कौन थी विश्वयुद्ध में जासूसी करने वाली भारतीय राजकुमारी नूर
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🔵 जसबीर चावला 🔵
यह गाथा है भारतीय मूल की एक ऐसी खूबसूरत लड़की कि,जिसका परिवार भारत की आजादी के बहुत पहले से ब्रिटेन में रहनें के कारण वह वहाँ का नागरिक है।लड़की का मन बच्चों सा निश्छल और करुणामय,है।वह बुद्ध और गाँधीजी के नान वायलेंस मिशन से प्रभावित है।कई भाषाओं की जानकार है।वीणा और पियानों दोनों खूब बजा लेती है।कलात्मक रुचियों की धनी,अपनें सूफी गुरु पिता के मानवतावादी विचारों की है।लड़की का पूरा नाम है नूर-उन-निसा इनायत खान।अचानक द्वितीय विश्व युद्ध में नाजियों द्वारा फ्रांस पर आक्रमण के बाद नूर की ज़िंदगी बदल जाती है।परिस्थितियों के दबाव नें नूर को ब्रिटेन की तरफ से लडाई की नई भूमिका में उतार दिया।युद्ध और अहिंसा,कला की दोहरी मानसिकता के कारण वह कई बार कठोर निर्णयों के दौरान असमंजस में पड़ जाती है।
नूर का जन्म 1 जनवरी 1914 को मास्को में हुआ।पिता
इनायत खान भारतीय मूल के अभिजात्य,उदार वादी मुस्लिम थे और इंग्लेंड में रहते थे।इनायत खान की
माँ,नूर की दादी मैसूर के शासक रहे टीपू सुल्तान की वंशज थी इसलिये लेखिका शबानी बसु अपनी पुस्तक में नूर को प्रिंसेस लिखा।इनायत 1910 से वहाँ सूफी संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरु थे और युरोप,अमेरिका में सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश फैलाते थे।उनका विवाह 1913 में अमरीकी मूल की महिला
रे बेकर से हुआ जो बदल कर अमीना बेगम हुआ।1921 में वे लंदन से पेरिस में आ गये और
शानदार भवन 'फज़ल मंज़िल' में रहने लगे।उनकी आध्यात्मिक सूफी मान्यताओं का नूर पर
आजीवन गहरा प्रभाव रहा।1927 में भारत की यात्रा के दौरान हजरत इनायत खान की मृत्यु हो गई।बेगम अमीना पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।महज तेरह वर्ष की उम्र में नूर अपनी माँ,भाइयों विलायत,हिदायत और बहन खैर-उन-निसा की देखभाल करते हुए घर की मुखिया बन गईं।
नूर की प्रतिभाशाली थी और उसकी रुचियां विविध और कलात्मक थीं।उसने 1931 में लंदन में अध्ययन शुरू किया।रेडियो पेरिस और 'ले फिगरो' के लिए कहानियां लिखीं।बुद्ध की जातक कथाओं पर आधारित बच्चों के लिये कहानियाँ लिखी। बाल मनोविज्ञान अध्ययन के लिये एक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया।
जब जर्मनों ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो नूर अपनी अभिरुचियों को परे कर,इंग्लेंड में नवंबर 1940 में वायु सेना में महिला सहायक के रूप में भर्ती हो गई।उसने एडिनबर्ग में वायरलेस ऑपरेटर के रूप में छह महीने का प्रशिक्षण लिया।1942 में उन्नत वायरलेस कोर्स में भाग लिया।गुप्तचरी का यह उसका पहला प्रशिक्षण था।
