Wednesday, September 14, 2016

सच मत बोल कौआ काट लेगा

सच मत बोल कौआ काट लेगा 
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अंदर बैठा लोकपाल
सोचने के पहले चेता देता सोच मत 
निंदा के शब्दों में बिल्कुल मत सोच
सत्ता के अनुकूल नहीं सोच तुम्हारी
बंद कर देता हूँ सोचना  

कभी ढीठ मन करता है अवज्ञा 
जारी रहता है चिंतन
अवचेतन पत्थर फेंकता है
पेलेट गन से लहूलुहान मन
पार्श्व में नजर आती हैं लाठियाँ
सुनाई देती टकसाली गालियाँ 
सोशल मिडीया पर कपडे उतारते पिंडारी 
टीवी पर भौंकते श्वानवृंद 
हाँका डालते टपोरी 
मैं चुप लगा जाता हूँ 
आपात्काल लग गया है
बंद कर देता हूँ सोचना

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