Tuesday, December 13, 2016

हॉय पिंकी

हॉय पिंकी
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ब्लेकमनी 'ब्लेक' कहाँ रही
दो हजारी नोटों में बदली
'पिंक' हुई तो पिंकमनी कहें
छोटे में 'पिंकी' कहैं
'गुलाबो' पुकारें 'रोज़ी' कहैं
दिल्ली में महापँडित से पूछें
वहाँ सब कुछ हो जाता है
दरबार में 'विकलांग' जाता है 
आते हुए 'दिव्यांग' हो जाता है

मौत राशन की लाईन में भी आती है

मौत राशन की लाईन में भी आती है 
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नोट की लाईन में मरे कई 
मौत राशन की लाईन में भी आती है 
नेता ने सच कहा
नेता और मौत कभी भी आ सकते हैं
कहीं भी आ सकते हैं
बेबस ही क्यों मरता है लाईन में 
सदियों से खडा है लाईन में 
खड़े खड़े जो मरवा रहा है उसे 
वह मरेगा कब लाईन में 

देह त्यागता देश

देह त्यागता देश
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मेरा देश जाग रहा 
सँडास को भाग रहा 
दरवाज़े की कुँडी खटखट
आधी अधूरी त्याग रहा है
मेरा देश जाग रहा है

फ़ाईल से पेनकार्ड मांग रहा 
तेजी से बैंक को भाग रहा 
नोट की लाईन में लगा
खड़े खड़े देह त्याग रहा है
मेरा देश जाग रहा है

दिल्ली में दूल्हा सज रहा 
राग दरबारी बज रहा 
अम्माँ तेरे बेटे की गजब बात
पानी में झाग उठा रहा है
मेरा देश जाग रहा है

* नोटबंदी के दिन

मारने वाले

मारने वाले
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जनेऊ दिखाते 
क्रास दिखाते
इजारबंद सरकाते 
तय था मारा जाना 
कमाल के धार्मिक हैं
मारनेवालों में जुगलबंदी है 

Thursday, December 8, 2016

आप क़तार में है

आप क़तार में है

आप क़तार में हैं कृपया प्रतीक्षा कीजिये
ठग्गू हलवाई का ठेका है नोट तलने का 
नये करारे नोट के लिये प्रतीक्षा कीजिये
आप क़तार में हैं
गर्भवती हैं कतार में लगिये
गर्भ में वित्तमंत्री का हाथ नहीं 
प्रसव हुआ घबरायें नहीं
नवजात को क़तार में लगा दें
देश का अनुशासन न तोड़ें
थकें तो पैरों से आलोम विरोम करें
मरें तो पोस्टआफिस से 'गंगाजल' लें
अँत्येष्टि में सब नोट चलेंगें 
सीमा पर सैनिक गोली खा रहे है
यहाँ आप लाठी नहीं खा सकते
बूढ़े पैशाब की थैली हाथों उठायें हैं
आप अपनी शादी का कार्ड लाये हैं
घर में खानें को नहीं कैंसर है
अधीर न हों देश निर्माण प्रगति पर है
लकडबग्घों की सनक भरी हँसी के लिये 
आप क़तार में हैं कृपया प्रतीक्षा कीजिये

Sunday, December 4, 2016

द्वारपाल जज

द्वारपाल जज
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ताक पर हो संविधान 
'मौलिक अधिकार’ के पन्ने चिपक जायें
द्वार पर राष्ट्रगान सुनता ऊँघता जज 


सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो


Saturday, December 3, 2016

सिनेमा मे राष्ट्रगान

सिनेमा में राष्ट्रगान
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पाषाणयुग में लौटें
चलें साढ़े तीन लाख साल पुरानी 'तबुन गुफ़ा' में
सीखने में देर क्या अबेर क्या
आग जलाना सीखें
राष्ट्रभक्त बनें
रोज सिनेमा जायें
जन गण मन गायें

*इजरायल में तबुन की गुफ़ा में आदिमानव द्वारा आग प्रयोग के चिन्ह मिलते हैं

Tuesday, November 8, 2016

शैतान और बाईबल

शैतान और बाईबल 
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शैतान बिल से निकला
बाईबल पढ़ी 
फिर बिल में घुस गया

मार्क्स और धर्मगुरु


मार्क्स और धर्मगुरु
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मार्क्स ने कहा धर्म अफ़ीम है
धर्मगुरु खुश हुए
सहमति में मुँडी हिलाई
पीनक में डूबे रहते अनुयायी 
चटाते अफ़ीम धर्म स्थानों में
कड़वी कभी शुगर कोटेड
दुआओं प्रवचनों में
हम धर्म गुरू हैं सच्चे मार्क्सवादी

महामण्डलेश्वर मार्क्स की जय 





Wednesday, November 2, 2016

संविधान का ताला सुधारने वाला


संविधान का ताला सुधारने वाला
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आला कमान को तुरंत चाहिये
संविधान सुधारने वाला
संविधान में लिखा है ‘स्वतंत्र न्यायपालिका’
मिटा कर कर दे 'नगरपालिका'
जज की जगह 'सीएमओ' 
मौलिक अधिकार बनें अनैतिक अधिकार 
काम हाथ की सफाई का है 
शिकायती जज घर बैठें
बिना रीढ़ वाले आवेदन करें






