Friday, August 28, 2015

ऊंची दुकान

ऊंची दुकान
----------
सबसे ऊंची दुकान 
बे  स्वाद  पकवान 
शेखियां   बघारना 
गपोडी  का मकान 
नोटंकी  की आदत 
लच्छेदार    ज़ुबान 
कब  तक   सहेगा 
ये  मेरा  हिंदुस्तान 

प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां

प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां 
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रोज नया नाग डँसता है
डराता फ़न काढ़े 
जकड़ लेता कुंडली खोलकर 
अकड़ती मांसपेशियाँ 
उखड़ती सांसे
कुंद कर देता हाथ क़लम और दिमाग को

फिर भी जीजिविषा है
प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां 
कोई बल है
द्वंद है
अंतरात्मा है
जो जिंदा रखती है बुझती आग को

( जीजिविषा=जीने की प्रबल आकांक्षा )

// जसबीर चावला //

Saturday, August 22, 2015

आज उधर से बारात की आमद है

आज उधर से बारात की आमद है 
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जो  तेरी  हद  है  वही मेरी  हद है 
फिर क्यों दोनों के बीच सरहद है 

कँटीले तार लगे हैं मुल्कों के दरमियाँ 
क्या परिंदों  पे कोई  पाबंदी आइद है

फ़ख्र से कहेंगे हम एक बारात उधर गई
आज उधर से भी बारात  की आमद  है 

उस गैर मुल्की शख्स की बाज़ू टटोली
उस पर  भी  बंधा  मेरे जैसा तावीज़ है

वो सीने से लिपटा और आँसू भर के बोला
यार तेरी जबान में भी वही लाहौरी शहद है


      

Friday, August 21, 2015

आ गये

आ गये
'''''''''''''
भक्तों को बस रटाया था
आ गये
वे जोर से बोलते
'अच्छे दिन'
सब बोलते-'आ गये आ गये
कब जुमला बदला 
कब रण नीति बदली
भगत अनजान थे
वे जोर लगाकर बोले
'बुरे दिन' 
भगत चेतन्य हुए
हाथ उठाये
जोर से बोले
'आ गये आ गये '

* जसबीर चावला *

न्युरेम्बर्ग में हिटलर

न्युरम्बर्ग में हिटलर
———————
अगर ज़िंदा पकड़ा जाता हिटलर
पेश होता न्युरेम्बर्ग ट्रायल में
क्या सिर झुकाए आरोप सुन लेता
मांगता माफी गुनाहों की
मुँह में तृण रख लेता
नफरत नहीं है अब यहूदियों से
बदल गये हैं उसके विचार

या तनकर बैठता/मुक्के पीटता
चीखता चिल्लाता
अवैध है न्युरेम्बर्ग जाँच ट्रायल
तुम सब दफा हो
क्यों मानूं तुम्हारी संप्रभुता
यहूदी ग़लीज़ हैं
सही हैं गेस्टापो
गैस चेंबर
मेरा प्यारा गोयेबल्स
ठीक है यहूदियों का निर्वासन
यातना चेंबर,
मेरी नस्लीय श्रेष्ठता

निभाया है मैंने राजधर्म
नहीं बदलेगा अपने विचार,
अपनी आस्था
कोई घोषणा क्यों करे
‘हिटलर बदल गया है राजनीति और वक्त के दबाव से’
वह जीयेगा इन्हीं संग
मरेगा इन्हीं संग !!

☘ जसबीर चावला

गूगल बाबा

गूगल बाबा
''''''''''''''
गुमती है गुम जाये सिट्टी पिट्टी
गूगल है
गांधारी नहीं 
क्यों बाँधे पट्टी

// जसबीर चावला //

Thursday, August 20, 2015

मुझे जीने दो

मुझे जीने दो
—————


मैं दंगों में मरा हूँ कई बार
मारा जा रहा हूँ रोज 
किस शहर प्रांत की बात करूँ
आँख के पटल पर सब हैं
                                                     
भिवंडी मे अकेला नहीं मरा
परिवार,घर,पेट,हुनर के साथ मरा 
लक्ष्मणपुरबाथे,कंधमाल,झज्जर में
मुरादाबाद,भागलपुर में मरा
दिल्ली,मुंबई,गुजरात में
मुज्जफरनगर में फिर मरा
उसके बाद गिनते जाओ
एक..दो..सौ..दो सौ....
ये बस नाम भर हैं दोहराने के
मौसम में बड़े तूफ़ान का कोई नाम होता है
दंगो का भी नाम होता है
चौरासी / बानवें / दो हज़ार दो...
९/११ के समान ये भी हैं पहचान के साल
सैंतालिस के बाद मैं इक गुमनाम आँकड़ा भर हूँ
गृह मंत्रालय की किसी बिसरी फ़ाइल का


