सोने से पहले
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कवि का सवाल वाजिब है
तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रही हों
तो तुम सो कैसे सकते हो * ?
तानाशाह से यह सवाल बेमानी है
उसे कैसे नींद आ सकती है ?
उसे कई हुक्म देनें हैं सोने से पहले
बंदूकों टैंकों से कुचलना है जन आंदोलनों को
आज़ादी की फ़ाख्ता के पर कतरना है
अल्पसंख्यकों को डराना है
दल में भीतरघात करवाना है
विरोधियों का दलबदल करवाना है सोने से पहले
गला घोंटना है प्रेस का
ताजी हवा कि वैचारिक खिड़कियाँ बंद करनी हैं
धर्म के धंधे में निवेश बढ़ाना है
न्याय की देवी की आँखों से पट्टी नोचना है
संविधान को ताक पर रखना है
समाज में नफ़रत के बीज बिखेरना है
प्रजातंत्र का मुखौटा उतारना है सोने से पहले
सुबह उठकर मेहनत से फिर चढ़ाना है
उसे ढेरों काम हैं सोने से पहले
* सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता की पंक्तियाँ