Tuesday, October 25, 2016

गलाकाट स्पर्धा

गलाकाट स्पर्धा
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जेबों में राज्य 
मुट्ठी में केन्द्र
देश की 'सेलडीड' हाथ में
शाही रथ पर 'कारपोरेट' सवार
बेदख़ल व्यापारी 
'गलाकाट' स्पर्धा
मरते मज़दूर मरते किसान
अब आँख खोलो सरकार









Wednesday, October 19, 2016

चूहा बिल्ली का खेल

चूहा बिल्ली का खेल
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चूहा कहाँ खेलता है खेल
खेल में सहमति होती है
बिल्ली खेलती है खेल
बिल्ली के नियम
बिल्ली अंपायर
बिल्ली का मैदान
बिल्ली चूहे को झिंझोड़ती,छोड़ती,पकड़ती है
अंत में खेलती है मौत का खेल
सर्जिकल स्ट्राइक
देश में चल रहा चूहे बिल्ली का खेल

दिल्ली बिल्ली से कितनी मिलती है 

🌿 जसबीर चावला


Saturday, October 15, 2016

नक़ल और चुनाव संहिता

नक़ल और चुनाव संहिता
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परीक्षा में नक़ल करते टीचर ने पकड़ा
जेब से मोबाइल निकला
छात्रों फेंको पर्चियाँ
चुनाव के दिन तो रखो शुचिता
लग चुकी है आचार संहिता




Thursday, October 13, 2016

अंदर का रावण


अंदर का रावण
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झटके से मार दिया अंदर का रावण 
अब जीनें के लाले पड़ गये 
घर के बाहर जायें कैसे
जियें कैसे ?

Friday, October 7, 2016

देशद्रोही न होने की व्यथा

देशद्रोही न होनें की व्यथा
        ——•——
आप पिटे नहीं अब तक
आप ट्रोल नहीं हुए
माँ बहिन की गालियाँ नहीं मिली
स्याही नहीं पुती मुँह पर
पाकिस्तानी घोषित नहीं हुए
कैसे अभागे हो
'राष्ट्रवादियों' का भंडारा कैसे चलेगा

कोरे प्रमाण पत्र पड़े हैं
आपका नाम छपे
प्रसाद में देशद्रोही का तमग़ा लगे
धमकियाँ मिलें
आपके भी दिन फिरें


☘ ज स बी र   चा व ला









Sunday, October 2, 2016

गांधी:आ अब लौट चलें - २

गांधी:आ अब लौट चलें - २
""""""""""""""""""""''''''
अप्रासंगिक हुए गांधी 
लद गये दिन गांधी बाबा के 
विचार बिका
प्राण प्रतिष्ठा के पहले निष्प्राण हुआ
चौराहों पर गांधी बुत बन गये 
नाम चला / भुन चुका
गांधी जुगाड़ू नहीं अब वोट कटवा है
वैश्विकरण की अाँधी 
शोर में कौन सुनता है गाना
'पाई चवन्नी चाँदी की जय बोलो महात्मा गांधी की'
गांधी पुस्तक भंडार 
गांधी का दर्शन नहीं बिकता
बिकता है लुगदी साहित्य 
डूब गये गांधी संस्थान अपने ही भार से
महात्मा गांधी मार्ग भूल गये
अब एमजी रोड है
महात्मा गाधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज 
एमजीएम है
मान्य हो गई दादागिरी
पैरोडी बनी गांधीगिरी 

कुछ सर्वोदयी बेबस बूढ़े
आश्रम घर में अरण्य रोदन करते
गांधी की सुमरनी फेरते
तकली  चरखा चलाते 
अपने दिन गिनते
पहन बेच रहे खादी
सूत की गुंडी बनाते
गुंडों के गले डलती सूत की माला
बस ढो रहे हैं पालकी
गांधी बाबा के नाम की

गाँधी आ अब लौट चलें

गाँधी:आ अब लौट चलें - १

गाँधी:आ अब लौट चलें - १
""""""""""""""""""""'''''

नया निज़ाम / नये लोग
नई मुद्रा / नये नोट
नये प्रतीक / नये बुत / नये देवता
साबरमती के नये संत
अपने चारण / अपने भाट

आँखों पट्टी बांधा राष्ट्रवाद 
लकीरों को छेड़ो / मिटाओ
गांधी मिटाओ / हटाओ
बगल में खींचो एक और लकीर
क्या कर रहा यहाँ नंगा फ़क़ीर 
इतिहास को पोतो
पोतने का इतिहास बनाओ

गाँधी आ अब लौट चलें

🌿जसबीर चावला 

Saturday, October 1, 2016

ए पार हिंदुस्तान ओ पार पाकिस्तान


ए पार हिंदुस्तान ओ पार पाकिस्तान 
————————————

वह शख्स जो कल फूट फूट के रोया
दीवार के उस पार है
उसने बहुत कुछ खोया है

एक शख्स दीवार के इस पार हिचकियाँ ले रहा 
इसने कुछ नहीं पाया है
पता नहीं कौन इस पार है 
कौन उस पार है
बस दोनों के बीच एक दीवार है  

न दीवार होती न युद्ध होता
सरहद पर खुशबू के खेत होते
न यह रोता न वह रोता

Wednesday, September 28, 2016

बजता रहे राजा का बाजा

बजता रहे राजा का बाजा
—————————

राजा तो राजा है
राजा की मर्जी

रामनामी ओढ़ ले
सतनामी ओढ़ ले
गाँधी को बिछाये
'मियाँ' की मल्हार गाये
युद्ध थोप दे
बुद्ध परोस दे 
राजा की मर्जी
राजा तो राजा है
ध्यान रहे नंगा है.