मारा जाता हूँ रोज हिंदू,मुसलमान के नाम
कभी सिख,ईसाई,दलित के नाम
गाय के नाम
श्रीराम के नाम 
पहचान बिना पहचान के साथ
कुरेदे जाते हैं ज़ख़्म मेरे
मेरी आत्मा निरंतर कुचली जाती
रंगनाथ,श्रीकृष्ण,लिब्राहन आयोगों में
एसटीएफ़ की जाँचों में 
शपथ पत्रों में,अदालतों में
एड़ियाँ रगड़ता न्याय
बेताल सा उड़ लटक जाता है सरकारी पेड़ों पर
मैं फिर से मार दिया जाता हूं
दफ़्न कर दिया जाता हूँ न खुलने वाली अलमारी में


शांतिमार्च के मुखौटे
रैलियाँ,सम्मेलन,टीवी की बहसें 
नश्तर चुभोते,नमक मलते हैं
तेज़ाबी बारिश में बार बार नहला दिया जाता हूँ
शरीर,आत्मा बँट जाती मेरी 
क़लम की नोक भी टूट गई
कौन अब आँखें पोंछे
मरते हुए का बयान दर्ज कर लो 
मैं जीना चाहता हूँ

मैं भी जीना चाहता था

समझ

समझ
''''''''''''
बहुत चले
घर बाहर
सदा दूर
साथ साथ

अब चलें
समानान्तर
पास पास
साथ साथ


        

Wednesday, August 19, 2015

चल हट

चल हट
''''''''''
काम ही पूजा है
पूजा तो कोई काम नहीं

धर्म की दुकान बढा
तेरा यहाँ काम नहीं

अर्थ ऑवर

अर्थ ऑवर
----------
तुमने एक घंटा लट्टू कम जलाये 
बिजली बचाई
मैं ढिबरी ही जलाता हूँ
आज घर में चूल्हा भी नहीं जला
नुक्सान नहीं करता ओज़ोन परत का
कितनी बचाता हूँ ऊर्जा 

बा बा ब्लेक शीप उर्फ़ बाबा कथा

बा बा ब्लेक शीप उर्फ़ बाबा कथा
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बाबा ने बाबा से कहा
बाबा अचकचाये
बाबा बुदबुदाये
बाबा फुसफुसाये
बाबा लजाये
बाबा हैरान
बाबा परेशान
बाबा के रंगे हाथ
बाबा की एक आँख 
बाबा की गिरी साख
बाबा की दिखी काँख 
बाबा ने झिड़का
बाबा का मुंह लटका
बाबा बोले यह 'अंदर की बात है' 
चल अंदर 
'धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले'

नफरत का मौसम

नफरत का मौसम
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नफरत बोयें 
नफरत सींचे
नफरत काटें
नफरत बाटें

अफवाह फैलाएँ
फिर गणेश को दूध पिलाएँ 
       

इतिहास के भूत

इतिहास के भूत
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रोज ब्रांडेड कपड़े
देशी विदेशी लांड्री 
ड्रायक्लीन करवाते हैं

अब क्या कहें
'दाग' अच्छे हैं
हर बार उभर आते हैं



बोया बबूल

बोया बबूल
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अब जो है सो है
करनी का फल
आंखे मीच कर खाओ
चाहे खोलकर
कीड़े तो होंगे ही
गूलर का फल

// जसबीर चावला //

शंघाई टू मुंबई

शंघाई टू मुंबई
------------

वे चिंतित थे
चिंता से अवगत कराया
वे भी चिंतित हुए
उनकी भी चिंताएँ थी
दोनों की आमने सामने सेनाएँ थी

दोनो चिंताओं से अवगत हुए
ढोकला खाया
झूला झूला
पुनः पधारें
रुखसत हुए

//जसबीर चावला //

रावण

रावण

——
अंदर का रावण
और बड़ा हो जाता है
साल दर साल
खूब कोशिश मारनें की
कहीं वायरस रह जाता है
रावण और बड़ा हो जाता है