पाँच महीने बाद उसका नाम एसओई (स्पेशल आपरेशन एग्जिक्युटिव) के 'एफ' सेक्शन (फ्रेंच सेक्शन) में काम के लिये प्रस्तावित किया गया।एसओई के 'एफ' विभाग को ऐसे वायरलेस ऑपरेटरों की आवश्यकता थी जो धाराप्रवाह फ्रेंच बोल सकते हों और तकनीकी कौशल भी जानते हों।नूर इस पर खरी उतरती थी।उन दिनों इंग्लेंड के कई गुप्तचर फ्रांस पहुँचते ही जर्मन गेस्टापो द्वारा पकड़े गये थे,अत:दक्ष वायरलेस आपरेटरों की बहुत जरुरत थी।नूर ने इस चेलेंजिग जॉब को तुरंत हाँ कर दी।
फरवरी 1943 में उसका प्रशिक्षण शुरू किया तीन अन्य महिलाओं योलंडे नेकमैन,सेसिली लेफोर्ट और यवोन कॉर्मेउ के साथ वह छै पुरुषों की बैच में शामिल हुई।उसनें पहिचान छुपानें के लिये नर्स की ड्रेस पहनी।वहाँ तीन सप्ताह के पाठ्यक्रम में सशस्त्र और निहत्थे मुकाबला करना,वायरलेस और क्रॉस-कंट्री नेवीगेशन का गहन प्रशिक्षण शामिल था। प्रशिक्षण के दौरान दो अन्य महिला सैनिकों कि तुलना में नूर की रिपोर्ट उत्साहवर्धक नहीं थी।हाँलाकि वह दूसरों की अपेक्षा अधिक शारीरिक व्यायाम करती थी लेकिन दोहरी मानसिकता के कारण हथियारों से डरती भी थी।उसकी कठोर मेहनत पैराशूट प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त नहीं थी।आखिर उसने एसओई के रेडियो स्कूल और फिनिशिंग स्कूल में ट्रेनिंग ली।उसके प्रशिक्षक ने उसके स्वभाव के बारे में प्रशंसा करके हुए कहा कि उसमें गहरी नैतिक प्रतिबद्धता थी,लेकिन सच्चाई यह भी थी कि एसओई के सैनिकों को क्रूर निर्णय भी लेनें होते हैं।वहाँ मानवता,आदर्शवाद नहीं चलता।प्रशिक्षण के दौरान एक नक़ली हमले में वह दुश्मन द्वारा पकड़े जानें के दबाव का सामना नहीं कर सकी।उसकी योग्यता पर सवाल खड़े हुए,लेकिन एफ सेक्शन के प्रमुख बकमास्टर ने कहा कि दक्ष वायरलेस ऑपरेटरों की तुरंत आवश्यकता है और नूर जानें को भी इच्छुक है।वह चुनी गई।
नूर को कोड नाम 'मेडेलीन' देकर फ्रांस भेजा गया।वह बकमास्टर की टीम की पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर थी।उसकी झूठी पहचान एक आया की थी।उसका फ़्रेंच राशन कार्ड और परमिट बनवा कर उसे 'एल' गोलियाँ भी दी कि पकड़ी जाने पर निगल कर जान दे दे।नूर ने उत्तर-पश्चिमी फ्रांस में एक गुप्त लैंडिंग क्षेत्र के के लिये 'आरएएफ' के विमान से उड़ान भरी।उनकी तीनों साथी डायना राउडन,सेसिली लेफोर्ट,भी अलग जहाज से फ्रांस गई।वहाँ उनका इंतजार कर रहा ब्रिटिश गुप्तचर सेवा का हेनरी डेरीकोर्ट भी था,जो जर्मनी के लिये भी काम करने वाला डबल एजेंट था।उसके द्वारा गेस्टापो को पता था कि कब और कहाँ ये उड़ानें उतरेंगी।इन पर निगाह रखनें के लिये गेस्टापो ने अपनें जासूस नियुक्त कर दिये।
नूर को फ्रांस में एमिल गैरी के घर जाना था।एमिल गैरी ब्रिटिश गुप्तचर फ़्रांसिस सुट्टिल के 'प्रास्पर' नेट वर्क के आधीन था,जिसनें जासूसी का विशाल नेटवर्क पूरे उत्तरी फ्रांस में फैला रखा था।नूर का परिचय सुट्टिल,उनके वायरलेस ऑपरेटर गिल्बर्ट नॉर्मन और एंटेलम से हुआ।गिल्बर्ट नॉर्मन उसे अपने रेडियो ठिकाने पर ले गया,जहां से नूर ने अपने पहुँचने का पहला संदेश प्रेषित किया।अगले कुछ महीनों के दौरान बीस महत्वपूर्ण जानकारियाँ भेजी।
