में फेय को भी जर्मनी निर्वासित किया गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।सितंबर 1944 की शुरुआत में ही संकेत मिले थे कि नूर को अन्य जगह भेजा जायेगा।नूर ने किसी तरह कुछ सूचनाएँ लैग्रेव के द्वारा लंदन माँ के पते पर भिजवाई।जेल अधीक्षक विलहेम क्राउस के अनुसार स्थानिय गेस्टापो नें उन्हे आदेश दिया कि नूर को सबसे अलग थलग एकांत कोठरी में हाथ-पैरों में ज़ंजीरे बाँध रखें और खाना कम दें।एक बार जब अधीक्षक ने बेड़ियाँ हटाई तो गेस्टापो ने दुबारा से लगवा दी।एसओई का लैग्रेव भी उसी जेल में बंद था।उसनें बाद में बतलाया कि मारने के पहले नूर पर भयंकर अत्याचारकिये गये।वह टूट गई लेकिन हारी नहीं।उसनें कोई गोपनीय जानकारी नहीं दी।कल्पना की जा सकती है कि दुश्मन देश की एक जवान लड़की पर जर्मनों नें कौनसा अत्याचार नहीं किया होगा। मरणासन्न नूर के अंतिम स्पष्ट शब्द जो किसी ने सुने वे थे "लिबरेट" (आजादी )।उसे 12 सेप्टेम्बर को दचाऊ केंप में लाया गया और 13 सेप्टेम्बर 1944 को तीन अन्य एसओई महिलाओं के साथ एक अंग्रेजी बोलने वाली मेजर से मौत की सजा सुनवाई गई।किसी पादरी को भी प्रेयर के लिये नहीं बुलाया गया।एसएस अधिकारी फ्रेडरिक विल्हेम रूपर्ट ने पिस्तोल से गोली मारी।गोली मारनें के बाद कमाँडेंट नें जवानों से कहा कि इनके शरीर उनके कार्यालय में लायें ताकि वे इनके ज़ेवर ले सकें।
युद्ध की समाप्ति के बाद सारे लापता गुप्तचरों की खोज का काम एफ सेक्शन की इंटेलिजेंस अधिकारी वेरा एटकिंस ने किया।उसने गलती से निष्कर्ष निकाला कि नूर जुलाई 1944 में नैटज़ीलर केंप में मारी गई चार महिला एजेंटो में से एक होगी।मारी गई एक वायरलेस ऑपरेटर सोनिया ओलस्कैन्स्की का हुलिया नूर से बहुत मिलता था।लेकिन 1946 में लेग्रेव की गवाही में पता चला कि नूर फ़ौर्ज़ाइम जेल और दचाऊ केंप में थी।जेल के रिकॉर्ड और दो एसएस गार्डों से भी सबूत मिले जिन्होंने नूर को को फ़ौर्ज़ाइम जेल से उत्पीड़न केंप दचाऊ पहुँचाया था।युद्ध के बाद वेरा एटकिंस ने भी युद्ध अपराधी किफ़र और गोएट्ज़ से पेरिस में बात की।नूर को गोली मारने वाले हत्यारे रूपर्ट को मई 1946 में फांसी दी गई। 
अक्टूबर 1946 में फ्रांस द्वारा नूर की सेवाओं के लिये उसे 'क्रिक्स डी गुएरे' सम्मान दिया।ब्रिटेन नें 'जॉर्ज क्रॉस' से सम्मानित किया।1952 में नूर के दोस्त जीन ओवर्टन फुलर ने उस पर  'मेडेलिन' शीर्षक (बाद में 'बॉर्न फ़ॉर सेक्रिफाइस और नूर-उन-निसा इनायत ख़ान' शीर्षक) से पुस्तक लिखी।नूर पर 2006 में प्रकाशित पुस्तक शबानी बासु की 'प्रिंसेस स्पाय' (जासूस राजकुमारी)है।
नूर की स्मृति,सम्मान में सरकार नें डाक टिकट जारी किया।जर्मनी के दचाऊ केंप में एक स्मारक पट्टिका,इंग्लेंड के 'दि एयर फोर्सेस मेमोरियल',रनमेड के युद्ध स्मारक,और फ्रांस के वैलेनके में एफ सेक्शन की याद में बने स्मारक पर उसका नाम श्रद्धा से अंकित है।नूर की एक मूर्ति इंगलेंड में उसके पुराने घर के बाहर गॉर्डन स्क्वायर, ब्लूम्सबरी में "नूर इनायत खान मेमोरियल ट्रस्ट" द्वारा लगाई गई है।तब के ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 'नूर ट्रस्ट' को अपना समर्थन देते हुए (19 नवंबर 2011 ) 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में हुए एक डिनर पर अपना वक्तव्य पढ़ा-"बहादुर नूर इनायत खान को कठोर कारावास में डालकर पूछताछ के बहाने जैसा उत्पीड़न हुआ,उसकी गहराई में जाना संभव नही है।उसकी क्रूर मृत्यु उसके अदम्य साहस को दिखलाती है।उसे नागरिक क्षेत्र का दिया गया सर्वोच्च सम्मान 'जार्ज क्रास' उसकी वीरता को मान्यता देता है।यह स्मारक उस युवा मुस्लिम महिला के प्रेरक आत्म बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि है,जिसनें नस्लवाद और उत्पीड़न के विरुद्ध विश्वव्यापी लड़ाई ब्रिटिश रेंक में शामिल होकर लड़ी थी"।इस स्मारक का अनावरण नवंम्बर 12 में हुआ।
नूर को श्रद्धा सुमन अर्पित करनें फिल्म निर्देशिका गुरूविंदर चड्ढा,लेखिका अँरुधती राय,प्रणव मुखर्जी भी आ चुके हैं।इंग्लेंड में 2020 में छपने वाले 50 पाउंड के नोट पर नूर सहित तीनों एसओई महिलाओं का फोटो प्रिंट किया जाये इसके लिये 2018 में इंग्लेंड में अभियान छेड़ा गया है।