प्रजातंत्र के मायने

प्रजातंत्र के मायने
——————
किसी के लिये प्रजातंत्र 
पेपर नेपकीन
इस्तेमाल करो
फेंको
खो खो का खेल
 *
खो करो
सिरों पर पैर रखो
आगे बढ़ो
पैर पोंछो
डोअर मेट
प्रजातंत्र का मटियामेट 


           


लकड़हारे कभी लौटे न थे

लकड़हारे कभी लौटे न थे

—————————
उन्होंने सीखा है जन्मना
बस काटना फाड़ना 
आिदम प्रवृत्ति आदिम कबीले
लकडहारे हैं
टुकड़ों में बाँटना

लकड़ी नहीं को क्या
इंसानों का कहाँ है टोटा
दास बनाना बाँटना
झींगालाला हो हडिम्बा हो
राजनीतिक फ़ितरत  
ऊंची ऊंची हाँकना 




लच्छेदार किस्मत

लच्छेदार क़िस्मत
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लच्छेदार रबड़ी
लच्छेदार भाषण 
कहाँ से कहाँ पहुँचा देता है 
किसी को नामी हलवाई 
किसी को प्रधानमंत्री बना देता है 



कालजयी लेखन

कालजयी लेखन
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डट कर लिखा
हट कर लिखा
आलोचना सही
डंका पीटा
खूब किया सृजन
कालजयी लेखन
काग़ज़ पर नहीं 
'स्याही सोख्ते' पर लिखा

पाला बदल

पाला बदल
————

काहे कि शर्म
कौन सी विचारधारा 
कैसा स्वाभिमान
कैसी निष्ठा
'सत्ता' की सँवरी प्लेट 
मिल रही विष्ठा



हवा हवाई

हवा हवाई

हवा में आये
हवा से बात की
हवा छोड़ी 
हवा में क़िले बनाये
हवाई बातें
हवाबाज़ हवा में हवा हुए



पत्रकारिता के अच्छे दिन

पत्रकारिता के अच्छे दिन
——————————

पाषाण काल से आज तक
कब आये सबके अच्छे दिन ?
इनके आ गये
छद्म / पद्म पुरस्कार 
विश्वभ्रमण
सुरा / अप्सराओं संग रमण
गले में स्वर्ण पट्टा 
हाथों जमीन का पट्टा
अखबारों में छाप रहे
टीवी में भौंक रहे
जागते रहो 
अच्छे दिन आ गये 
अच्छे दिन आ गये

काला टीका

काला टीका
''''''''''''''''''''''''
उँगली के नाख़ून पर लगा काला टीका
वक़्तन ही था
धुँधलाया और मिट गया
दिठोना था

बुरी नज़रों से बचायें 
अपनी विविधता 
अपना लोकतंत्र
अपना काला टीका




भगदड़

भगदड़ 

धर्म भीड़ थी
मरना ही था
*
जो भेड़ें होती 
तो बच जाती

घोड़ामण्डी

घोड़ामण्डी
'''''''''''''
घोड़ों का व्यापार
इस दौर से गुज़रा न था
बरसों से फल फूल रहा बाजार
मण्डी की हालत
कभी ऐसी तो ना थी
*
बिकने के लिये घोड़े तैयार
नये अस्तबल तैयार
चारा चंदी खानें 
ख़रीदार तैयार
*
ये किसने खिंच दी
नई नैतिक लक्ष्मण रेखाएँ
कैसे आऊँ जमुना के तीर
पाँव पड़ी ज़ंजीर
*
कुर्सीयां व्याकुल
करें आर्तनाद
हाहाकार
कसमसाते कूल्हे भी बेक़रार
ईमानदारी का कैसे निकालें जनाजा
कैसे बनाएँ सरकार

Tuesday, August 18, 2015

बौनों का इतिहास

आज के बौनों का इतिहास 
——————————-

बौने दिमाग से हैं
इतिहास में सेंध लगाते
अपना दारिद्रय छुपाते
गलियाँ ढूँढ़ते 
दावेदारी करते इतिहास के चमकते पन्नों पर
प्रतीकों को आगे करते 
इतिहास पुरूषों का पुण्य चुराते

नंगो का भी अतीत है
बौनों का भी इतिहास

☘  ज स बी र  चा व ला 



                       

                       



       

फिर भी दुखी हैं

फिर भी दुखी हैं
---------------
सब कुछ तो दिया भगवान ने
गाड़ी बंगला
बैक बेलेंस
पत्नि बच्चे
फ़ार्महाउस भैंस
डायबिटिज ब्लड प्रेशर
बदले घुटनें ह्रदय रोग
इडी के छापे हायकोर्ट 
गिरती साख गिरता सेंसेक्स 

