Sunday, January 31, 2016

गाँधी मजबूरी

सरकार बहादुर की मैं झूठ बोल्या ?
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देश  में  गाँधी  से  दूरी  है.
विदेश में गाँधी मजबूरी है.

तीसरा हाथ

तीसरा हाथ
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एक हाथ रोज गाँधी को जिंदा करता है
धड़ से उगा दूसरा हाथ 
झट गाँधी की लँगोटी उतारता है
गोली मार देता है

एक तीसरा हाथ है
रिमोट लिये अट्टहास करता है

 जसबीर चावला 

Tuesday, January 26, 2016

गणतंत्र के तंत्र का गण



गणतंत्र के तंत्र का गण
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वह मर गया

न सोचता था
न बोलता न पढ़ता था
न भौंकता न काटता 
बस भीड़ था
गणतंत्र का बेबस 'गण' था
'तंत्र' के इशारे हाथ उठा देता 

वह जिंदा कब था ?

Thursday, January 21, 2016

विचारों का डेड एंड

विचारों का डेड एंड
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एक नाप के कपडों की दुकान 
बंद गली का आख़री मकान
यही है इनकी गौरव गाथा 
इनकी विकास यात्रा 

सावधान ‘ड्रा लाईन’  के आगे न बढ़ें
सोचना विचारना पाप हैं
मति रोध है
घुसने न दें ताजी हवा बाड़े में
भेड़ चाल चलें
मुँह झुकाएँ
आगे गतिरोध है.

                                                 

Monday, January 18, 2016

और कितनें टोबा टेकसिंह

और कितने टोबा टेकसिंह
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ज़मीन बँट चुकी
मुल्क का सियासी बँटवारा पूरा हुआ
मंटो नें लिखा
उधर खरदार* तारों के पीछे हिंदुस्तान
इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान
दरमियाँ में ज़मीन का टुकड़ा 
जिसका कोई नाम न था
टोबा टेक सिंह पड़ा था
टोबा टेकसिंह याने बिशनू माने बिशनसिंह 
गाँव टोबा टेकसिंह का पागल किसान
पड़ा है आज भी दोनों मुल्कों के दरमियाँ
'नो मेन्स लेंड' में ढूँढ रहा अपनी पहचान

दोनों सरहदों के पार मुल्क और बँटे
मजहबी सियासी बँटवारे हुए
सूबेदारो के अपने इलाके
अपने कानून
ढेरों 'नो मेन्स लेंड'
कई टोबा टेकसिंह ढूँढ रहे अपनी बेटीयां
अपनी रूपकौर अपनी अायशा 
अपनी माई मुख्तार अपनी निर्भया
अपनी ज़मीन अपना आसमान ढूँढ रहे 
अजीबोग़रीब आवाज़ों में बड़बड़ा रहे
'औ पड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी लालटेन'
'हिंदुस्तान पाकिस्तान दुर फिटे मुंह'
'टोबा' तो सचमुच पागल था
ये सियासी मरीज़ बाँहें उठा रहे
गड्डमड्ड आवाज़ों में चीख रहे 
परचम लहराते मुल्क भर में चिल्ला रहे
'अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दी दाल ऑफ फ़िरक़ापरस्ती एंड घर वापसी'

क्या कभी कोई 'पागल' टोबा टेकसिंह आयेगा
इन मुल्कों के दरमियाँ 'लव जिहाद' चलायेगा


*खरदार-काँटेदार ( टोबा टेकसिंह : सआदत हसन मंटो की विशिष्ट कहानी )

Friday, January 15, 2016

वाह रे पठान

वाह रे पठान
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पठान का गुम हुआ कोट
दौड़ते बंदे पर चिल्लाया
ए खबीस की औलाद 
तुम उदर किदर को जाता
उदर को है पठानकोट
ला मेरा कोट
झोले की तलाशी ली
निकला पेटीकोट

वाह रे पठान
वाह पठानकोट

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पठानकोट
केवल उतरा कोट
राजा तो नंगा है 


राजनैतिक अंग

राजनैतिक अंग
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इनके बदले नहीं जा सकेंगे 
दिल घुटनें हिप जायंट
बार बार 'दल' बदलें 
अब दिल नहीं बदलेगा
खूब घुटनें टेके 
घुटनों में लोच नहीं 
कुर्सी की नाप के हुए हिप जाइंट
कंडम हो गये हैं 
तीनों ठीक नहीं होंगे
राजनीति में खूब चलेंगे

बच्चों की कविता बड़ों के लिये

बच्चों की कविता बड़ों के लिये
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चुपके से कुछ रंग चुराएँ 
कहीं से से हरा कहीं से भगवा
यहाँ से नीला वहाँ से केसरिया
इधर उधर से लाल पीला 
केनवास पर कूँची चलायें
सुँदर सुँदर इन्द्रधनुष बनाएँ  
थोड़ा थोड़ा सबको बाँटें
आओ बच्चों ताली बजायें 

बयान पर हंगामा

बयान पर हंगामा
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पहले मिडीया में थूका
फिर चाटा
फिर थूका
बार बार सफाई देते 
इनका गला सूखा

अफ़ग़ानिस्तान में कोड़े से पिटती ख्वातीन

अफ़ग़ानिस्तान में कोड़े से पिटती ख्वातीन 
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बुरक़े के ऊपर चादर ओड़े औरत
भरी भीड़ में अकेली औरत 
धूप में तमाशा बनी औरत
मज़हब के नाम बुत बनी औरत
कोड़े पे कोड़ा खाती औरत 
क़तरा क़तरा ज़िबह होती औरत
आह न भरती औरत
कहाँ है आपा अम्मी बीवी बेटी औरत
सारे रिश्तों के व़जूद नकारती औरत
एक जिंस बनी औरत
सिर्फ एक जिस्म है औरत
औरत है तो बस औरत