Tuesday, December 18, 2018

उत्तर कोरिया

उत्तर कोरिया-रहस्य रोमांच से भरी राजनीति का रक्तरंजित इतिहास
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                         🔵 जसबीर चावला 🔵


कोरिया प्रायद्वीप पर जापान का शासन १९१० से रहा था.१९४५ में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया.कोरिया दो हिस्सों में बाँटा गया.उत्तर में तात्कालिक रूप से सोवियत संघ और दक्षिण में संयुक्त राष्ट्र ने सत्ता संभाली.दोनों हिस्सों के पुनर्मिलन पर अनेक बार वार्ताएँ हुई पर विफल रही.अंत: में १९४८ दो अलग-अलग सरकारें बनी,उत्तरी क्षेत्र के कोरिया में 'समाजवादी लोकतांत्रिक जनवादी गणराज्य' और दक्षिण में 'कोरिया का पूंजीवादी गणराज्य'.

बँटवारे के बाद जल्दी ही उत्तर कोरिया नें दक्षिण कोरिया पर सैन्य आक्रमण कर दिया.यह युद्ध १९५० से १९५३ तक चला,जो इतिहास में 'कोरिया युद्ध' के नाम से जाना जाता है.लंबे युद्ध के बाद दोनों के मध्य युद्ध विराम हो गया.हाँलाकि किसी शांति समझोते पर हस्ताक्षर नहीं किये गये.आज तक दोनों देशों के बीच जबरदस्त तनातनी रही है और दोनों तरफ सेनाएँ सीमा पर मुस्तेद हैं.

उत्तर कोरिया स्वयँ को एक आत्मनिर्भर समाजवादी राज्य मानता है,जहाँ औपचारिक रूप से चुनाव होते हैं,लेकिन सच तो यह है कि देश किम इल-सुंग और केवल उनके परिवार के द्वारा शासित एक देश है.सभी संस्थाओं पर उनके ही परिवार का सतत क़ब्ज़ा रहा है.'श्रमिक पार्टी'और 'कोरिया के पुनर्मिलन के लिए बने डेमोक्रेटिक फ्रंट' पर उनका ही क़ब्ज़ा है.सत्ता का सारा ताना बाना किम परिवार के आभा मंडल को महिमा मंडित करने का रहा है.उनके शब्द ही कानून है.उत्तर कोरिया में मानवाधिकारों का उल्लंघन आम हैं.वहाँ ९५ लाख सक्रिय,आरक्षित और अर्धसैनिकों की बड़ी फौज है,जिसमें १२ लाख से अधिक सक्रिय सैनिक है.चीन,अमेरिका और भारत के बाद यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी है सेना है.उत्तर कोरिया के पास परमाणु हथियार हैं और यह देश आये दिन अंतरमहाद्विपीय बेलेस्टिक मिसाईलों को दाग कर सारे संसार में सनसनी फैलाता रहा है.

उत्तरी कोरिया पर किम वंश का तीन पीढ़ियों से शासन है.पहले नेता किम इल-सुंग ने १९४८ में सत्ता संभाली.उनकी मृत्यु बाद पुत्र किम जांग-इल १९९४ में और उसकी मौत के बाद उसका बेटा किम जोंग-उन २०११ से सत्ता पर काबिज हैं. किम जाँग-उन से कुछ महिनों पहले सिंगापुर में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और दक्षिण कोरिया की बातचीत हुई है.इस बातचीत से कोरिया प्रायद्वीप के बीच चली आ रही कलह के सुलझनें के आसार हैं.रासायनिक-आणविक हथियारों के नष्ट करनें की मंशा से न केवल अमेरिका से संबंध सुधरेंगे बल्कि संसार में भी शांति का आग़ाज़ होगा.

किम इल सुंग के शासन के दौरान हमारे देश के समाचार पत्रों में पूरे पृष्ठ के प्रचारात्मक विज्ञापन छपा करते थे.किम ख़ानदान के तीनो दादा,पुत्र और पोते नें अक्सर संसार को अपनी कई हैरत अंगेज़ हरकतों से चौंकाया है.तीनों व्यक्ति वादी रहे हैं और सत्ता में अधिनायक बने रहनें के लिये अनेक दुस्साहसी कारनामें किये हैं.यहाँ सत्ता के लिये हत्या,टार्चर,जेल में डालना,अपहरण खूब हुए हैं.