फिर भी दुखी हैं

कमरे में क्रांति

कमरे में क्रांति
—————

तेरह बुलाये चौदह आये 
सब चिंतित थे
फुसफुसाहट से ऊंचे स्वर तक गये
झगड़े गुस्साये
डफली बजाई राग अलापा
साम्राज्यवादी शक्तियों को ललकारा
अलगाववादियों से सावधान किया
साम्प्रदायिक ताक़तों को कोसा
प्रस्ताव पास किया 
कुछ ने वाकआउट किया
मोहल्ले में शंखनाद हुआ
सत्यनारायण की कथा का समापन हुआ


***





भेड़िया न्याय

—————
भेड़िया न्याय 
—————-

याद है पुरानी कहानी 
भेड़िये ने मेमने से क्या कहा था
गंदा क्यों कर रहा है पानी
भेड़िया जानता था
मेमना चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकता
मेमना ढलान पर था
भेड़िया ऊंचाई पर पर
भेड़िया तब भी जानता था
मेमना उसे पिछले वर्ष कैसे दे सकता था गाली
अजन्मा था मेमना 
भेड़िया कुतर्क न भी करता
गाली मेमने के बाप ने दी
बाप के बाप ने दी
यूँ ही उसे खा लेता तो क्या ग़लत होता 
मेमना आहार श्रृंखला में जायज़ भोजन था उसका
नैतिक / प्राकृतिक / धार्मिक / विधिक हर प्रकार से 
भेड़िये की पहचान उजागर थी
बिना बात बिना तर्क भी खा सकता था
🔷
भेड़ियों का कायाकल्प हुआ 
भेड़ियों ने मुखोटे पहने  
भेड़ों के भेष धरे 
धार्मिक परिवेश ओढ़े
अन्याय की कुर्सी पर जा बैठे
हँस रहे अपनी बदली भूमिका पर
रणनीतिक कुटिलता पर
जिसका जब जहाँ चाहें शिकार कर रहे 
जनतंत्र का गला सतत घोंट रहे.

🦉 जसबीर चावला















विज्ञापन : घूरे के दिन

विज्ञापन : घूरे के दिन
----------------------
यहाँ मिलता है 
'फोटोजनिक प्लास्टिकयुक्त कूड़ा'
लंबी झाडू
फ़ोटोग्राफ़र 
मिडीयामेन-चमचे
और बिकाऊ मुखौटे
*
जैसे घूरे के दिन फिरे
सबके फिरें

माँ की कृपा


माँ की कृपा
''''''''''''''
अंबे 
अंबा
*
अडानी
अंबानी
बस
छोटी सी कहानी 
       🐝

मिडीया का चारण युग

मिडीया का चारण युग
————————

एक भौंका 
नुक्कड़ से दूसरा 
फिर तीसरा चौथा
सब कुत्ते राग दरबारी गाने लगे
अभिव्यक्ति की आजादी का गला
अपने हाथों घोंटने लगे
देश को चारणयुग में झोंकने लगे

🌿 जसबीर चावला

संतो की आचार संहिता

संतो की आचार संहिता
------------------
सीकरी से अकबर का बुलावा था
खिन्न होकर लौटे कुंभनदास
लिखा 'संतन को कहा सीकरी सो काम'

अाज बहस हो रही संत संहिता की
कोड आफ कण्डक्ट की

शामिल होंगे सब संत ज्ञानी ग्रंथी मौलाना

बंगाली तांत्रिक पादरी महासिद्ध बाबा

कानून में सब लिखा जायेगा
ताकि वक्त पे काम आये

कुछ छूट न जाये
संतों के थाने नैतिक पुलिस होगी

देखी जायेंगी लंगोट
नियत में खोट

नार्को एचआईवी टेस्ट होंगे

आश्रम खानाकाह से दूर होंगी दुकानें
कुश्ते दारू चरस की

वियाग्रा शिलाजीत सिद्धमकरध्वज  की
हॉस्टल विधवाश्रम

पहुँच से दूर नीली फ़िल्मे गरम साहित्य कंडोम

बंधेंगे सदाचार के तावीज़


यक्ष प्रश्न बिल्लियाँ अनेक हैं
घंटी बांधेगा कौन
***

अरे ..नहीं

अरे..नहीं
———
भेड़ मेमने ने भेड़ माँ से कहा
नींद नहीं आती
माँ ने कहा
भेड़ें गिन
मेमना इवीएम का बटन दबाने लगा
भेड़ें भीड़ बनी
फिर भेड़तंत्र बना
भेड़िया आ गया


