Wednesday, September 28, 2016

बजता रहे राजा का बाजा

बजता रहे राजा का बाजा
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राजा तो राजा है
राजा की मर्जी

रामनामी ओढ़ ले
सतनामी ओढ़ ले
गाँधी को बिछाये
'मियाँ' की मल्हार गाये
युद्ध थोप दे
बुद्ध परोस दे 
राजा की मर्जी
राजा तो राजा है
ध्यान रहे नंगा है.

Tuesday, September 20, 2016

किसे पता था ट्वीट करेंगे

किसे पता था ट्वीट करेंगे
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सोचा था
वे जोरदार 'ट्वीट' करेंगे
😀
किसे पता था
वे जोरदार 'बीट' करेंगे

Wednesday, September 14, 2016

भरी सभा में प्रश्न करती द्रौपदी

भरी सभा में सवाल करती द्रौपदी 
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कुंती से द्रौपदी पूछती
मै मिठाई थी बराबर बँटी भाईयों में
खेती की जमीन जिसे सबने बोना था 
हाड़ माँस की थी मैं 
सवाल करती पाँचो पाँडव से 
अर्जुन चित्रागँदा उलूपी सुभद्रा तुम्हारी पत्नियाँ हैं 
युधिष्ठिर पौरवी तुम्हारी 
भीम तुमने ब्याहा हिडिंबा बलन्धरा को 
तुमने करेणुमति को नकुल
सहदेव तुमने विजया को
तो मैं क्या थी ?
तन मन से बंटी एक औरत !
सबकी पत्नियों की चेरी

तुमसे भी शिकायत है कृष्ण
मुझे सखि माना
मन तो पढ़ते मैंने तुम्हे क्या माना

चौसर में दाँव पर लगी मैं
स्तब्ध हुई काँप उठी मैं
कैसा था निर्लज्ज क्षण
तुम जुए में राजपाट हारे 
बिना खेले सर्वस्व हारी मैं
अस्तित्व खोकर स्त्री से चल संपत्ती बनी 
औरत की अस्मिता दाँव लगी

निरूत्तर थे पाँडव 
सभा में मौन सन्नाटा होगा

महाभारत की रचना कुछ अलग ही होती 
वेदव्यास ने द्रौपदी पर केन्द्रित की होती






भेडों का प्रजातंत्र

भेडों का प्रजातंत्र 

भेड़ें भेड़चाल चलती हैं
कभी कभी ईवीएम से खेलती हैं
भेड़ों के सौदागरों को नींद नहीं आती 
बार बार उठकर भेड़ें गिनते हैं          
काली भेड़े छाँटते हैं
सत्ता का रसायन लगाते 
सफेद बनाते हैं
भेड़ों से भीड़तंत्र बनता है
उधर प्रजातंत्र के मुखोटे में भेड़िया चुपचाप आ जाता है

सच मत बोल कौआ काट लेगा

सच मत बोल कौआ काट लेगा 
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अंदर बैठा लोकपाल
सोचने के पहले चेता देता सोच मत 
निंदा के शब्दों में बिल्कुल मत सोच
सत्ता के अनुकूल नहीं सोच तुम्हारी
बंद कर देता हूँ सोचना  

कभी ढीठ मन करता है अवज्ञा 
जारी रहता है चिंतन
अवचेतन पत्थर फेंकता है
पेलेट गन से लहूलुहान मन
पार्श्व में नजर आती हैं लाठियाँ
सुनाई देती टकसाली गालियाँ 
सोशल मिडीया पर कपडे उतारते पिंडारी 
टीवी पर भौंकते श्वानवृंद 
हाँका डालते टपोरी 
मैं चुप लगा जाता हूँ 
आपात्काल लग गया है
बंद कर देता हूँ सोचना

Wednesday, September 7, 2016

निज़ाम का सदक़ा

निज़ाम का सदक़ा
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अब सब कुछ बंद
खिड़की किवाड़ बंद
रोशनदान भी बंद
दिल दिमाग बंद
विचार बंद
नागरिक का रुपांतरण 
कद्दू जमीकंद

🌿 जसबीर चावला 

Tuesday, September 6, 2016

बापू के अच्छे दिन

बापू के अच्छे दिन
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रामराम के राम गये
गायों को पर लगे 
वंदेमातरम गया
अब तिरंगा भी गया

प्रतीकों को झाड़ा पोंछा
कहीं पलटी मार के लिया
सेंतमेंत में हथियाया 
पुराना लेबल हटाया
नया ठप्पा लगाया

प्रतीकों के अच्छे दिन आये 
जाओ बापू तुम भी जाओ 
तुम्हारें भी दिन अच्छे आये

मारने वाले

मारने वाले
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दीवार पर पहले ही लिखा था तुम्हारा नाम
तय था तुम्हारा मारा जाना 

क्रास दिखाते
कड़ा दिखाते
इजारबंद सरकाते 
जनेऊ दिखाते 

कमाल की जुगलबंदी है मारनेवालों में


आर्डर आर्डर ! इतिहास जज करेगा जजों का इतिहास

आर्डर आर्डर ! इतिहास जज करेगा जजों का इतिहास
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अच्छे जज चुप रहते हैं
सत्ता का विरोध नही करते
दूरदृष्टा होते हैं
निवृत्ति बाद ऊंचे पदों से नवाजें जाते हैं
अच्छे जजों के अच्छे दिन आते हैं

बुरे जज खूब बोलते है
मंचों पर आँसू बहाते 
सरकार पर उँगली उठाकर कोड़ा फटकारते हैं
निवृति के बाद भुला दिये जाते 
बुरे जजों के बुरे दिन आते हैं

कुछ चुप हैं / कुछ मुखर हैं
समय लिखेगा सबका इतिहास
इतिहास जज करेगा जजों का इतिहास.





जज की विनय पत्रिका

जज की विनय पत्रिका
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जज रोया गिड़गिड़ाया
न्याय ने एड़ियाँ रगड़ी 
दोनों ही भूल गये इतिहास
वधिक न्याय नहीं करता 
वधिक वध करता है 

शिक्षक दिवस:दिवंगत प्रो.सब्बरवाल को श्रद्धांजलि

शिक्षक दिवस:दिवंगत प्रो.सब्बरवाल को श्रद्धांजलि
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एक अर्थी उठी 'संदिपनी आश्रम' से
द्रौण तुम हो कौन
शिष्य केमरे पर कहता
गुरू कलंक है कोढ़ है
सच में शिष्य बेजोड़ है
शिष्य अब अंगूंठा नहीं कटवाते
गुरू से पोंछा लगवाते
विद्यार्थी जो विद्या की अर्थी उठाये रखते हैं
पीट कर शव बनाते हैं

'कहा था कौटिल्य ने गुप्तकाल' में
पलते हैं निर्माण प्रलय शिक्षक की गोद में
काल का फ़र्क़ अब कुछ गुप्त नहीं
घट रहा सबके सामने
विध्वंस ही निर्माण है
हिंसा ही लक्ष्य है

🌿  जसबीर चावला