बात करते हैं किम ख़ानदान की कुछ चर्चित घटनाओं की. १९६६ में किम जांग-इल अपनें पिता के शासन काल में उत्तर कोरिया के पब्लिसिटी-प्रापेगण्डा विभाग का प्रमुख और मोशन पिक्चर एंड आर्ट डिवीज़न का निदेशक बना.अपनें पिता किम इल-सुंग की कथित फिलासफी को उभारनें के लिये उसनें कला के हर रूप का खूब इस्तेमाल किया.लेखक आर्मस्ट्रांग की पुस्तक 'टायरेनी ऑफ़ द वीक: नॉर्थ कोरिया एंड द वर्ल्ड १९५०-१९९२' में लिखा है कि किम जांग-इल उत्तर कोरियाई की हर विधा को ऐसी दिशा में ले गया जिसे विशेष रूप से उसके पिता की प्रशंसा करने के लिए ही डिज़ाइन किया गया था.वहाँ फ़िल्मे मात्र प्रचार फ़िल्में ही बन रही थी.किम जाँग-इल को लगा कि कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर की फ़ीचर फिल्में बनना चाहिये.उसके पास 'वीसीआर' पर चलने वाली १५००० विडीयो केसट का ज़ख़ीरा था जिनमें हॉलीवुड की भी ढेरों चर्चित केसट थी.

वह 'जेम्स बाँड' और उसकी फिल्मों का दीवाना था,और जेम्स बाँड जैसे कारनामें करने के लिये बाँड का ही तरीक़ा अपनाया.उसनें दक्षिण कोरिया के प्रसिद्ध फिल्म निदेशक शिन सांग-ओक और उसकी खूबसूरत अभिनेत्री पत्नी चोई इन-हे के अपहरण का प्लान बनाया.दक्षिण कोरिया में शिन दंपत्ति का 'शिन फिल्म स्टूडियो' था जहाँ ६० के दशक में कई प्रसिद्ध फिल्में बनी.

शिन की अभिनेत्री पत्नी 'चोई इन-हे' उन दिनों हांगकांग में फिल्म बना रही थी.२२ जनवरी १९७८ को उसका अपहरण किम जाँग-इल के एजेंटों द्वारा हांगकांग से कर उसे उत्तरी कोरिया के नाम्पो हार्बर ले आये.उसे एक आलिशान विला में रखा गया.एक शिक्षक उसे किम इल-सुंग की फिलासफी,उनके कथित जीवन दर्शन को पढ़ाता था.चोई को किम इल सुंग से जुड़े सभी कर्मस्थलों-संग्रहालयों में ले जाया गया.किम जांग-इल उसे फिल्मों, ओपेरा,संगीत,और पार्टियों में ले गया.चोई से बेहतर फिल्में बनानें के लिये राय माँगी.चोई जानती थी कि हांगकांग से उसका अपहरण उसके पति शिन को भी उत्तरी कोरिया लानें के लिया किया गया है.

चोई के गायब हो जाने के बाद उसरे पति शिन सांग-ओक ने उसकी गहन खोज की.उसकी एक और पत्नी भी थी.चोई की कोई खबर न मिलनें पर छे महिनों बाद उसनें उसे तलाक दे दिया.शिन उन दिनो अपनी दक्षिण कोरिया सरकार के साथ भी संघर्ष कर रहा था क्योंकि सरकार ने 'शिन स्टूडियो' का फिल्म लाइसेंस निरस्त कर दिया गया था.

अपनी फिल्मों को पुन:विश्व पटल पर लानें के लिये शिन दुनिया की यात्रा पर निकला.१९८० में शिन हांगकांग में था.वहाँ से उसका भी अपहरण कोरियाई जासूसों द्वारा कर के उसे भी उत्तरी कोरिया लाया गया.उसे भी भव्य आवास और सारी सुविधाएँ दी गई लेकिन उसे उसकी पत्नी चोई के बारे में कुछ नहीं बताया.शिन ने दो बार भागने का प्रयास किया.उसे कारावास में डाल दिया गया.२३ फरवरी,१९८३ को उसे  जेल से रिहा किया गया और ७ मार्च,१९८३ को किम जोंग-इल द्वारा आयोजित एक पार्टी में चोई के अपहरण के ५ साल बाद शिन और चोई दोनों मिले.

