मैं प्रेम की कविता नहीं लिखता
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पागल भीड़ गाय ढूँढनें फ्रिज में घुसे
फ्रिज मालिक मार दिया जाये
अदालत आदमी की जात देखे
हत्यारा ज़मानत पर छूट जाये
कुर्सी पर बैठा बड़ा चेहरा देख कर
ऊँचे जज की आँख 'नीची' हो जाये
'जेएनयू' से सरेआम छात्र लापता हो जाये
आस्मां खा जाये जमीन निगल जाये
बैंक कि क़तार में औरत बच्चा जनें
खड़े खड़े क़तार में बूढ़ा मर जाये
मरे ढोर की खाल उतारनें के जुर्म में
दलितों की नंगे बदन मुश्कें कसी जायें
खाल के बदले खाल उतारी जाये
चटख रंग केनवास पर कैसे लगा सकते हो
तुम प्रेम की कविता कैसे लिख सकते हो
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