इतिहास में ३२०० वर्ष पूर्व इजिप्ट में मजदूरों नें संगठित हड़ताल की थी

इतिहास में ३२०० वर्ष पूर्व इजिप्ट में मजदूरों नें संगठित हड़ताल की थी
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                                   जसबीर चावला

अपनी माँगो को लेकर नियोक्ता के विरुद्ध शिकायत होनें पर,संस्थानों,कारख़ानों,खदानों,बैंको आदि में काम बंद,घेराव,पेन डाउन,धरना-प्रदर्शन,अनशन कामगारों,कर्मचारियों द्वारा करना हड़तालों में आते हैं।औद्योगिक क्रांति के बाद बने क़ानूनों से उद्योगपतियों,नियोक्ताओं को मज़दूरों की माँगो पर ध्यान देना ही पड़ता है।हड़तालें-स्ट्राइक- सामान्यत:आधुनिक युग की 19 वीं 20 वीं शताब्दी के शब्द और हथियार माने जाते हैं।अनेकों बार सरकारों के विरुद्ध असंतोष होने पर भी बड़े पैमाने पर धरना प्रदर्शन होते हैं।अभी मध्यप्रदेश में यूरिया को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं।फ्रांस में बढ़े तेल के भावों को लेकर लोग सड़कों पर कई सप्ताहों से आदोंलन रत हैं।लेक वालेचा द्वारा किये नागरिक अवज्ञा आँदोलनों,प्रदर्शनों से पोलैंड की सरकार को जाना पड़ा था।गाँधीजी द्वारा अनवरत धरनों,अनशन से आजादी को योगदान मिला।मेधा पाटकर आंदोलनों की एक-अग्रणी एक्टिविस्ट हैं।इजिप्ट में 'बसंत पतझड़ आंदोलन' के बाद और उसके पश्चात कई अरब देशों में सरकारें पतझड़ के पत्तों समान बदल गई।पूर्वी युरोप की कई वामपंथी सरकारें इन्हीं हड़तालों की वजह से समाप्त हुई।

कम लोगों को ज्ञात होगा कि अपनी माँगों को लेकर इतिहास की पहली संगठित हड़ताल आज से ३२०० साल पहले १२ वी शताब्दी में इजिप्ट के श्रमिकों शिल्पियों और कारीगरों के गाँव 'डेअर एल- मदिना' में रहनें वालों द्वारा हुई थी और यह १८ दिन तक चली थी।इस हड़ताल के दस्तावेज़ी सबूत,शिल्पियों,कारिगरों का मांग पत्र और शासकों द्वारा उनकी माँगे माने जानें के प्रमाण एक पपायरस (मिश्र में नील नदी के किनारे पानी में उगने वाले एक लंबे पौधे के तनें से निकली पट्टियों से बना पेपर जिस पर लिखा जाता था.मिश्र का ढेर सारा इतिहास इन्हीं पपायरस पर लिखा गया है) पर मिलते हैं।