Tuesday, September 20, 2016

किसे पता था ट्वीट करेंगे

किसे पता था ट्वीट करेंगे
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सोचा था
वे जोरदार 'ट्वीट' करेंगे
😀
किसे पता था
वे जोरदार 'बीट' करेंगे

Wednesday, September 14, 2016

भरी सभा में प्रश्न करती द्रौपदी

भरी सभा में सवाल करती द्रौपदी 
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कुंती से द्रौपदी पूछती
मै मिठाई थी बराबर बँटी भाईयों में
खेती की जमीन जिसे सबने बोना था 
हाड़ माँस की थी मैं 
सवाल करती पाँचो पाँडव से 
अर्जुन चित्रागँदा उलूपी सुभद्रा तुम्हारी पत्नियाँ हैं 
युधिष्ठिर पौरवी तुम्हारी 
भीम तुमने ब्याहा हिडिंबा बलन्धरा को 
तुमने करेणुमति को नकुल
सहदेव तुमने विजया को
तो मैं क्या थी ?
तन मन से बंटी एक औरत !
सबकी पत्नियों की चेरी

तुमसे भी शिकायत है कृष्ण
मुझे सखि माना
मन तो पढ़ते मैंने तुम्हे क्या माना

चौसर में दाँव पर लगी मैं
स्तब्ध हुई काँप उठी मैं
कैसा था निर्लज्ज क्षण
तुम जुए में राजपाट हारे 
बिना खेले सर्वस्व हारी मैं
अस्तित्व खोकर स्त्री से चल संपत्ती बनी 
औरत की अस्मिता दाँव लगी

निरूत्तर थे पाँडव 
सभा में मौन सन्नाटा होगा

महाभारत की रचना कुछ अलग ही होती 
वेदव्यास ने द्रौपदी पर केन्द्रित की होती






भेडों का प्रजातंत्र

भेडों का प्रजातंत्र 

भेड़ें भेड़चाल चलती हैं
कभी कभी ईवीएम से खेलती हैं
भेड़ों के सौदागरों को नींद नहीं आती 
बार बार उठकर भेड़ें गिनते हैं          
काली भेड़े छाँटते हैं
सत्ता का रसायन लगाते 
सफेद बनाते हैं
भेड़ों से भीड़तंत्र बनता है
उधर प्रजातंत्र के मुखोटे में भेड़िया चुपचाप आ जाता है

सच मत बोल कौआ काट लेगा

सच मत बोल कौआ काट लेगा 
----------------------

अंदर बैठा लोकपाल
सोचने के पहले चेता देता सोच मत 
निंदा के शब्दों में बिल्कुल मत सोच
सत्ता के अनुकूल नहीं सोच तुम्हारी
बंद कर देता हूँ सोचना  

कभी ढीठ मन करता है अवज्ञा 
जारी रहता है चिंतन
अवचेतन पत्थर फेंकता है
पेलेट गन से लहूलुहान मन
पार्श्व में नजर आती हैं लाठियाँ
सुनाई देती टकसाली गालियाँ 
सोशल मिडीया पर कपडे उतारते पिंडारी 
टीवी पर भौंकते श्वानवृंद 
हाँका डालते टपोरी 
मैं चुप लगा जाता हूँ 
आपात्काल लग गया है
बंद कर देता हूँ सोचना

Wednesday, September 7, 2016

निज़ाम का सदक़ा

निज़ाम का सदक़ा
--------------

अब सब कुछ बंद
खिड़की किवाड़ बंद
रोशनदान भी बंद
दिल दिमाग बंद
विचार बंद
नागरिक का रुपांतरण 
कद्दू जमीकंद

🌿 जसबीर चावला 

Tuesday, September 6, 2016

बापू के अच्छे दिन

बापू के अच्छे दिन
--------------

रामराम के राम गये
गायों को पर लगे 
वंदेमातरम गया
अब तिरंगा भी गया

प्रतीकों को झाड़ा पोंछा
कहीं पलटी मार के लिया
सेंतमेंत में हथियाया 
पुराना लेबल हटाया
नया ठप्पा लगाया