किम जोंग-इल नें दोनों को वैश्विक स्तर की फ़िल्में  बनाने के निर्देश दिए.शिन के लिये 'प्योंगयांग' के 'चॉसन फिल्म स्टूडियो' के दरवाजे खोल दिये गये.किम जानता था कि उनकी प्रचारात्मक फिल्मों से अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के दर्शक प्रभावित नहीं होते.उसनें दंपत्ति को उन विषयों का चयन करने की अनुमति दी जो विदेशों में स्वीकार्य हों.शिन ने अक्टूबर १९८३ को काम करना शुरू किया.उन्हें चेकोस्लोवाकिया के एक फिल्म फ़ेस्टीवल में अपनी फिल्मों में से एक के लिए पुरस्कार मिला.किम जाँग-इस खुश हुआ.(मोगाम्बो खुश हुआ) उन्होंने किम जोंग-इल की आभा मंडित करनें के लिये एक मँहगी और अंतिम फिल्म 'पुलगासरी' बनाई जो तब कि लोकप्रिय 'गोडजिला' फिल्मों से प्रभावित थी.

शिन दंपत्ति का उत्तरी कोरिया में दम घुटता था.उन्होंने भागने का फैसला किया.किम जांग-इल उन पर खूब विश्वास करता था.उसनें उनसे १९८४ में बेलग्रेड मे उन दोनों को मिडीया को यह बताने के लिये भेजा कि वे स्वेच्छा से उत्तरी कोरिया क्यों आये हैं,और क्यों खुश हैं.

'पुलगासरी' फिल्म के बाद,किम ने उनको १९८६ में वियना भेजा.वहाँ अपने गार्ड से आँख बचाकर दोनों भाग कर अमेरिकी दूतावास चले गये और राजनैतिक शरण माँगी.अमेरिका ने दोनों को शरण दी.शिन अमेरिका जाकर वर्षों तक हॉलीवुड मे फिल्मों से जुड़े रहे.बाद में दोनों दक्षिण कोरिया लौट गये.उनके दक्षिण कोरिया लौटने पर उत्तरी कोरिया नें दावा किया कि उनके देश ने उनका अपहरण नहीं किया था.वे दोनों स्वेच्छा से अधिक धन कमाने के लालच से उत्तरी कोरिया आये थे.
उत्तर कोरिया ने एक और दुस्साहसी कारनामा दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति चुन डू-ह्वान की हत्या के षड़यंत्र का किया.९ अक्टूबर १९८३ को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति चुन डू-ह्वान बर्मा (म्यांमार) की राजधानी रंगून की यात्रा पर गए.यात्रा में उन्हें वहाँ १९४७ में स्वतंत्र बर्मा के सँस्थापकों में से एक 'आंग सैन' की स्मृति में बने 'शहीद मक़बरे' पर  पुष्पांजलि अर्पित करना थी.राष्ट्रपति के कर्मचारी मकबरा स्थल पर वक्त से इकट्ठा होना शुरू हुए.तभी छत में छिपा कर रखे तीन बमों में से एक का जबरदस्त विस्फोट हुआ.विस्फोट से छत उड़ गई और वहाँ खड़े लोगो पर जा गिरी.इस हादसे में २१ लोगों की मौत और ४६ लोग घायल हुए.मरनें वालों में चार वरिष्ठ दक्षिण कोरियाई मंत्रियो के अलावा राष्ट्रपति के सुरक्षा सलाहकार,अधिकारी थे.तीन पत्रकारों सहित चार बर्मी नागरिक भी मारे गये.
राष्ट्रपति चुन डू-ह्वान भाग्य से ही बचे.यातायात की अव्यवस्था से उनकी कार कुछ मिनट देर से पहुँची.बिगुल वादक ने उनके आनें के वक्त अनुसार वक्त के पहले बिगुल बजा दिया और षड़यंत्र कारियों नें बिगुल सुनकर विस्फोट कर दिया.जाहिर है ये बम उत्तर कोरिया के एजेंटों द्वारा प्लांट किये थे.

उत्तर कोरिया के शासकों नें एक और घृणित कारनामा किया.२९ नवंबर १९८७ को दक्षिण कोरिया की 'कोरियन एयर फ्लाइट 858' जो बगदाद, इराक और सियोल के बीच नियमित उड़ान भरने वाली एक अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ान थी,उसके यात्री केबिन में दो एजेंटों ने अबू धाबी के पहले स्टॉप ओवर के दौरान विमान में डिवाइस और बम लगाये.विमान जब भारतीय सीमा अंडमान सागर के ऊपर से बैंकाक के दूसरे स्टॉप ओवर के लिये उड़ान पर था तो बम विस्फोट हो गया.इस विस्फोट में सभी १०४ यात्रियों और ११ चालक दल के सदस्य (ज्यादा दक्षिण कोरियाई नागरिक थे) मारे गये. 

