Wednesday, March 30, 2016

चुप्पी साधना

चुप्पी साधना
-------------
'चुप्पी साधना' बडी साधना है 
वे चुप हैं
मुश्किल से सधती है चुप्पी
शव बनते रहैं
ढेर लगते रहें 
महिलाओं की इज़्ज़त तार तार हो
न टूटे चुप्पी 
'शवसाधक' ही कर सकता है चुप्पी साधना

Tuesday, March 29, 2016

स्वयंभू ठेकेदार

स्वयंभू ठेकेदार 

किसी को राष्ट्रवादी तंदूर में झोंका 
कोई देशभक्ति की कढ़ाई में तला गया
साँस्कृतिक करंट के झटके दिये 
उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ बंद हुईं
उनकी आत्मा झुलस गई 
फिर भी ठप्पा लगा 
देशद्रोही संदिग्ध का

जसबीर चावला 

Thursday, March 24, 2016

सिलीकान में भेजाफ्राय

सिलीकान में भेजाफ्राय
-----------------------

अब कौन जाये मथुरा कौन जाये काशी
मन में बस सिलीकान है
रोम रोम में राम बसे
मेरे मन में सिलीकान बसे
सिलीकान चले हम
चुनिया मुनिया झगड़ू दगडू
गुल्लू चमली साथ चलें हम
सिलीकान के चिप्स तले हम
शुतरमुर्ग के साथ चले हम
जुकरबर्ग के पास चले हम
इधर गुगल उधर याहू
याहू..याहू...याहू.....!
चाहे कोई मुझे जंगली कहे
कहता है तो कहता रहे
हम सिलीकान के दीवाने हैं
हम अब क्या करें
राधा ने माला जपी तेरे नाम की
मैनें ओढ़ी डिज़ीटल चुनरिया सिलीकान की
लाली मेरे लाल की जित देखूँ सिलीकान
लाली देखन मैं गया हो गया हलकान
कण कण में भगवान
हर तरफ़ सिलीकान
जय सिलीकान
दास 'क(जस)बीर' जतन से ओढ़ी
ज्यों की त्यों रख दिनीं चुनरिया








Sunday, March 13, 2016

निर्लज्ज

निर्लज्ज 

नहीं आती
तो नहीं आती
अब शर्म भी
क्रानिक क़ब्ज़ हुई 

Wednesday, March 2, 2016

राष्ट्रभक्त

राष्ट्रभक्त
----------

उसनें बैंको के करोडों रुपये डुबोये
'वह' टेक्सचोर था 
'वह' गुंडा मवाली दादा था 
तस्कर था
खनन माफिया था.
समाज में नफरत फैलाता था
'वह' महिला विरोधी था
'वह' हत्यारा था
'वह' बलात्कारी था.

'वह' पकड़ा गया
'वह' ने जोर से नारा लगाया भारतमाता की जय.
हाथ से दल का झँडा लहरा दिया

अरे "वह" तो जन्मना राष्ट्रभक्त था
                 

कॉकटेल काल

कॉकटेल काल
---------------
चल रहा इन दिनों कौन सा काल ?
भक्तिकाल / वीरगाथा काल ?
प्रशस्तिगान रत अभिसारिकाएँ
स्वर्ण थाली में छद्म पद्म पुरस्कार 
अहा रीतिकाल ?

अखबारों में चाशनी में डूबे शब्द
टीवी पर अखंड कीर्तनी जत्थे 
अहो रूपम अहो ध्वनि
आग उगलता अगिया बेताल 
ओह चारण काल ?

साहित्य में सतत महिमा मँडन
बजते ढोल मंजीरे खड़ताल 
बुद्धि का अकाल 
ढिंढोरचियों के बढ़ते मुद्राभँडार
स्वर्णकाल ?

दुष्टकाल आपातकाल