भरी सभा में सवाल करती द्रौपदी
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कुंती से द्रौपदी पूछती
मै मिठाई थी बराबर बँटी भाईयों में
खेती की जमीन जिसे सबने बोना था
हाड़ माँस की थी मैं
सवाल करती पाँचो पाँडव से
अर्जुन चित्रागँदा उलूपी सुभद्रा तुम्हारी पत्नियाँ हैं
युधिष्ठिर पौरवी तुम्हारी
भीम तुमने ब्याहा हिडिंबा बलन्धरा को
तुमने करेणुमति को नकुल
सहदेव तुमने विजया को
तो मैं क्या थी ?
तन मन से बंटी एक औरत !
सबकी पत्नियों की चेरी
तुमसे भी शिकायत है कृष्ण
मुझे सखि माना
मन तो पढ़ते मैंने तुम्हे क्या माना
चौसर में दाँव पर लगी मैं
स्तब्ध हुई काँप उठी मैं
कैसा था निर्लज्ज क्षण
तुम जुए में राजपाट हारे
बिना खेले सर्वस्व हारी मैं
अस्तित्व खोकर स्त्री से चल संपत्ती बनी
औरत की अस्मिता दाँव लगी
निरूत्तर थे पाँडव
सभा में मौन सन्नाटा होगा
महाभारत की रचना कुछ अलग ही होती
वेदव्यास ने द्रौपदी पर केन्द्रित की होती
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