बाद में विस्फोटक रखने वाले उत्तरी कोरिया के दो एजेंटों में एक महिला और एक पुरुष बहरीन में पकड़े गये.पकड़े जाने पर उन्होंने सिगरेट में छुपे सायनाइड के केप्सूल खा लिये.पुरुष की मौत हो गई लेकिन महिला किम ह्योन-हुई बच गई.किम ह्योन-हुई ने बाद में एक किताब,'द टियर्स ऑफ़ माई सोल' लिखी,जिसमें उसनें बताया कि सेना द्वारा चलाए जा रहे एक जासूसी स्कूल में उसका गहन प्रशिक्षण किया गया.मुकदमें के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसका पूरी तरह ब्रेन वाश किया गया था.उस वक्त उत्तर कोरिया में किम उल सुन का शासन था.किम जोंग-इल जो उसका वारिस बना,यह उसकी साज़िश थी.हुई को मौत की सुनाई गई लेकिन दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति रोह ताई-वू ने मृत्युदंड से बदल कर आजन्म कारावास कर दिया.उधर किम जोंग-इल ने हुई को उत्तरी कोरिया का ग़द्दार घोषित किया.

ऐसे ही उत्तरी कोरिया ने अमेरिका का एक जहाज़ 'युएसएस पुएब्लो' को २३ जनवरी १९७८ को 'रायो द्वीप'के पास गश्त करते हुए हमला कर पकड़ लिया.उसके ८३ लोगों के चालक दल को बंदी बना लिया.इस कार्रवाही में एक अमेरिकी सैनिक की मौत हो गई.कोरिया का कहना था कि यह एक जासूसी जहाज़ हे जो उसकी सीमा में अनाधिकृत घुसा है.अमेरिका कहना था कि वह पर्यावरण अनुसंधान में लगा जहाज है,खुले समुद्र में था,और कोरिया ने उस पर आक्रमण किया है.अमेरिका तब विएतनाम युद्ध में उलझा था और वहाँ राष्ट्रपति लिंडन बी जानसन थे.जहाज और चालक दल को बंदी बनाये रखनें संसार में तनाव बढ़ गया.शीत युद्ध छिड़ गया.कोरिया की तरफ चीन-रूस का ब्लाक था और अमेरिका के साथ दक्षिण कोरिया और अन्य पश्चिमी देश.
ग़ौरतलब है कि आज भी वह जहाज उत्तरी कोरिया के क़ब्ज़े में है और उसे प्योंगयांग में पॉटोंग नदी में 'विक्टोरियस युद्ध संग्रहालय' के रूप में रखा गया है.अमेरिका ने अपने इस जहाज को जहाज़ी बेड़े से औपचारिक रूप से ख़ारिज नहीं किया.उसके स्थान पर दूसरा जहाज इसी नाम का बेड़े में है.यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रम्प-किम जाँग-उन की किसी वार्ता में क्या कभी इस जहाज को वापस माँगा जायेगा ?
१९५३ की शांति संधि के बाद दोनों कोरियाओं के मध्य विसेन्यीकृत क्षेत्र बना.एक तरफ उत्तर कोरिया दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र की सेना,जिसमें दक्षिण कोरिया और अमेरिकन सैनिक थे.विसेन्यीकृत क्षेत्र युद्ध के दौरान बनाये बंदियों के वापस अपनें देशों में जानें के लिये 'पनमुंजम' स्थान पर एक पुल बना था.पुल से एक बार गुजर जाने के बाद वापस लौटा नहीं जा सकता था.इसे 'ब्रिज ऑफ नो रिटर्न' कहा जाता था.दोनों देशों के सैनिक अपनें अपनें क्षेत्रों की अपनी चौकियों पर मुस्तेद रहते थे.उस विसेन्यीकृत जगह पर एक ऐसा 'पापलर प्रजाति' का घना पेड़ था जो दक्षिण कोरिया को उत्तरी कोरिया की गतिविधियाँ देखने में बाधक था.उस पेड़ की अमेरिका के सैनिक कुल्हाड़ी से डालियों की छँटाई कर रहे थे तो उत्तरी कोरिया ने हमला कर अमेरिका के दो सैनिकों को मार दिया और कुल्हाड़ी छीन कर ले गये.इतिहास में इसे 'पनमुंजम एक्स मर्डर इंसिडेंट' के नाम से जाना जाता है.उत्तर कोरिया का कहना था कि इस पेड़ को किम इल-सुंग द्वारा लगाया गया है.इसे काटा नहीं जा सकता.तीसरे दिन दक्षिण कोरिया और अमेरिकी सेना ने पूरी तैयारी के साथ इस पेड़ का केवल २० फुट लंबा तना याद दिलाने के 
लिये छोड़कर,पूरी तरह से छँटाई कर दी.उत्तर कोरिया ने बाद में इन हत्याओं की जवाबदारी स्वीकार की.छीनी गई कुल्हाड़ी को उसने अपनें संग्रहालय में रख दिया.इस सैन्य कार्यवाही में दक्षिण कोरिया के सैनिकों में शामिल मून जेई-इन भी थे जो बाद में दक्षिण कोरिया के २०१६-१७ में राष्ट्रपति रहे.१९९७ में पेड़ के उस तनें के स्थान पर एक स्मारक बना दिया गया.
उत्तरी कोरिया के किम ख़ानदान के इतिहास में अनेकों कारनामें हैं,जिन्होने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत उथल पुथल मचाई है.देखना है कि वर्तमान राष्ट्रपति किम जाँग-उन जो २०११ से ही चर्चा में है,संसार में शांति के लिये क्या कोई सकारात्मक कदम उठाते हैं ?