प्रतीकों के अच्छे दिन आये 
जाओ बापू तुम भी जाओ 
तुम्हारें भी दिन अच्छे आये

मारने वाले

मारने वाले
--------

दीवार पर पहले ही लिखा था तुम्हारा नाम
तय था तुम्हारा मारा जाना 

क्रास दिखाते
कड़ा दिखाते
इजारबंद सरकाते 
जनेऊ दिखाते 

कमाल की जुगलबंदी है मारनेवालों में


आर्डर आर्डर ! इतिहास जज करेगा जजों का इतिहास

आर्डर आर्डर ! इतिहास जज करेगा जजों का इतिहास
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अच्छे जज चुप रहते हैं
सत्ता का विरोध नही करते
दूरदृष्टा होते हैं
निवृत्ति बाद ऊंचे पदों से नवाजें जाते हैं
अच्छे जजों के अच्छे दिन आते हैं

बुरे जज खूब बोलते है
मंचों पर आँसू बहाते 
सरकार पर उँगली उठाकर कोड़ा फटकारते हैं
निवृति के बाद भुला दिये जाते 
बुरे जजों के बुरे दिन आते हैं

कुछ चुप हैं / कुछ मुखर हैं
समय लिखेगा सबका इतिहास
इतिहास जज करेगा जजों का इतिहास.





जज की विनय पत्रिका

जज की विनय पत्रिका
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जज रोया गिड़गिड़ाया
न्याय ने एड़ियाँ रगड़ी 
दोनों ही भूल गये इतिहास
वधिक न्याय नहीं करता 
वधिक वध करता है 

शिक्षक दिवस:दिवंगत प्रो.सब्बरवाल को श्रद्धांजलि

शिक्षक दिवस:दिवंगत प्रो.सब्बरवाल को श्रद्धांजलि
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एक अर्थी उठी 'संदिपनी आश्रम' से
द्रौण तुम हो कौन
शिष्य केमरे पर कहता
गुरू कलंक है कोढ़ है
सच में शिष्य बेजोड़ है
शिष्य अब अंगूंठा नहीं कटवाते
गुरू से पोंछा लगवाते
विद्यार्थी जो विद्या की अर्थी उठाये रखते हैं
पीट कर शव बनाते हैं

'कहा था कौटिल्य ने गुप्तकाल' में
पलते हैं निर्माण प्रलय शिक्षक की गोद में
काल का फ़र्क़ अब कुछ गुप्त नहीं
घट रहा सबके सामने
विध्वंस ही निर्माण है
हिंसा ही लक्ष्य है

🌿  जसबीर चावला

Saturday, August 27, 2016

करप्ट जीपीएस

करप्ट जीपीएस
------------

मेरे स्मार्ट फोन का 'जीपीएस' करप्ट हुआ
एप 'रनकीपर' चंचल हुआ 
आँकड़ों को गलत सलत आँकने लगा
ऊँची ऊँची हाँकने लगा
अपनी ही फेंकने लगा

मैं सैर में चला बलिश्त भर
वह गजों में नापने लगा

Friday, August 26, 2016

सरोगेसी की अर्थ नीति

सरोगेसी की अर्थ नीति
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बीज डिंब कारपोरेट
वंचित की कोख सरोगेट

अच्छे दिन आयेंगे
विकास पैदा होगा
कुछ टुकड़े जननी को 
उसका भी भला होगा

Thursday, August 25, 2016

कश्मीर के स्वर्ग में नर्क और कर्फ़्यू

कश्मीर के स्वर्ग में नर्क और कर्फ़्यू

धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है
यहीं है यहीं है यही हैं
हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त

स्वर्ग मे अगर कहीं कर्फ़्यू है 
यहीं है यहीं है यहीं है 
हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त
  🌑  
कश्मीर तो धरती पर स्वर्ग है 
यहीं है यहीं हैं यहीं है
हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त

स्वर्ग में भी कहीं नर्क है
यहीं है यहीं है यहीं है 
गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त *

* सूफी कवि अमीर खुसरो ने कश्मीर के बारे में फ़ारसी में यह लिखा


🙈    जसबीर चावला 

Monday, August 22, 2016

चिंतित लोगों का देश

चिंतित लोगों का देश
---------------------

कश्मीर पर प्रधान मंत्री भी चिंतित हुए
गृहमंत्री सतत चिंतित हैं
हालात पर उनकी नजर है
रक्षामंत्री अमीर खान के बयान पर चिंतित
वित्तमंत्री पहले ही चिंतित थे
अब गृहमंत्री की भाषा बोलने लगे
विदेशमंत्री चिंतित मौन
एचआर मंत्री के माथे पर बल
चिंता की मारी कपड़ा मंत्री
उदास गंगासफाई मंत्री
सब डूबे हैं देश की चिंता में
चिंता का स्तर बहुत ऊँचा उठा
खेलमंत्री तक चिंतित हो गये
फटाफट रियो से सेल्फी ले आये

🙈  जसबीर चावला

एक ठिठका हुआ देश

एक ठिठका हुआ देश 

सब चल रहे हैं
लाल क़िला चल रहा
भाषण चल रहा
कश्मीर तेजी से चल रहा
पत्थर पेलेट गन चल रहे
राजनीति चल रही
धर्म गाय की जुगलबंदी चल रही
नोटबंदी चल रही
विपक्ष की हाय हाय चल रही
हिंसा चल रही
मंत्री की ज़ुबान चल रही
जुमला चल रहा
टीवी अखबार पर राष्ट्रवाद चल रहा
बलूचिस्तान में नया सिक्का चल रहा
बस देश ठिठका हुआ है