गुप्तचरी का काम ठीक चल रहा था कि अचानक आफत आ गई थी। 24 जून को घटनाओं की एक दुर्भाग्यपूर्ण श्रृंखला में सुट्टिल,नॉर्मन और सैकड़ो जासूसों को परिवारों सहित गिरफ्तार कर लिया।सुट्टिल का नेट वर्क 'प्रास्पर' ध्वस्त हो गया।गिरफ्तारी से बचने के लिये नूर,गैरी और अन्य गुप्तचरों ने नए सुरक्षित ठिकाने ढूँढे।जहाँ कई वायरलेस आपरेटर सुरक्षित जगहों पर चले गये वहीं नूर ने लंदन जानें के बजाय गोपनीय सूचनाएँ भेजनें के लिये वहीं रुकना बेहतर समझा।वह नेटवर्क फिर से खड़ा करना चाहती थी।यह एक तरह का अविवेकी निर्णय था,लेकिन एफ सेक्शन के लिए एक साहसी और निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण भी था।इतनी गिरफ़्तारियों के बाद स्थिति भ्रामक हो रही थी।नॉर्मन की गिरफ्तारी के बाद जर्मनों ने उसके कोड और वायरलेस सेट से इंगलेंड झूठे संदेश भेजे।लंदन में बकमास्टर भ्रांति में थे कि नार्मन मुक्त है या नहीं।उसने एक अधिकारी को पेरिस में स्थिति का आकलन करनें भेजा।हालत और बिगड़े जब उसका वायरलेस ऑपरेटर भी गेस्टापो ने पकड़ लिया।वे उससे नॉर्मन के सेट का उपयोग करवाने लगे।नूर का काम और भी महत्वपूर्ण हो गया।भारी वायरलेस सेट को सूटकेस में भरकर वह पेरिस की सड़कों पर वाहन से स्थान बदल बदल कर गोपनीय सूचनाएँ भेजती रही।
अगस्त में ग़द्दार हेनरी डेरीकोर्ट ने नूर के वायरलेस से कुछ गुप्तचरों को लंदन वापस उड़ान से भेजनें की बात की।नूर नें भी बकमास्टर को पत्र भेजा,लेकिन वह नहीं जानती थी कि गेस्टापो बहुत नज़दीक है।डेरीकोर्ट ने उसके गोपनीय दस्तावेज,पत्र,सूचनाएँ,और फ़ोटोग्राफ गेस्टापो के पास पहुँचा दिये थे।नूर को सुरक्षित ठिकाने छोड़कर पुराने दोस्तों के घरों पर शरण लेने का जोखिम उठाना पड़ा।बालों को डाई करके रंग बदलना और काले चश्मे पहन कर पहिचान छुपाना रोज का काम था।गेस्टापो से बचने के लिये नित्य की भागदौड़ ने उसे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत तोड़ा।बकमास्टर ने अक्टूबर के मध्य में उसके लंदन वापस लौटने के लिये उड़ान की व्यवस्था की पर वह उड़ान कभी नहीं पकड़ पाई।
चार महीनों तक जर्मनों के हाथों से बचनें के बाद नूर का दुर्भाग्य शुरु हो गया।गेरी की बहन रेमी ने उसकी गुप्त जानकारी जर्मन जासूसों को एक लाख फ्रेंक में बेच दी।दो जर्मन अधिकारियों ने भी बाद में स्वीकारा कि नूर को पकड़वाने के पीछे एक फ्रांसीसी महिला का हाथ था।