दलित महिलाओं द्वारा छाती ढँकनें के अधिकार का आंदोलन 125 वर्ष चला

दलित महिलाओं द्वारा छाती ढँकनें के अधिकार का आंदोलन 125 वर्ष चला
                                    🔵 जसबीर चावला 🔵
संसार भर में जाति,धर्म,वर्ण व्यवस्था,लिंग,नस्ल,रंग,के नाम क्रूर अमानवीय अत्याचारों का लंबा इतिहास है।भारत में समाजिक वर्ण व्यवस्था में हम जिन्हे अछूत,दलित,अवर्ण,अस्पृश्य,छोटी जाति,एससी या एसटी कहाजाता हैं,उन पर बहुत अत्याचार हुए हैं।यह सिलसिला अभी भी रुका नहीं है।याद करें हरियाणा के झज्जर में मरी गाय की खाल उतारते दलितों की हत्या या गत वर्ष गुजरात के ऊना की लोमहर्षक घटना,जिसमें दलित युवकों को कथित गौकशी के आरोप में सरे आम नंगे बदन चलती कार से बाँधकर लाठियों से पीटा गया।दलितों को घोड़ी पर न चढ़ने देना,कुँए से पानी न भरनें देना,सार्वजनि श्मशान में मृतक को जलानें से रोकना आज भी होता है।
'अछूत' या 'अस्पृश्य' महिलाओं की हालत और भी खराब रही है।दक्षिण भारत में उन्हें 'देवदासी' के नाम पर ईश्वर को समर्पित किया जाता था और पुजारी वर्ग द्वारा उनका निरंतर यौन शोषण होता था।अब यह 'प्रथा' गैर कानूनी है और सजा का प्रावधान है।समाज में महिलाओं को पुरुषों से कम अक़्ल माना जाता था।उनके लिये शिक्षा वर्जित थी।तीन 'आर' अर्थात रीडिंग,रायटिंग और अर्थमेटिक (अंक गणित) पढनें वाली महिला विधवा हो जायेगी,ऐसा विश्वास तात्कालिक समाज में था।

