Tuesday, August 18, 2015

रीढ़ की हड्डी


रीढ़ की हड्डी 

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वे लड़ रहे असमान लड़ाई

हौसला बुलंद है 

न हो दर्ज इतिहास के पन्नों में नाम उनका

ना शिलालेखों पर उकेरा जाये 

किस्सों में ज़िक्र होगा उनका

न जुहार की न सलाम समर्पण किया

शक्ति भर लड़े और भुगता

तने रहे जीवन भर

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बिना रीढ़ के केंचुए 
गोदी में पल रहे 
पैरों की ज़रूरत कहाँ है ?
सत्ता का क़ालीन बिछा है
मज़े से रेंग रहे.

🦉 जसबीर चावला

   







    

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