Monday, February 27, 2017

उठो तुतमखामुन



उठो तुतमखामुन उठो
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फैरो पैंतिस सौ सालों से ‘टूम्ब’ में थे  
‘किंग्स वैली’ मे 'मम्मी' बने
भूले इतिहास की तरह  
इजिप्ट के तपते लक्सर में खोये थे 

रेत की घाटी में बरसों खुदाई चली
आज भी चल रही है 
कई फैरो ढूँढे गये
उनके परिजन मिले
काहिरा के म्यूज़ियम में भेजे गये 
अब सब मज़े से काँच के ठंडे बक्सों में सो रहे 

उन्निस साल का तुतमखामुन 
'किंग्स वैली' में अकेला रह गया
उन्निस सौ बाईस में खोजा गया
'मम्मी' बना आज भी मक़बरे में वहीं सोया है 
उसे देख इच्छा हुई पुकारूँ 
देखो सब चले गये 
उठो 'तुतम' बहुत सो चुके अब उठो
तुम भी काहिरा जाओ
अपना शाही खजाना देखो
सोने के एक सौ दस किलो के ज़ेवर देखो
ग्यारह किलो सोने का मास्क देखो
वाईन भरे छत्तीस जार देखो
खाने इत्र तेल के भंडार देखो
शानदार कपडे पहन कर वाईन पियो 
हाथी दाँत जड़ी सोनें की छड़ियाँ उठाओ 
सोने के सिंहासन पर बैठो
अपने ताबूत रथ देखो
मकबरे का खजाना कब काम आयेगा 
इतना सोना तो 'किंग्स वैली' में क्यों अकेले सोना
कितने मिलियन डालर का है सोना ?

पिता अखनातन को पुकारो 
क्वीन 'नेफरटिटी' को पुकारो
'क्वीन वैली' से 'नेफरतारी' भी आई हैं 
बंद 'मम्मीयों' को जगाओ
कहो सजो सँवरो बाहर आओ

काँच के  के बक्सों में 'मम्मियाँ' क्यों चुपचाप पड़ी हैं
प्रजा टिकिट लिये सबको देखनें बाहर खड़ी है

(अपनी इजिप्ट यात्रा से उपजा ज्ञान.)

🦉 जसबीर चावला



मैंने कुछ पेड़ों को देखा है


मैंने कुछ पेड़ों को देखा है
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केलिंफोर्निया के जंगलों में गगनचुंबी पेड़ देखे
दो सौ दस फुट का 'ग्रीजली जायंट' 
उसे छुआ महसूस किया 
अभिभूत हुआ
निहारता रहा एकटक
अपनी लघुता का अहसास हुआ
दो सौ पचहत्तर फुट का रेडवुड 'जर्मन शेपर्ड' 
तीन सौ अस्सी फुट का ऊँचा रेडवुड 'हायपरिअन' 
नंबर वन का ख़िताबी
तीन हजार सालों से धरती पर खड़ा है 
व्हाइट माउंटेन  पर 'ब्रिस्टलकोन पाईन' 
पाँच हजार साल का 'वरिष्ठतम पेड़' 
झुक कर खड़ा है
उम्रदराज़ और भी पेड़ हैं दुनियाँ में 
दुआ है सलामत रहैं
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चैतन्य पेड़ों ने क्या नहीं देखा 
गुरुग्रँथ / कुरान / बाइबल पढ़े
कबीर से गौतम को देखा
तुतमखामुन / क्लियोपेट्रा / अलेक्ज़ेंडर  देखा
मेसोपोटामिया / सिंधुघाटी देखी
इजिप्ट / रोम की / सभ्यता देखी
सभ्यताओं के उदय / अवसान के साक्षी बने 
संसार के धर्मयुद्ध / महायुद्ध देखे
हिटलर देखा गाँधी देखा
जीवन/ मृत्यु / विस्थापन देखा
चेतना के प्रतीक खड़े पेड़
काश की कुछ बोल पाते पेड़ 

पेड़ों ने बहुत कुछ देखा है
मैंने बस कुछ पेड़ों को पहचाना है 
कुछ पेड़ों को देखा है 

☘ जसबीर चावला




Wednesday, February 15, 2017

बुधिया क्या सोचता है

बुधिया क्या सोचता है
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दस बरस का हुआ बुधिया 
मन में क्या सोचता बुधिया

जूठे कप धो रहा बुधिया
सिर पर इँटे ढो रहा बुधिया
झाड़ू देता गाली खाता
ट्रेनों में जूते चमकाता
पानी की बोतल बीनता
पलास्टिक की पन्नी चुनता
अधनंगे बदन की फुँसियां खुजलाता 
बुधिया क्या सोचता है 

'व्हाइटनर' का नशा करता बुधिया
मालिक की जाँघों में भिंचा बुधिया
सोलह के पहले ही बुधिया 
अंतिम साँसे लेता बुधिया
छोटू रामू गंगू मंगू
कितने नाम धरे है बुधिया
बुधिया कुछ नहीं सोचता है

गाँव खबर कर दो हरिया को 
जल्दी भेजे दूसरे बुधिया को


(World Day Against Child Labour 12 June)


Wednesday, February 8, 2017

केक्टस लगाने वाले



केक्टस लगाने वाले

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हजार बरस पीछे अतीत में गये
नाकाम कोशिश की क़लम लगानें की 
न बीज बो सके
न पौधे रोप सके

इतिहास की मुँडेर पर जा बैठे
लगा दी केक्टस की शाखा
खूब फलफूल रही है
अब घर घर में नागफनी फ़न काढ़े खड़ी है

🦉 जसबीर चावला 






   
   

Sunday, February 5, 2017

खोदा पहाड़

खोदा पहाड़ 
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विमुद्रीकरण किया है
अब मुद्रीकरण करो
खूब हिनहिनाये हो
अब लीद भी करो

प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो

Thursday, February 2, 2017

मैं प्रेम की कविता नहीं लिखता

मैं प्रेम की कविता नहीं लिखता
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पागल   भीड़   गाय  ढूँढनें  फ्रिज  में  घुसे 
फ्रिज      मालिक    मार    दिया     जाये
अदालत     आदमी    की      जात    देखे
हत्यारा     ज़मानत     पर      छूट    जाये  
कुर्सी   पर    बैठा  बड़ा   चेहरा  देख  कर 
ऊँचे   जज  की   आँख  'नीची'   हो  जाये

'जेएनयू' से सरेआम छात्र लापता हो जाये 
आस्मां   खा    जाये  जमीन  निगल  जाये
बैंक  कि   क़तार  में   औरत   बच्चा   जनें
खड़े     खड़े   क़तार   में  बूढ़ा   मर   जाये

मरे  ढोर    की  खाल   उतारनें  के  जुर्म में
दलितों  की  नंगे  बदन मुश्कें  कसी  जायें
खाल   के    बदले   खाल    उतारी   जाये 

चटख रंग केनवास पर कैसे लगा सकते हो
तुम प्रेम की  कविता  कैसे  लिख सकते हो