19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में त्रावणकोर राज्य में अवर्ण-अछूत महिलाओं पर एक ऐसा कर लगाया गय जिसके बारे में आज भी सोचकर रूह काँप जाती है।यह इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसे जानकर आँखे आत्मा शर्म और ग्लानि से भर आती हैं।इन अछूत महिलाएँ,जिनमें एजवा,शेनार या शनारस,नाडार,जैसी जाति की महिलाएँ शामिल थी,को सदियों से शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़ा पहिनने की इजाज़त नहीं थी।उन्हे छाती को अनावृत यानें की पूरी तरह खुला रखना होता था।अगर कोई महिला ऊपर के कपडे को पहिनना या ओढ़ना चाहे तो उसे राज्य को टैक्स देना होता था।इस प्रथा को मलयालम में 'मुलाक्करम' कहा जाता था।लड़कियों के स्तन विकसित होनें की उम्र का होते ही उन पर इस कर की जवाबदारी आ जाती थी।विधवाओं को कमर में 'मुंडू' नाम का मोटे कपड़े का वस्त्र धारण करना होता था।
इस पर त्रावणकोर राज्य के 'चेरथला' गाँव में अछूत 'एजवा' जाति की एक साहसी महिला नंगेली ने सन 1803 में 'मुलाक्करम' (स्तन कर-ब्रेस्ट टैक्स) का डट कर विरोध किया।अपनी छातियों को अनावृत रखनें से इंकार किया।जब राज्य के कर अधिकारी,जिसे 'प्रथवियार' कहा जाता था,ने कर के लिये दबाव बनाया तो उस महिला नें अपनें स्तन काटकर पेड़ के पत्ते पर रख कर उसे सौंप दिये।अधिक खून बह जानें से एजवा जाति की उस महिला की मृत्यु हो गई।
उसका पति चिरुकंदन इस घटना से अत्यंत दुखी हुआ।उसनें भी इस कुप्रथा और पत्नी वियोग में अपनी पत्नी की चिता में कूद कर प्राण त्याग दिये।इस घटना के बाद इस घृणित प्रथा का विरोध शुरु हो गया।कई आंदोलन हुए और स्तन टैक्स को राजा द्वारा समाप्त करना पड़ा।उस महिला के निवास का नाम 'मुलचिमारम्बु' अर्थात मलयालम में मतलब 'छाती वाली महिला' का निवास पडा।प्रसंगवश केरल के इस चेरथला कस्बे से हमारे आज के नेता ए के एंथोनी,व्यालार रवि और क्रिकेटियर प्रसन्ना आते हैं।
राजय द्वारा नंगेली से टैक्स की वसूली के बदले अपनें स्तन काट कर देनें की यह घटना 1803 की है।कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जब इस टैक्स का व्यापक विरोध शुरु हुआ तो 1812 में यह टैक्स लेना बंद कर दिया गया,लेकिन स्तन ढकनें पर रोक जारी रही।नंगेली के वियोग में उसकी चिता में जल कर मरनें वाला उसका पति पहला 'सती पुरुष' था।आज नंगेली की स्मृति में चेरथला में उसका कोई स्मारक नहीं है ओर वह जिस जगह पर निवास करती थी वह जमीन टुकड़ों में बँटकर कई लोगों की संपत्ति है।
इस घृणित प्रथा के पीछे सामाजिक वर्ण व्यवस्था का अभिशाप था।निम्न वर्ग की अछूत महिलाओं को तो अन्य सभी वर्णों के सम्मान मे सार्वजनिक रूप से शरीर का ऊपरी भाग अनावृत रखना ही होता था।वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ अन्य समुदायों जैसे नायर आदि की महिलाएँ अछूतों के सामनें ऊपरी वस्त्र धारण कर सकती थी,लेकिन उन्हें नंबूदरीपाद ब्राह्मण समाज के सामनें धारण की इजाज़त नहीं थी।उच्च नंबूदरीपाद ब्राम्हण केवल केवल भगवान की मूर्ति के समक्ष ऊपरी वस्त्र नहीं पहिनते थे।
महिलाओं के ऊपरी वस्त्रों के धारण के अधिकार को लेकर अछूत समुदाय को 125 सालों की लंबी लड़ाई 1924 तक लड़ना पड़ी।इस कुप्रथा को निरंतर जारी रखनें वाले पक्षों के अपनें तर्क थे।इस घृणित कुप्रथा का अंत हुआ,कैसे एक समाज को मानवीय गरिमा मिली,इसका इतिहास जानना,पढ़ना,समझना हमारे लिये एक अनुभव होगा।
ब्रिटेन से ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आनें के बाद ईसाई मिशनरियों का आगमन हो चुका था।वर्ण व्यवस्था की क्रूरता से अछूत समाजों की हालत बेहद दयनीय थी।वे मिशनरियों के माध्यम से ईसाई बनने लगे।तब ईसाई धर्म में सामाजिक रूप से बराबरी,सेवा और सामाजिक समरसता थी।