उसे फ्रांस में जर्मनों के एवेन्यू फॉक स्थित एसडी मुख्यालय में लाया गया।नूर ने वहाँ चालाकी की।स्नान करने के बहाने बाथरूम का दरवाजा बंद कर रोशनदान से बाहर निकल कर भागनें का प्रयास किया।वह पकड़ी गई।दुबारा उसने एमआई 6 के (ब्रिटिश सेना का गुप्तचर विभाग) के पूर्व प्रमुख स्टार और एसओइ के लोन फेय के साथ पाँचवे माले से भागनें का प्रयास किया।स्टार ने एक पेंचकस चुरा कर लोन फेय को और फेय नें नूर को,ताकि भाग सकें।कंबल और चादरें जोड़कर रस्सियाँ बनाई गई लेकिन नूर बाथरूम की राड हटा नहीं पाई।सारे काम में बहुत समय लग गया।सबेरे के तीन बज गये।तभी आरएएफ़ के विमानों ने हवाई हमला कर दिया।अफ़रा तफ़री मच गई।जर्मन चौकन्ने हो गये।बंदियों की सेल की तलाशी में बनाई रस्सियाँ मिल गई।फेय को तो भागते समय गोली से घायल कर पकड़ा गया।सारा प्लान फेल हो गया।
नूर से जर्मनों ने सूचनाएँ उगलवानें के लिये जबरदस्त मशक़्क़त की।इस पूछताछ से नूर ने अपनें प्रशिक्षण काल के सारे आलोचकों को गलत साबित कर दिया जिन्हे उसकी क्षमता में विश्वास नहीं था।पूछताछ करनें वाला जर्मन अर्नस्ट वोग्ट कोई भी सूचना नहीं निकाल सका।वायरलेस विशेषज्ञ जोसेफ गोएट्ज़ ने भी बाद में स्वीकार किया कि "मेडलेइन" से हमें कुछ नहीं मिला।युद्ध के बाद जर्मन एसडी कमांडों हेंस किफ़र ने भी पुष्टि की कि वे नूर की किसी भी सूचना पर भरोसा नहीं कर सके।
दूसरी बार भागने के प्रयास के बाद किफर गुस्से में था।उसनें उन सबको वहीं गोली मारने की धमकी दी और उसने फिर न भागनें का आश्वासन चाहा।स्टार ने तो हाँ कर दी पर फेय और नूर ने साफ इंकार किया।उसनें नूरऔर तीन अन्य महिला एसओई एजेंट,योलांडे बेकमैन,इलियान प्लेमैन और मैडेलिन डैमेरमेंट को कार्लज़ूए ट्रेन स्टेशन से म्यूनिख के लिए ट्रेन में सवार कर दिया।तीनों को बदनाम फ़ौर्ज़ाइम जेल में रखा गया जहाँ व्यक्ति की पहिचान और आजादी सदा के लिये गुम हो जाती है।जनवरी 1945 में फेय को भी जर्मनी निर्वासित किया गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।सितंबर 1944 की शुरुआत में ही संकेत मिले थे कि नूर को अन्य जगह भेजा जायेगा।नूर ने किसी तरह कुछ सूचनाएँ लैग्रेव के द्वारा लंदन माँ के पते पर भिजवाई।जेल अधीक्षक विलहेम क्राउस के अनुसार स्थानिय गेस्टापो नें उन्हे आदेश दिया कि नूर को सबसे अलग थलग एकांत कोठरी में हाथ-पैरों में ज़ंजीरे बाँध रखें और खाना कम दें।एक बार जब अधीक्षक ने बेड़ियाँ हटाई तो गेस्टापो ने दुबारा से लगवा दी।एसओई का लैग्रेव भी उसी जेल में बंद था।उसनें बाद में बतलाया कि मारने के पहले नूर पर भयंकर अत्याचारकिये गये।वह टूट गई लेकिन हारी नहीं।उसनें कोई गोपनीय जानकारी नहीं दी।कल्पना की जा सकती है कि दुश्मन देश की एक जवान लड़की पर जर्मनों नें कौनसा अत्याचार नहीं किया होगा। मरणासन्न नूर के अंतिम स्पष्ट शब्द जो किसी ने सुने वे थे "लिबरेट" (आजादी )।उसे 12 सेप्टेम्बर को दचाऊ केंप में लाया गया और 13 सेप्टेम्बर 1944 को तीन अन्य एसओई महिलाओं के साथ एक अंग्रेजी बोलने वाली मेजर से मौत की सजा सुनवाई गई।किसी पादरी को भी प्रेयर के लिये नहीं बुलाया गया।एसएस अधिकारी फ्रेडरिक विल्हेम रूपर्ट ने पिस्तोल से गोली मारी।गोली मारनें के बाद कमाँडेंट नें जवानों से कहा कि इनके शरीर उनके कार्यालय में लायें ताकि वे इनके ज़ेवर ले सकें।