हैंड-शेक

हैंड-शेक
---------
शरीफ ने मोदी से
मोदी ने शरींफ से  
मिलाया हाथ 

दोनों बाहर आये
अमेरिकन साबुन से
हाथ किये साफ  

बोल साध्वी बोल

बोल साध्वी बोल

महिला
भगवा वस्त्र 
हिंदुत्व का झँडा
अहा साध्वी
रक्त में नफरत
अश्लील बोल
चाल चरित्र चेहरा 
वाह साध्वी 

क्या फर्क हैं

क्या फर्क हैं
------------

बाबरी से
बामियान तक
बजरबट्टूओं से
तालिबान तक
आईएस राज्य से बोको हराम तक
विचार आत्मा में एक
शरीर / संरचना में एक
विध्वंस करते / ढहाते
ठिकाने लगाते

एक माँ जाये भाई भाई
आवाज 'दो' हम एक हैं
         

कूड़े से कूड़ेदान का सफर : घरवापसी

कूड़े से कूड़ेदान का सफ़र : घर वापसी
—————————-——-——

इतिहास के हाशिये पढ़ते थे नमाज़ 
बीनते थे कूड़ा

इतिहास पर स्याही पोती  
कूड़ा साथ आया

नया इतिहास रचा 
मंदिर के घंटे बजाये
कूड़ा ही मिला

इतिहास मोड़ा 
फिर मकान बदला
कूड़ा संग हो लिया 

इतिहास का कूड़ा
वर्तमान का कूड़ा 
जीवन में बस कूड़ा 

8/18/2015
(आगरा में कूड़ा बीनने वाले मुस्लिमों को हिंदू बनाने और ठीक से न स्वीकारने के बाद पुन: वापस आने पर )



कांजी हाउस

कांजी हाउस
------------
माल तुम्हारा
बाड़ा तुम्हारा
जहाँ   बाँधो
बंध   जायेंगे

कोड़ा तुम्हारा
राज   तुम्हारा 
जिधर  हाँको 
हँक    जायेंगे 


*उर्दू पंजाबी में पशुओं को माल भी कहते हैं.

ईश्वर 'तू' भटक गया है : एक आस्तिक की डायरी से

ईश्वर भटक गया है : एक आस्तिक की डायरी से
————————-••———————

ईश्वर 'तू' भटक गया है
इस भीड़ में तू अकेला है
खुद रास्ता ढूँढ सके तो ढूँढ ले
दाँव पर है साख
धर्मग्रँथों और तुझमें कोई मेल नहीं
तेरे नाम पर भारी स्वाँग
ईश्वर 'तू' जमीन कब्जानें लगा
सड़कों पर 'धर्मढाबे' खुलवाने लगा
'तू' वैध है तो धर्मस्थल अवैध क्यों
तूनें बाबाओं के पाँच सितारा आश्रम देखे
तेरे बदले खुद के बुत तराश लिये
'मौन साधना' छोड़ लाउडस्पीकर पर टंग गया धर्म
धर्म का धँधा करते चेनल
गुरुद्वारों में कर्मकाँड
'खुदा' को बेचते खुदाई खिदमतदार
अल्लाह के नाम बम फट रहे
'निराकार साकार' दोनों विकृत हुए
'किताबी बेकिताबी' सब बेनक़ाब हुए

'तू' जो न सँभला मिट जायेगा
धर्म के खुले हैं 'बिग बाज़ार'
तू तो बस बाहर का 'शोकेस' है
अंदर नोट गिन रहे हैं मेनेजर


☘ ज स बी र  चा व ला

छुटपुट

जीजिविषा
------------
 मैं  दंगो में मरा हूँ सौ बार
 मुझे जीने तो दो एक बार
*
जाग दर्द ए मुल्क जाग
साख  हो  रही  है राख
*
जाँच/साँच 
    को 
नहीं आँच
*
आत्म मुग्ध सरकार  आईना नहीं देखती
माबदोलत   बस   आईना ही   देखते  हैं
*


अरुण गोविल दीपिका चिखलिया के नाम:हे राम

अरुण गोविल दीपिका चिखलिया के नाम:हे राम
              
———————————————————-

प्रिय अरुण / प्रिय दीपिका
राम राम 
'रामायण' में तुम राम सीता बने
सपने में अब राम सीता नहीं आते
तुम दोनों ही नजर आते 

