Friday, March 31, 2017

एक गणतंत्र के अवशेष

एक गणतंत्र के अवशेष
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सन इकत्तिस सौ सत्रह
खुदाई में गणतंत्र के अवशेष मिले 
संविधान के फटे पन्नों में लिपटे कुछ कँकाल मिले 
कौन थे ये मरने वाले
विद्वानों में गहरे मतभेद है
संविधान की रक्षा में शहीद हुए 
या असंवैधानिक ढंग से मारे गये लोग
क्या तब बुत बने बैठे रहते थे जज लोग

सभी विद्वान एकमत हैं
हजार साल पहले देश में संविधान था
भूलभुलैया सी संसद थी
सुंदर सा न्यायालय था


☘ जसबीर चावला 

Sunday, March 26, 2017

मैं सोच सकता हूँ

मैं सोच सकता हूँ
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मैं एक दिन तुमसे अपनी क़लम वापस छीन लूँगा 
फिर बोलूँगा लिखूँगा 
पुस्तकें पड़ूँगा 

तुम रिमोट से चलने वाले रोबोट हो 
सोच नहीं सकते

मैं सोच सकता हूँ

☘ जसबीर चावला 

बगुलाभगत

बगुलाभगत
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बगुला भगत नहीं एकाग्र होता है
मछली साधना में रत होना
बगुले का सहज काम होता है 

बगुला गाली नहीं है
बगुला भगत में भगत गाली है

बगुले की भोंडी नकल है


वक्त काटना

वक्त काटना
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बँद करो भौंकना
बहुत भौंक चुके 
वक्त काटने का नहीं
काटनें का है 

☘ जसबीर चावला

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम
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तुम्हारा प्रेम
संकरी पगडंडी
मैं धूलि धूसरित हो जाता हूँ 
काँटों भरी राह
मैं लहूलुहान हो जाता हूँ
ठंडी हवा
मैं काँप काँप जाता हूँ
आसमानी बिजली
मैं सिहर सिहर जाता हूँ
बरसती बूँदे
मैं नहा नहा जाता हूँ
तुम्हारा प्रेम
बहता झरना
मैं डूब डूब जाता 
तृप्त हो जाता हूँ

अपराध बोध

अपराध बोध 
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आत्मा नहीं कचोटती
आत्मा पर बोझ नहीं है
क्षमा नहीं माँगते
शर्मिंदा नही हैं

क्या वे अबोध हैं ?

उन्हें न बोध है 
न आत्मा है
इसीलिये ग्लानि बोध नहीं है

अछूत कौन है ?

बीमार मीडिया
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हाँ हम अछूत हैं
छूना न हमें
तुम बीमार मानसिक रोगी हो 
छूत की बीमारी है तुम्हें

सच ! तुम छूत हो
छूना न हमें हम अछूत हैं 

Friday, March 24, 2017

नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी

नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी

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एक काल खण्ड ऐसा होगा


सँविधान का घोर उल्लँघन होगा

टुकुर टुकुर ताकते न्यायाधीश होंगे

सँसद मछली बाजार बनेगा

प्रधान संसद को अँगूठा दिखायेगा

विधायक और घोड़े मँडी में बिकेंगे

फ़सादी मवाली राज्य प्रमुख बनेंगे 

कारिंदे कठपुतली होगें

श्रेष्ठीवर्ग देश को ख़रीदे बेचेंगे

लोग जीवित होंगे मरे समान होंगे 

मरे लोगों को ऐसा जीने की आदत होगी

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तुम्हे इन सब पर विश्वास हो तो हो

मुझे तो विश्वास नहीं फिर जो हो सो हो


          ☘ जसबीर चावला


Tuesday, March 21, 2017

शोकगीत

शोकगीत
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कोई मरे तो मरे
मेरी बला से
डर गया हूँ
और न डराओ 
पहले ही मर चुका हूँ

Friday, March 10, 2017

वे जब मार देंगे

वे जब मार देंगे
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वे जब मार देंगे 
औचित्य बता देंगे मारनें का 
वैसे उन्हे बतानें की जरूरत नहीं है 
बिना वजह भी मार देंगे
बेवजह मारना भी एक जायज़ वजह है
देवताओं से मिली है इन्हे मारने की सनद

धर्मग्रँथ

धर्मग्रँथ
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उठाये धर्मग्रँथ
चूमा आँखों से लगाये
सिर पर बैठाया
पढ़े तो कुछ समझ न आये
भगवान के एजेंट ने समझाये 
समझ आये
तुरंत लाइब्रेरी में रखवाये
आदि मानव के विकास के साक्षी है ग्रँथ

धर्मग्रँध लायब्रेरी में ही अच्छे लगते हैं 

कैसा न्याय

कैसा न्याय
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न्याय होता नहीं
सभी के लिये
ये बना है
ये बना है
किसी किसी के लिये

न्याय होता नहीं 
सभी के लिये 

(संदर्भ असीमानंद/साईंबाबा पर अदालती फैसले/'इश्क होता नही सभी के लिये'-फिल्म 'जागर्स पार्क'-गायक अदनान सामी)

Monday, March 6, 2017

कवि का मन

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   कवि का मन
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डाल से पत्ता टूटा
कवि मन धड़का
कली चटखी
कवि बाग बाग हुआ
झील में मछली उछली
कवि मन बल्लियों उछला
गाय रँभाई
कवि को माँ याद आई

मुहल्ले में गोली चली
कवि व्यस्त था
जूड़े में गुलाब टाँक रहा था

  ☘ जसबीर चावला

Wednesday, March 1, 2017

कालिखो पुल


दुष्टकाल में फिर याद आ गया.9 अगस्त, 2016 को ईटानगर में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल ने फांसी लगा ली.किसी को याद है ? क्यों ? खुदकुशी करने के एक दिन पहले कालिखो पुल ने 60 पेज का एक सुसाइड नोट लिखा जिसमें उन्होंने जजों सहित संवैधानिक पदों पर बैठे विभिन्न लोगों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. कभी कोई जाँच हुई ? क्या नतीजा निकला ? उनके पुत्र ने भी बाद में लंदन में आत्महत्या की.

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कालिखो पुल
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कौन है कालिखो पुल ?
मर कर उठी हुई उँगली का एक नाम 
एक नाम जो कोड़ा है
भ्रष्ट व्यवस्था के उघड़े तन पर
एक जायज़ गुस्सा 
विधायिका के गिरगिट चरित्र पर
सटीक टिप्पणी है संविधान पर
न्याय की बग्घी में बैठे जज साहिबान पर
हाथों में दिया चाबुक है
उलाहना है जज साहब बग्घी से उतरें 
चाबुक चलायें

एक प्रश्न चिन्ह है
बेबसी है फटकार है
मुँह छुपाते बेशर्म मिडीया पर
उसकी शातिराना चुप्पी पर
उनकी आत्म हत्या नहीं बलिदान है
हमारे चेहरे पर लगी कालिख है
कालिखो पुल के नहीं रहने पर

🦉जसबीर चावला