सनद बाँटने वाले

सनद बाँटने वाले
-----------------

वतन परस्ती की आज सनद जो बाँट रहे
जंगें आजादी में खैरख्वाह थे हुक्काम के 

Saturday, August 20, 2016

पहिचान का संकट

कपड़ों से पहचान:पहचान का संकट

—————————————

‘दाढ़ीधारी हिंदू’ बछड़े के साथ था 

मुसलमान समझा,मार दिया 

भीड़ भरी बस में अकेला 'मोना सिख' 

हिंदू समझ कर मार दिया

पगड़ीधारी सिख था

गले में टायर डाला,जला दिया

विदेश में मुसलमान समझ कर मार दिया

दलित मरे ढोर की खाल उतार रहा था

गौ हत्यारा कह कर मार दिया

‘पहचान का संकट' बढ़ा है इन दिनों 

कुछ कपड़ों से आदमी को पहचानते हैं 

सब नहीं कर पाते 

कुछ करना होगा

'आधार कार्ड' गले में टंगा हो

'पासपोर्ट' जेब में हो 

नग्न होना होगा

गफ़लत न हो मारने वाले को

वक्त पर मारे सही आदमी को

☘️जसबीर चावला



Sunday, August 14, 2016

ओलम्पिक में खेलमंत्री

ओलम्पिक में खेलमंत्री
------------------

      जाओ रियो
      खाओ पियो
      कटाओ नाक
  जियो गोयल जियो

Wednesday, August 3, 2016

ऊँची कुर्सियाँ

ऊँची कुर्सियाँ
----------
कुर्सियों के कान नहीं होते
कुर्सियाँ बहरी होती हैं
कुर्सियों की आँख नहीं होती
कुर्सियाँ अँधी होती हैं
कुर्सियों में स्पंदन नहीं होता
कुर्सियाँ ठिठकती नहीं
कुर्सियों में चेतना नहीं होती
कुर्सियाँ संवेदना शून्य होती हैं
सबसे ऊँची कुर्सियाँ
पूर्ण दिव्याँग होती है

🌿 जसबीर चावला

आदमखोर

आदमखोर 
--------

क्या जंगली भेड़िया ही हिंस्र है ?
दादरी ऊना इटावा मंदसौर
जंगल नहीं शहर हैं 
इंसान ही बनें भेड़िये 
आदमखोर 

Monday, July 25, 2016

चीन तू सुधर जा वर्ना

चीन तू सुधर जा वर्ना
'''''''''''''''''''''''''''''''
एनएसजी पर चीन का विरोध 
भक्त था नाराज़
भक्तिन को डपटा 
करेंगे पूर्ण बहिष्कार
नहीं चाहिये 'चीनी' सामान

भक्तिन थी अनुगामिनी 
शाम सकोरे में चाय ले आई
प्राणनाथ 'चीनी' के बने सारे बर्तन तोड़ आई
चाय गुड़ की है 
'चीनी' भी गटर में फैंक आई

Saturday, July 9, 2016

मीडिया की मौत

मीडिया की मौत
———————

क़लम भोथरी हुई
स्याही सूखी
ज़मीर मरा 
मर गया पत्रकार 
पैसा बरसा
खुद डरा हुआ पत्रकार
सबको डरा रहा 
*
टीवी का नया चारण
चरणों में लोटपोट 
गोदी पुत्र बना
आरती उतार रहा
पाँचों उँगलियाँ घीं मे 
राग दरबारी गा रहा 

☘  ज स बी र  चा व ला


Saturday, June 4, 2016

शास्त्रार्थ में गार्गी

शास्त्रार्थ में गार्गी 
——————-

गार्गी बोलो मत
गार्गी सोचो मत
गार्गी तर्क मत करो 
सुनो गार्गी सिर्फ सुनो
बस चुप रहो
भरी सभा में याज्ञवल्क्य ने धमकाया
सिर फट जायेगा तुम्हारा 
याज्ञवल्क्य ठहरे पुरुष
पितृसत्तात्मकता के प्रतीक 

उठो गार्गी उठो
ऋषि परंपरा छोड़ो
क़लम को बनाओ हथोड़ा 
सनातन बेड़ियाँ तोड़ो

☘️ जसबीर चावला 

दादरी में बीफ

दादरी में बीफ
    —•—

उन्हें पहले ही पता था
   फ्रिज में क्या था
  न बीफ न मटन था

      आदमबो थी
   खुद अख़लाक़ था

🌿 जसबीर चावला

Tuesday, May 17, 2016

सूखा और सिंहस्थ

सूखा और सिंहस्थ

बुंदेलखण्ड में सूखा था
घास की रोटी खा कर मर गये 
बिना घास भी मर गये
पानी पाताल लोक में था
बिन पानी मोक्ष पा गये
न खबर थी न फोटू 
न आँख से टपके आँसू
ओह ! टीवी का सूखा भी कितना रंगीन था