पहले भी बुरी तरह छला गया हूँ
मुझसे छीना गया मेरा राम 
सौम्य मर्यादा पुरुषोत्तम था मेरा राम
एक और जानकी लक्ष्मण
चरणों में भक्त हनुमान
हनुमान के सीने में भी सीता राम

एस.मुलगाँवकर के केलेन्डर आये
सब भगवान सेक्सी बने 
देवियों ने शालीनता छोड़ी
चटख नायलोन के झीने पहने

फिर हाथ में धनुष लिये रचे गये राम
आक्रामक मुद्रा में कूच करते
जनमानस में रोपे गये
चौराहों पर कटआउट लगे
बाहर बाहर राममय हो गये
अंदर सबके राम निकल गये

छीना गया राम
छला जा रहा राम
किस छवि का याद करूँ राम
राम का वास्ता 
मुझ से मेरा राम न छीनो 
लौटा दो मेरा करूणामय राम
हे राम.

🦉जसबीर चावला
      



    

यही न्याय है

यही न्याय है
————-
इन्द्र का पाप
ऋषि का श्राप
अहिल्या हुई पत्थर 

पत्थर की आँखें
पत्थर का मन
खड़ी रही एकटक

राम की प्रतीक्षा 
चौदह बरसों तक 

कैसे होता है क्षण में पत्थर हो जाना
धडकते दिल का रुक जाना
संवेदनाओं का मर जाना
किसी राम की प्रतीक्षा करना
किसी और के पाप के लिए
किसी के श्राप के लिये
चुप रहना बुत बने रहना

कालाधन

कालाधन
'''''''''''
चुनावी भाषण
हथकंडे
बकवास
काला धन
मत कर
पिया मिलन की आस
// जसबीर चावला//

गाफ़िल

गाफिल
--------
भेड के बच्चे ने माँ से कहा
नींद नहीं आ रही
माँ ने कहा आंखे मूँदो
आ जायेगी भेड़े गिनों

बच्चा गिनता रहा
भेड़िया आ गया

नागलोक

नागलोक 
'''''''''''''''''
वे रोज छोड़ते है 
ज़हरीले साँप बस्ती में
हम ढूँढते हैं मंत्र 
ओझा जहरमोरा 
और पीटते हैं लकीर
न पकड़ पाते 
न मार पाते


बस जला लेते हैं हाथ
मिटा लेते कुछ और लकीरें 

वेलेण्टाइन डे / पप्पू लल्ली के नाम

वेलेण्टाइन डे / पप्पू लल्ली के नाम
————————————

प्रिय पप्पू / प्रिय लल्ली
चस्पा हैं तुम्हारे नकली नाम 
ताकि छुपी रहे पहचान
पर सवाल असली हैं
कल पाम ट्री पर कील से खुदा तुम्हारा नाम देखा
दिल के आर पार निकला तीर
संग जीने मरने की कसमें
दस बरस पहले की खुदी तारीख़ 

अंजता एलोरा की दीवारों पर तुम थे
लालकिले,ट्रेनों के बाथरूम में तुम्हारे नाम थे
भूटान की पारो वेली म्युजियम में जिग्मे वांगचू-पेमा नाम लिखे थे 
गीजा के पिरामिड में तुम सलमान-सना थे
दीवारें कर रही बयां तुम्हारा हाल-ए-दिल
रोम के ट्रेवी फ़ाउंटेन में संग संग सिक्के फेंकते 
तुम डेविड-लीसा,स्टेला-राबर्ट के नाम के

पप्पू बताओ लल्ली कहां कैसी है
जिंदा है या दहेज की बली चढ गई 
कहाँ बेटी पैदा करने का दंश झेल रही
सलमान बोलो सना हो चुकी हलाक
सुन कर तलाक तलाक तलाक
कर लिये दो निकाह 
भूले कि शरियत क्या कहती है
डेविड स्टेला अब क्या यही है ट्रेंड 
कितने ब्वाय/गर्ल फ़्रेंडकितने पहनें वेडिंग गाऊन
लीसा राबर्ट ने कितनी अंगूठीयां बदली 
ये बच्चे हम दोनों के हैं 
ये उस पति उस पत्नि से हैं

यह कैफियत है प्यार के फटे परचम की 
प्यार जो किसी पेड़ की डाल से लटका है 
खजुराहो की दीवारों पर धुँधला चुकी है इबारत 
‘आय लव यू पप्पू-आय लव यू टू लल्ली’