इसे लेकर वहाँ पुरानें रीति-रिवाजों,परंपराओं और नवाचार से तनाव और टकराव बढ गया।नाडार,एजवा आदि महिलाओं के हक़ों के लिये समाज में बेचेनी थी।लोगों की इस बेचेनी को भाँप त्रावणकोर के राजा के दिवान कर्नल जान मुनरो नें,जो अंगेज़ था,1813 में धर्मातरित अछूत ईसाई महिलाओं को छाती के ऊपर कपड़ा पहिनने की इजाज़त दे दी।उच्च वर्ण की महिलाएँ अपनें कँधे और छाती को ढांकती थी।उनके इस आदेश को राजा की परिषद में उच्च वर्ण के लोगों नें चुनोती दी।तर्क दिया गया कि इससे वर्ग-वर्ण भेद की सामाजिक प्रथा,और ताना बाना टूट जायेगा।नीची जातियाँ ऊंची की बराबरी करेंगी।इन महिलाओं को छाती ढँकने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।उधर अनुमति मिलने से और भी नाडार,एजवा महिलाओं ने ईसाई धर्म स्वीकार करना शुरु कर दिया,और उन जैसे लंबे कपड़े पहनना शुरु कर दिया।
1822 में अछूत ईसाई महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बुरी तरह प्रताडित किया गया।राजा की कोर्ट में मामला फिर से गया।प्रश्न था की क्या पूरे कपड़े पहिनना ईसाई धर्म का अनिवार्य हिस्सा है ?मिशनरी चार्ल्स मीड ने सिद्ध किया कि यह जरुरी है।कोर्ट नें बात मान ली और इन महिलाओं को ऊपरी वस्त्र पहनने की इजाज़त जारी रही।
1827 में महिलाओं का फिर से सरेआम उत्पीड़न हुआ।उनके वस्त्र उतारे गये।बेइज्जत किया गया।मार-पीटा गया।ईसाई स्कूल-चर्च जलाये गये।मिशनरियों ने त्रावणकोर राजा से न्याय की मांग की।फरवरी 1829  को त्रावणकोर की रानी नें घोषणा की कि इन धर्मातरित नाडार,शेनार,एजवा महिलाओं को भी कोई राहत नहीं दी सकती।अन्य दलित महिलाओं के समान इन्हें भी सामाजिक व्यवस्था में ऊपरी कपड़े पहिनने का कोई अधिकार नहीं है।समाज में जबरदस्त बेचेनी थी,आंदोलन होते रहे।उधर समाज में ऊपरी हिस्सा ढकनें वाले वस्त्रों के पहिनने का चलन भी अछूत महिलाओं में बढ़ता जा रहा था और उन पर आक्रमण भी बढ़ते जा रहे थे।मिशनरियों पर भी हमले बढ़ गये।कुप्रथा ज्यों की त्यों रही।राजा के तात्कालिक दीवान ने दो टूक कह दिया कि 1829 का रानी का आदेश ही लागू माना जायेगा। ऊपरी वस्त्र पहिनने वाली महिलाओं को दंडित किया।
इस आदेश के विरुद्ध लोग पुन:राजा के पास गये।राजा से असंतुष्ट होकर 1859 में (तब देश में अंग्रेज़ों का कई स्थानों पर शासन थ) मद्रास के गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन के पास मिशनरी जेम्स रसेल,जॉन एब्स,जॉन कॉक्स और फ्रेडरिक ने अपील की।अंग्रेज़ गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन नें इस पर अपना आदेश किया।उस आदेश अनुसार त्रावनकोर राजा के दीवान नें राज्याज्ञा का प्रकाशन 26 जुलाई 1859 को किया।आदेश अनुसार अस्पृश्य नाडार,शेनार,या अन्य अछूत महिलाएँ भी ईसाई नाडार,शेनार महिलाओं की तरह के कपड़े पहिन सकती हैं या तो अन्य नीची जाति की 'मुकावट्टीगल' (मछुआरनों) के समान मोटे कपड़े से ऊपरी भाग ढँक सकती हैं लेकिन फिर भी उन्हें ऊँचे स्वर्ण वर्ण की महिलाओं के समान कपड़े पहिननें का अधिकार नहीं होगा।
नाडार महिलाओं ने इन प्रतिबंधों को अनदेखा किया और वस्त्रों की ऐसी शैली विकसित की जो कि उच्च वर्ग हिंदू महिलाओं की शैली जैसी ही थी।उच्च वर्ण,मिशनरिया और दलित वर्ग सब 26 जुलाई के आदेश से संतुष्ट नहीं थे।और सबनें इसका किया।ईसाई इसे समानता के अधिकारों के विरोध में मानते थे और ब्राहम्ण इसे धर्म में दख़ल मानते थे।मद्रास के तात्कालिक गवर्नर ने उस वक्त सामाजिक सुधार और चेतना पर जो आदेश दिया उसमें लिखा कि इन अछूत महिलाओं के संदर्भ में सतत जारी यह प्रक्रिया अन्यायपूर्ण प्रकृति की है।आने वाली दुनिया हम पर  रोएगी कि हमनें इस अवसर को अपनें हाथों से जानें दिया।आखिर 1865 के आदेश द्वारा सबको ऊपरी वस्त्र पहिनने की आजादी मिली।
अछूत महिलाओं को उचित वस्त्र न पहिनने के देनें के विरोध में दलित समाज सुधारक अयंकली नें (1863 – 1941) ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत त्रावनकोर में खूब काम किया।उन्होने लोगों को संगठित कर सशक्त तरीके से इस कुप्रथा का विरोध किया।समाज में जागृति के लिये स्कूलों की स्थापना पर जोर दिया.1980 में दिवंगत प्रधानमंत्री  श्रीमति इंदिरा गाँधी नें 'कोवदिअार्सक्वेअर' में उनकी मूर्ति का अनावरण किया।