युद्ध की समाप्ति के बाद सारे लापता गुप्तचरों की खोज का काम एफ सेक्शन की इंटेलिजेंस अधिकारी वेरा एटकिंस ने किया।उसने गलती से निष्कर्ष निकाला कि नूर जुलाई 1944 में नैटज़ीलर केंप में मारी गई चार महिला एजेंटो में से एक होगी।मारी गई एक वायरलेस ऑपरेटर सोनिया ओलस्कैन्स्की का हुलिया नूर से बहुत मिलता था।लेकिन 1946 में लेग्रेव की गवाही में पता चला कि नूर फ़ौर्ज़ाइम जेल और दचाऊ केंप में थी।जेल के रिकॉर्ड और दो एसएस गार्डों से भी सबूत मिले जिन्होंने नूर को को फ़ौर्ज़ाइम जेल से उत्पीड़न केंप दचाऊ पहुँचाया था।युद्ध के बाद वेरा एटकिंस ने भी युद्ध अपराधी किफ़र और गोएट्ज़ से पेरिस में बात की।नूर को गोली मारने वाले हत्यारे रूपर्ट को मई 1946 में फांसी दी गई।
अक्टूबर 1946 में फ्रांस द्वारा नूर की सेवाओं के लिये उसे 'क्रिक्स डी गुएरे' सम्मान दिया।ब्रिटेन नें 'जॉर्ज क्रॉस' से सम्मानित किया।1952 में नूर के दोस्त जीन ओवर्टन फुलर ने उस पर 'मेडेलिन' शीर्षक (बाद में 'बॉर्न फ़ॉर सेक्रिफाइस और नूर-उन-निसा इनायत ख़ान' शीर्षक) से पुस्तक लिखी।नूर पर 2006 में प्रकाशित पुस्तक शबानी बासु की 'प्रिंसेस स्पाय' (जासूस राजकुमारी)है।
नूर की स्मृति,सम्मान में सरकार नें डाक टिकट जारी किया।जर्मनी के दचाऊ केंप में एक स्मारक पट्टिका,इंग्लेंड के 'दि एयर फोर्सेस मेमोरियल',रनमेड के युद्ध स्मारक,और फ्रांस के वैलेनके में एफ सेक्शन की याद में बने स्मारक पर उसका नाम श्रद्धा से अंकित है।नूर की एक मूर्ति इंगलेंड में उसके पुराने घर के बाहर गॉर्डन स्क्वायर, ब्लूम्सबरी में "नूर इनायत खान मेमोरियल ट्रस्ट" द्वारा लगाई गई है।तब के ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 'नूर ट्रस्ट' को अपना समर्थन देते हुए (19 नवंबर 2011 ) 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में हुए एक डिनर पर अपना वक्तव्य पढ़ा-"बहादुर नूर इनायत खान को कठोर कारावास में डालकर पूछताछ के बहाने जैसा उत्पीड़न हुआ,उसकी गहराई में जाना संभव नही है।उसकी क्रूर मृत्यु उसके अदम्य साहस को दिखलाती है।उसे नागरिक क्षेत्र का दिया गया सर्वोच्च सम्मान 'जार्ज क्रास' उसकी वीरता को मान्यता देता है।यह स्मारक उस युवा मुस्लिम महिला के प्रेरक आत्म बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि है,जिसनें नस्लवाद और उत्पीड़न के विरुद्ध विश्वव्यापी लड़ाई ब्रिटिश रेंक में शामिल होकर लड़ी थी"।इस स्मारक का अनावरण नवंम्बर 12 में हुआ।
नूर को श्रद्धा सुमन अर्पित करनें फिल्म निर्देशिका गुरूविंदर चड्ढा,लेखिका अँरुधती राय,प्रणव मुखर्जी भी आ चुके हैं।इंग्लेंड में 2020 में छपने वाले 50 पाउंड के नोट पर नूर सहित तीनों एसओई महिलाओं का फोटो प्रिंट किया जाये इसके लिये 2018 में इंग्लेंड में अभियान छेड़ा गया है।