सिंहस्थ में पानी ही पानी था
बस आँख का पानी मरा था
ए सी कॉटेज में पसरा धर्म
सत्ता डुलाती सोने का चँवर 
चाँदी की थाली में ज्योंना परोसा 
छप्पन पकवान जीम रहा धर्म 
अहा ! क्षिप्रा का किनारा हरा ही हरा था

🌿 जसबीर चावला 

प्याज के आँसू

प्याज के आँसू

कम बारिश हुई
फसल बर्बाद हुई 
लागत न मिली
किसान की आँख में आँसू थे

अच्छी बारिश हुई 
खूब फसल हुई
प्याज टके सेर भी न बिका
किसान की आँख में आँसू थे

🌿 जसबीर चावला

Monday, May 2, 2016

ये आग कब बुझेगी

ये आग कब बुझेगी
---------------

आग लगी
लगाई गई
बुझी नहीं
बुझाई नहीं गई
जल कर सब ख़ाक
जंगल हुआ खल्वाट

कारपोरेट हँस पड़ा
मोगाम्बो खुश हुआ

(सन्दर्भ:उत्तराखण्ड के जंगलों में आग)

🌴 जसबीर चावला 

Sunday, April 24, 2016

विवादित ढाँचा


विवादित ढाँचा 
-----------
ठीक कहाँ चल रही थी ज़िंदगी 
आटा गूँथती पत्नी को देखा 
तमक कर बोले  हिलती क्यों है 
आँख उठाये बिना वह बोली
आँटा बिना हिले गूँथ कर बताओ
हिलना गूँथने की प्रक्रिया है 
बहादुर मर्द कहाँ समझता औरत का तर्क
जड़ दिये तड़ से दो थप्पड़
विवाद हुआ
बढ़ कर रोज होने लगा
पत्नी बीमार होकर हड्डियों का 'ढाँचा' हुई
सभी पक्ष सर्वोच्च अदालत में है
मुद्दा 'विवादित ढाँचे' का जो है

कूप मंडूक

कूप मंडूक 
--------

उसे नापसंद है ताजी हवा 
खुला आसमान 
खिड़की से आती रोशनी 
पुस्तकें क़लम 
और राग भाईचारा

उसे पसंद है गँधाते तहख़ाने 
पौराणिक पिंजरे
कुँए के मेंढक 
मरघट की आग
जंग लगा वैचारिक ताला

Saturday, April 23, 2016

ढ ढक्कन का

ढ ढक्कन का
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विज्ञान पर ढक्कन
ज्ञान पर ढक्कन
विचार पर ढक्कन
विवेक पर ढक्कन

चल भाग यहाँ से 
ढक्कन कहीं का
बच्चों लिखो 'ढ' ढक्कन का

Saturday, April 16, 2016

प्रजातंत्र के शेर

प्रजातंत्र के शेर

पंचतंत्र के शेर के अग़ल बगल 
दो सियार करकट दमनक 
महाराज की जै जै 
वाह वाह हुआ हुआ 

प्रजातंत्र में हवाई शेर
चारों ओर रंगे सियार
महाराज की जय 
बेबात की हुआ हुआ
खोदते पहाड़ निकलता चूहा

Wednesday, April 13, 2016

नारों में ‘आत्मनिर्भर’ देश

नारों में ‘आत्मनिर्भर’ देश
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नारे रोपें नारे बोयें
नारों की खेती लहलहाये
नारे काटें नारे बाँटें
नारों की सुमरनी चलाएँ
दिन रात सब नारे चाटें

नाश्ते में नारा,लंच में नारा
सूखा नारा,मनरेगा नारा
हर हर नारा,घर घर नारा

नारों को जीवन बनाएँ
फेफड़ों को पूरा फुलाएँ
गाय गाय का नारा लगाएँ
भारत माँ की जय बोलें
मोदी मोदी का नारा लगाएँ


Tuesday, April 12, 2016

गर्व नहीं शर्म करें

गर्व नहीं शर्म करें
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गर्व से कहते है वे हिंदू हैं
मनुस्मृति को सिर पर बैठाया
जीवन सँहिता माना
उन्हे नीच कह जूठन दी
परछाईं को अस्पृश्य माना
कमर में झाडू बाँधा
कानों में सीसा उँडेला
निरंतर आत्मा को कुचला

गर्व नहीं प्रायश्चित करें
आत्मग्लानि का विषय है
सदियों तक आँखें झुकाएँ
आत्ममँथन करें माफी माँगें

Wednesday, March 30, 2016

चुप्पी साधना

चुप्पी साधना
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'चुप्पी साधना' बडी साधना है 
वे चुप हैं
मुश्किल से सधती है चुप्पी
शव बनते रहैं
ढेर लगते रहें 
महिलाओं की इज़्ज़त तार तार हो
न टूटे चुप्पी 
'शवसाधक' ही कर सकता है चुप्पी साधना

Tuesday, March 29, 2016

स्वयंभू ठेकेदार

स्वयंभू ठेकेदार 

किसी को राष्ट्रवादी तंदूर में झोंका 
कोई देशभक्ति की कढ़ाई में तला गया
साँस्कृतिक करंट के झटके दिये 
उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ बंद हुईं
उनकी आत्मा झुलस गई 
फिर भी ठप्पा लगा 
देशद्रोही संदिग्ध का

