विवादित ढाँचा-----------ठीक कहाँ चल रही थी ज़िंदगीआटा गूँथती पत्नी को देखातमक कर बोले हिलती क्यों हैआँख उठाये बिना वह बोलीआँटा बिना हिले गूँथ कर बताओहिलना गूँथने की प्रक्रिया हैबहादुर मर्द कहाँ समझता औरत का तर्कजड़ दिये तड़ से दो थप्पड़विवाद हुआबढ़ कर रोज होने लगापत्नी बीमार होकर हड्डियों का 'ढाँचा' हुईसभी पक्ष सर्वोच्च अदालत में हैमुद्दा 'विवादित ढाँचे' का जो है
Sunday, April 24, 2016
विवादित ढाँचा
कूप मंडूक
कूप मंडूक
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खुला आसमान
खिड़की से आती रोशनी
पुस्तकें क़लम
और राग भाईचारा
उसे पसंद है गँधाते तहख़ाने
पौराणिक पिंजरे
कुँए के मेंढक
मरघट की आग
जंग लगा वैचारिक ताला
Saturday, April 23, 2016
ढ ढक्कन का
ढ ढक्कन का
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विज्ञान पर ढक्कन
ज्ञान पर ढक्कन
विचार पर ढक्कनज्ञान पर ढक्कन
विवेक पर ढक्कन
चल भाग यहाँ से
ढक्कन कहीं का
बच्चों लिखो 'ढ' ढक्कन का
बच्चों लिखो 'ढ' ढक्कन का
Saturday, April 16, 2016
प्रजातंत्र के शेर
प्रजातंत्र के शेर
पंचतंत्र के शेर के अग़ल बगल
दो सियार करकट दमनक
महाराज की जै जै
वाह वाह हुआ हुआ
प्रजातंत्र में हवाई शेर
चारों ओर रंगे सियार
महाराज की जय
बेबात की हुआ हुआ
खोदते पहाड़ निकलता चूहा
Wednesday, April 13, 2016
नारों में ‘आत्मनिर्भर’ देश
नारों में ‘आत्मनिर्भर’ देश
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नारे रोपें नारे बोयें
नारों की खेती लहलहाये
नारे काटें नारे बाँटें
नारों की सुमरनी चलाएँ
दिन रात सब नारे चाटें
नाश्ते में नारा,लंच में नारा
सूखा नारा,मनरेगा नारा
हर हर नारा,घर घर नारा
नारों को जीवन बनाएँ
फेफड़ों को पूरा फुलाएँ
गाय गाय का नारा लगाएँ
भारत माँ की जय बोलें
मोदी मोदी का नारा लगाएँ
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नारे रोपें नारे बोयें
नारों की खेती लहलहाये
नारे काटें नारे बाँटें
नारों की सुमरनी चलाएँ
दिन रात सब नारे चाटें
नाश्ते में नारा,लंच में नारा
सूखा नारा,मनरेगा नारा
हर हर नारा,घर घर नारा
नारों को जीवन बनाएँ
फेफड़ों को पूरा फुलाएँ
गाय गाय का नारा लगाएँ
भारत माँ की जय बोलें
मोदी मोदी का नारा लगाएँ
Tuesday, April 12, 2016
गर्व नहीं शर्म करें
गर्व नहीं शर्म करें
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गर्व से कहते है वे हिंदू हैं
मनुस्मृति को सिर पर बैठाया
जीवन सँहिता माना
उन्हे नीच कह जूठन दी
परछाईं को अस्पृश्य माना
कमर में झाडू बाँधा
कानों में सीसा उँडेला
निरंतर आत्मा को कुचला
गर्व नहीं प्रायश्चित करें
आत्मग्लानि का विषय है
सदियों तक आँखें झुकाएँ
आत्ममँथन करें माफी माँगें
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गर्व से कहते है वे हिंदू हैं
मनुस्मृति को सिर पर बैठाया
जीवन सँहिता माना
उन्हे नीच कह जूठन दी
परछाईं को अस्पृश्य माना
कमर में झाडू बाँधा
कानों में सीसा उँडेला
निरंतर आत्मा को कुचला
गर्व नहीं प्रायश्चित करें
आत्मग्लानि का विषय है
सदियों तक आँखें झुकाएँ
आत्ममँथन करें माफी माँगें
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