यह हड़ताल इजिप्ट (मिश्र) के "न्यू किंगडम (ईसा पूर्व 16 वीं से 11 वीं शताब्दी) जिस दौरान राज कर रहे रामसे राजवंश के बीसवें फैरो रामसे तृतीय (ईसा पूर्व 1186 से 1155) के वक्त हुई।उन्हें शासन करते २९ वर्ष हो गये थे।कारीगर शाही मक़बरों का निर्माण नील नदी के पास लक्सर में कर रहे थे।रामसे तृतीय एक बहादुर शासक था।उसे समुद्री लोगों,(सी पीपुल्स) जो घूमंतू होते थे से बार बार युद्ध करने पड़े।शासन के छठे और ग्यारहवें वर्ष में उसे समुद्री लोगों और लिबियन आदिवासियों से समुद्र और भूमि पर दोबार युद्ध करने पड़े।उसनें उन्हें हराया और राज्य के दक्षिण में बसाया भी।इससे राज्य पर वित्तीय भार बढ़ा.कहा जाता है कि राज्य में ज्वालामुखी के प्राकृतिक प्रकोप से जमीन पर धुँआ छा जाने और धूप कमी से अनाज का उत्पादन कम हुआ।अपनें पूर्ववर्ती रामसे द्वितीय के बनाये महान भवनों,मंदिरों के अनुकरण में उसनें भी कई भव्य संरचाने बनाई।लक्सर का टेंपल,करणक काम्पलेक्स के मंदिरों में भारी परिवर्तन कराये।मेडिनेट-हबू में अपने शाही मक़बरे,प्रशासनिक परिसर का काम शुरु किया।इन सबसे खजानें में धन की भारी कमी हो गई।अनाज के मूल्य बढ़ गये लेकिन मज़दूरी नहीं बढ़ी ।इन सबके कारण समय से कारीगरों,उनके वेतन का अनाज अपर्याप्त और समय से नहीं मिल पाया।उनमें जबरदस्त असंतोष था।

कारीगरों नें अपनी माँगे सुपरवाइजरों के समक्ष रखी।जो प्रबंध किये गये वे अपर्याप्त थे।कारीगर अपनें औज़ार-"टूल डाऊन"-रख कर काम बंद कर धरनें पर बैठ गये। वे परिसर के दरवाजे पर बैठे पर उसका नुक्सान नहीं किया।ये सारी बातें एक पपायरस पर लिखी हुई हैं।'डेअर एल मदिना' के एक प्रभारी ने रामसे तृतीय के वज़ीर को को यह खत मजदूरो की तरफ से लिखा।मिस्री मूल के श्रमिकों ने पत्र लिखा कि -"उनकी माँगों कि लेकर जब मामला राज्य के प्रतिनिधि सुपरवाईजर नें बिगाड़ दिया,तो हम विरोध शामिल हो गये हैं "।पत्र में आगे लिखा-"मेरे स्वामी के लिए एक और संदेश है।मैं (फैरोके) बच्चों की शाही कब्र पर काम करता हूं।मुझे वहाँ यह काम करने का आदेश दिया है,और मैं वास्तव में अच्छी तरह और उत्कृष्ट ढंग से कार्य निष्पादन करता हूं।मेरे स्वामी,मैं आपको इसके बारे में अपने दिल से परेशान नहीं करना चाहता।मैं अत्यधिक काम करता हूँ और (फिर भी) वास्तव में थकता नहीं हूँ।मेरे प्रभु को एक और संदेश।हम बहुत कमजोर हो गये हैं।भंडार,अन्न भंडार हमसे दूर हो गये हैं।किसी ने हमारा डेढ़ बोरी जौ चुराया और उसमें मिट्टी भर दी।हम भूखे प्यासे हैं और पत्थर के एक भारी ब्लॉक को ले जाना आसान नहीं है।हमारे में खड़े रहनें की ताकत भी नहीं रही और हम मौत के कगार पर हैं।मेरे प्रभु ही हमें जीवित रहने के लिए राशन दिलवा सकते है।भूख प्यास नें हमें यह(हड़ताल) करनें के लिये मंजबूर किया।मैं आपको परेशान नहीं करना चाहता।

आखिर अट्ठारह दिन चली इस टूल डाऊन हड़ताल के बाद शिल्पियों और कारीगरों की माँगो पर ठीक से विचार किया गया,उन्हें दिये जानें वाले अनाज में वृद्धि की गई और समय से देनें का प्रबंध फैरो रामसे तृतीय द्वारा किये  गये।हड़तालियों को कोई सजा नहीं दी गई।