जसबीर चावला 

Thursday, March 24, 2016

सिलीकान में भेजाफ्राय

सिलीकान में भेजाफ्राय
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अब कौन जाये मथुरा कौन जाये काशी
मन में बस सिलीकान है
रोम रोम में राम बसे
मेरे मन में सिलीकान बसे
सिलीकान चले हम
चुनिया मुनिया झगड़ू दगडू
गुल्लू चमली साथ चलें हम
सिलीकान के चिप्स तले हम
शुतरमुर्ग के साथ चले हम
जुकरबर्ग के पास चले हम
इधर गुगल उधर याहू
याहू..याहू...याहू.....!
चाहे कोई मुझे जंगली कहे
कहता है तो कहता रहे
हम सिलीकान के दीवाने हैं
हम अब क्या करें
राधा ने माला जपी तेरे नाम की
मैनें ओढ़ी डिज़ीटल चुनरिया सिलीकान की
लाली मेरे लाल की जित देखूँ सिलीकान
लाली देखन मैं गया हो गया हलकान
कण कण में भगवान
हर तरफ़ सिलीकान
जय सिलीकान
दास 'क(जस)बीर' जतन से ओढ़ी
ज्यों की त्यों रख दिनीं चुनरिया








Sunday, March 13, 2016

निर्लज्ज

निर्लज्ज 

नहीं आती
तो नहीं आती
अब शर्म भी
क्रानिक क़ब्ज़ हुई 

Wednesday, March 2, 2016

राष्ट्रभक्त

राष्ट्रभक्त
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उसनें बैंको के करोडों रुपये डुबोये
'वह' टेक्सचोर था 
'वह' गुंडा मवाली दादा था 
तस्कर था
खनन माफिया था.
समाज में नफरत फैलाता था
'वह' महिला विरोधी था
'वह' हत्यारा था
'वह' बलात्कारी था.

'वह' पकड़ा गया
'वह' ने जोर से नारा लगाया भारतमाता की जय.
हाथ से दल का झँडा लहरा दिया

अरे "वह" तो जन्मना राष्ट्रभक्त था
                 

कॉकटेल काल

कॉकटेल काल
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चल रहा इन दिनों कौन सा काल ?
भक्तिकाल / वीरगाथा काल ?
प्रशस्तिगान रत अभिसारिकाएँ
स्वर्ण थाली में छद्म पद्म पुरस्कार 
अहा रीतिकाल ?

अखबारों में चाशनी में डूबे शब्द
टीवी पर अखंड कीर्तनी जत्थे 
अहो रूपम अहो ध्वनि
आग उगलता अगिया बेताल 
ओह चारण काल ?

साहित्य में सतत महिमा मँडन
बजते ढोल मंजीरे खड़ताल 
बुद्धि का अकाल 
ढिंढोरचियों के बढ़ते मुद्राभँडार
स्वर्णकाल ?

दुष्टकाल आपातकाल 

Thursday, February 18, 2016

आपका बाप कौन है

आपका बाप कौन है
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मेमने का बाप कौन था
उसके बाप का बाप कौन था
उसका बाप तय करेंगे हम
तय हम करेंगे कि मेमने का क़ुसूर क्या है
सजा किस मेमने को देना है
गवाह भी हमारे होंगे
पैरवी भी करेंगे हम 
फैसला भी करेंगे हम 
जो पहले ही तय है

बात मेमने की ही नहीं है
बात भेड़ियों की है
बात आप की है



Tuesday, February 16, 2016

पीठ न दिखाईये

पीठ न दिखाईये
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वे घेरे में पीट रहे थे
वे घेरे में पिट रहे थे
घेरे में खड़ों की पीठ पिटनें वालों की तरफ थी
तमाशबीन होकर भी अनजान थे
उन्होंने न कुछ सुना न देखा
न गवाही दी

जब ये घेरे में होगें
कोई नहीं देखेगा
कोई नहीं सुनेगा
कोई नहीं बोलेगा
सब तमाशबीन होंगे
सबकी पीठ होगी पिटने वालों की तरफ

पीठ न दिखाईये
मुक्का दिखाईये

Sunday, February 14, 2016

इन्द्रप्रस्थ का जंगल

चुनाव में इन्द्रप्रस्थ का जंगल
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सत्ता के पीछे पागल शेर तेंदुए 
मुर्दाखोर गिद्ध भेडिये
देश निगलते मगरमच्छ अजगर 
सबका दाँव जंगल की सत्ता पर 
रोम में चलेगा रोम का क़ानून 
यहाँ नहीं चलता जंगल का क़ानून 
सत्ता की बंदरबाँट चलती है
रेवड़ों की अदला बदली चलती है
नीलगाय और तेंदुओं की जुगलबंदी
हँसते लकडबग्घों बिगड़ैल हाथियों की संधि
एक बेड़ा भालू बाघ बकरी को लगायेगा पार
शेर खरगोश दोनों करते 
हिरण का शिकार 
जंगल में हर समय सेक्स शिकार होता है 
यहाँ का हर जानवर अबाउट टर्न होता है
देखा है ना टीवी पर जानवरों के दंगल को
चुनावी मौसम में 'इन्द्रप्रस्थ' के जंगल को
हाँफता सनसनी फैलाता विकट जंगल
हिंस्र गुर्राहटें कातर आवाज़ों का जंगल

