रीढ़ की हड्डी
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वे लड़ रहे असमान लड़ाई
हौसला बुलंद है
न हो दर्ज इतिहास के पन्नों में नाम उनका
ना शिलालेखों पर उकेरा जाये
किस्सों में ज़िक्र होगा उनका
न जुहार की न सलाम समर्पण किया
शक्ति भर लड़े और भुगता
तने रहे जीवन भर
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बिना रीढ़ के केंचुए
गोदी में पल रहे
पैरों की ज़रूरत कहाँ है ?
सत्ता का क़ालीन बिछा है
मज़े से रेंग रहे.
🦉 जसबीर चावला
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