इजिप्ट में मज़दूरों के लिये कार्वी सिस्टम अर्थात दिहाड़ी,बेगार,अवैतनिक,अस्थाई या मज़दूरी भी था।और कारीगरों, शिल्पकारों के लिये स्थाई निवास और निश्चित मज़दूरी की प्रथा भी थी।बाढ़,आपदा आदि में राज्य श्रमिकों को रोजगार देता था।पुरुषों को उनकी क्षमता का कार्य मिलता था।नील नदी जब उफान पर होती थी,खेती कार्य नहीं हो पाता तो राज्य द्वारा सबको रोजगार,आवास,भोजन,स्वास्थ सेवा दी जाती थी।यह प्रणाली लोगों को भूख से बचाती थी।भ्रष्टाचारी व्यक्ति अपनें बदले एवजी को भी काम पर लगा सकता था।लोग एक प्रोजेक्ट के बदले दूसरे प्रोजेक्ट या किसी दूसरे के यहाँ काम कर सकते थे।दास प्रथा बहुत अधिक प्रचलित नहीं थी।आवश्यकता होनें पर ज़बरदस्ती भी मज़दूरों से खदानों में काम करवाया जाता था।अपराधियो,युद्धबंदियों से भारी मज़दूरी करवाई जाती थी।बुद्धिजीवियों,कुशल लोगों से बंधुआ या श्रमिक कार्य नहीं करवाये जाते थे।सक्षम लोगों के लिये सेना में अवसर थे।कार्वी प्रणाली की अपनी जटिलताएँ भी थी।काम के लिए देर से आनें या जल्दी जाने की कोशिश करना एक गंभीर अपराध था।मरुभूमि से संबंधित कानूनों में छह महीने की कैद जबरन श्रम या जुर्माना शामिल है।अगर  कर्तव्यों में ढिलाई दिखाई देती तो फोरमैन और सुपरवाइजर भी गल्ती करने पर पिटने से नहीं बचते।श्रमिकों को शारीरिक दंड सामान्यत: कुछ नियोक्ताओं द्वारा दिया जाता था।विशेष परिस्थितियों,जैसे परिवार में बीमारी आदि में नियम उदार हो जाते थे।मौसम परिवर्तन से जब खेतों में काम करना असंभव हो जाता था,मजदूरों को ऐसे काम दिये जाते थे जो उनके सीधे  हित में थे जैसे बांधों और सिंचाई नहरों की मरम्मत।मंदिरों का निर्माण,उन जगहों की मरम्मत जहाँ पुजारियों द्वारा देवताओं की पूजा की जाती थी,या छुट्टियाँ मनानें की जगह या फैरौन के लिए महल,पिरामिड,कब्रों के निर्माण का काम दिया जाता था।

इनमें से कई काम आज के मनरेगा कि याद दिलाते हैं।बच्चों से भी कम उम्र में काम लिया जाता था।मिले पपायरस से यह स्पष्ट नहीं है कि इस अवधि के दौरान उसके माता-पिता को उसके पालन-पोषण के लिए भुगतान किया जाता था या नहीं। 
                        
प्राचीन इजिप्ट में कोई करंसी-मुद्रा नही थी और व्यापार,वेतन,लेन देन बार्टर सिस्टम से होता था।एक वस्तु या सेवा 
के बदले अन्य वस्तु दी जाती थी।विभिन्न वस्तुओं का युनिट मूल्य तय होता था।सब्जी का युनिट अनाज या बीयर के युनिट मूल्य से अलग होता था।गणना के लिये 'शाट' एक इकाई थी।इस कार्य या फलाँ वस्तु के मूल्य बदले इतने  'शाट' लिये या दिये जायेंगे।सोनें चाँदी के बदले भी 'शाट' की गणना होती थी।एक शाट मतलब साढ़े सात ग्राम सोना।चाँदी जिसे हेड्ज भी कहा जाता था मुद्रा के समान ही थी।

इजिप्ट की सारी इकॉनामी एक सम्पन्न इकॉनामी थी जहाँ प्रचूर मात्रा में उत्पादन होता था।नील नदी के कारण गेहूँ,सेरेल का खूब उत्पादन था।फैरो के केन्द्रीय शासन के अलावा,स्थानिय मंदिर,प्रशासकीय,हरम इकाईयां भी  अतिरिक्त उत्पादित अनाज गोदामों में संग्रहित करते थे।आवश्यकता पड़ने पर संग्रहकर्ता,पुजारी या अधिकारी के आदेश से टैक्स चुकाकर वितरण के लिये अनाज निकाल कर लेते और मज़दूरों,शिल्पियों को शासकीय काम के बदले वितरित करते थे।मजदूरों को श्रम के बदले निश्चित मात्रा में बियर और ब्रेड भी  दी जाती थी।