Sunday, February 7, 2016

नस्लवादी

नस्लवादी

कोई भेड़िया जो खटखटाये
बेखौफ खोल देना दरवाज़ा
पनाह देना उसे
नस्लवादी कहीं पास ही होंगे
शिकंजे हैं उनके पास
रात दिन पीछा करते है
मार देगे उसे
भेड़िये को बचाना उनसे

जसबीर चावला

Saturday, February 6, 2016

अशोक का प्रायश्चित

अशोक का प्रायश्चित
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(जूनागढ़ गुजरात पर लिखी १३ वीं राजाज्ञा)

क्या कसूर था कलिंग का 
यही कि कलिंग गणतंत्र था
हर धर्म जाति के लोग
लोकतांत्रिक व्यवस्था
यही कसूर था कलिंग का.

अशोक ने युद्ध भूमी देखी
गलियों में नोचते गिद्ध देखे
लाख लोगों की मौत देखी
हर तरफ आगज़नी हाहाकार 
भागती महिलाएँ रोते बच्चे देखे.

उसे याद आई मैदान में बिलखती वह महिला
झकझोर कर पूछती उससे
क्या दोष था उन सबका 
क्यों उसके पिता पति पुत्र भेंट चढ़े
क्यों अजन्मे शिशु मरे
किसके लिये क्यों जिये 
अशोक उसे भी मार दे.

अतीत में खो गया अशोक
जब हथियाई थी सत्ता
सैकड़ों रानियों / मंत्रियों को मारा 
भाईयों को आग में झोंका 
किसी नें कुरूप कहा
उसे मौत के घाट उतारा.

साधु समुंद्र ने जगाई अंतरात्मा 
अब युद्ध नहीं प्रायश्चित होगा
अशोक ने बुद्ध का मार्ग पकड़ा
चालीस साल अहिसा की राह चला.

जूनागढ़ का गिरनार पर्वत
चट्टान पर राजाज्ञाएँ लिखी 
तेहरवीं राजाज्ञा में कबूल किया
गलत थी हत्याएँ / विस्थापन 
अमिट क्षमापत्र उकेर दिया चट्टान पर
बच्चों को लिखा अब युद्ध न हो मैदान पर
रणभेरी घोष नहीं धर्म घोष हो
दिग्विजय नहीं धर्मविजय हो
जीवन के मूल्य हैं सच्चाई दया सद्भावना
स्वनियंत्रण दान नैतिकता.

सदियों बाद भी प्रासंगिक हैं राजाज्ञाएँ
किसी की अंतरात्मा जागे 
हिंसक हवाओं के बीच क्षमा कोई माँगे 

🦉 जसबीर चावला



























अशोक का प्रायश्चित
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क्या कसूर था कलिंग का 
कलिंग गणतंत्र था
हर धर्म जाति के लोग
लोकतांत्रिक व्यवस्था
बस यही कसूर था उसका

अशोक ने युद्ध भूमी देखी
गलियों में नोचते चील गिद्ध देखे
एक लाख की मौत देखी
हर तरफ आगज़नी हाहाकार 
भागती महिलाएँ रोते बच्चे देखे 

मैदान में बिलखती वह महिला
झकझोर कर पूछती उससे
क्या दोष था उन सबका 
यह कैसा नरसंहार कैसी सत्ता 
क्यों उसके पिता पति पुत्र भेंट चढ़े
क्यों अजन्मे शिशु मरे
क्यों वह अब किसके लिये जिये 
अशोक उसे भी मार दे

याद कर हिल उठा अशोक
जब हथियाई थी सत्ता
सैकड़ों रानियों मंत्रियों को मारा 
आग में भाईयों को झोंका 
कुरूप कहने वाले को मौत के घाट उतारा 

अब प्रायश्चित होगा
साधू समुद्र ने भी जगा दी अंतरात्मा 
अब न युद्ध होगा 
अशोक ने बुद्ध का मार्ग पकड़ा
चालीस साल अहिसा की राह चला 
जूनागढ़ का गिरनार पर्वत
चट्टान पर राजाज्ञाएँ लिखी 
तेहरवीं राजाज्ञा में उसने कबूला 
गलत थी हत्याएँ विस्थापन 
अपना माफ़ीनामा उकेर दिया अमिट चट्टान पर
पुत्र प्रपौत्रों को भी लिखा युद्ध न हो मैदान पर
सद्भावना से जीतें
रणभेरी घोष नहीं धर्म घोष हो
दिग्विजय नहीं धर्मविजय हो
जीवन के मूल्य हैं सच्चाई दया 
स्वनियंत्रण दान और नैतिकता

सदियों बाद भी प्रासंगिक हैं राजाज्ञाएँ
लपलपाती हिंसक हवाओं के बीच
माफी माँगते ये हलफ़नामे

(* जूनागढ़ गुजरात में है)