ऐसे ही नारायण गुरु थे। (1854-1928) वे अध्यात्मिक संत थे और वे भी एजवा निम्न समुदाय में पैदा हुए।उन्होने भी केरल समाज के वंचित तबके,महिलाओं की गरिमा बहाल करनें,और उनके उत्थान के लिये खूब काम किया।उन्होंने सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया,जातिवाद को खारिज किया,और आध्यात्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के नए मूल्यों को बढ़ावा दिया।नारायण गुरु ने धार्मिक तीर्थयात्रा का लक्ष्य वंचितों में शिक्षा, स्वच्छता, भगवान की भक्ति, सामाजिक संगठन,कृषि,व्यापार,हस्तशिल्प और तकनीकी प्रशिक्षण का प्रचार करना बताया।रवीन्द्रनाथ टैगोर नें नारायण गुरु से 1922 में मिलकर कहा उन्हें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो नारायणगुरु से अधिक या उनके समकक्ष भी अध्यात्मिक प्रतिभा रखता हो।

ऐसे लोगों के अथक प्रयासों,कानून बनने के बावजूद भी महिलाओं के ऊपरी वस्त्र पहिननें का विरोध 1924 तक होता रहा।सामाजिक व्यवस्थाओं की बेड़ी में जकड़े एक बीमार समाज में एक आंदोलन 125 सालों तक महिलाओं के ऊपरी पहिनने वस्त्र पहिनने लिये आंदोलित रहा हो क्या यह हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है ?

समय के अंतराल से दक्षिण भारत की इन अस्पृश्य जातियों में से कई धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनें।कई जाति परिवर्तन कर क्षत्रिय बननें से ऊंची जातियों में आ गये।आर्थिक स्थिति बेहतर होनें,नये काम धँधों,बेहतर नौकरियों आदि के कारण अब नाडार,एजवा जैसी जातियाँ और सारे सरनेम दक्षिण भारत में दलित नहीं माने जाते।ताड़ी के पेड़ों पर चढ़कर ताड़ी निकालनें वाले नाडार समुदाय,ने 1813 -1859 तक अस्पृश्यता का सतत विरोध 'शेनार रिवोल्ट' में किया वे भी कई अन्य जातियों,व्यवसायों में चले गये हैं और पंरपरागत काम छोड़कर बेहतर स्थिति में हैं।

सन 2006-07 से एनसीईआरटी द्वारा अनुमोदित कक्षा 9 के सीबीएसई के पाठ्यक्रम में एक पाठ विद्धार्थियों को पढ़ाया जाता था।पाठ का शीर्षक था 'कास्ट कान्फिल्ट एँड ड्रेस चेंज।पाठ दलित महिलाओं के ऊपरी कपड़े के पहिनने के अधिकार और लंबे संघर्ष के बारे में था।इस पाठ को सीबीएसई के पाठ्यक्रम से अचानक सन 2017 में 19000 स्कूलों से यह कह कर एनसीईआरटी के निदेशक ऋषिकेश सेनापति द्वारा हटा दिया गया कि डीएमके, एआईएडीएमके के कुछ सांसदों नें आपत्ति ली है।दूसरी और पुस्तक की समन्वयक प्रोफेसर किरण देवेंद्र ने नें कहा कि किसी भी छात्र या अभिभावक नें इस पाठ के बारे में कभी कोई शिकायत नहीं की है।जाहिर है कथित भावनाओं के आहत होनें और राजनैतिक तुष्टिकरण का थोथा बहाना किया गयाथा।अतीत में जाकर पुस्तकों से हटानें से इतिहास नहीं मिटाया जा सकता,न बदला जा सकता है।वर्तमान को ठीक किया जा सकता है।

आज भी देश में कई स्थानों पर इन दलित जातियों पर अत्याचार,उत्पीड़न के समाचार आते रहते हैं।इन जातियों के विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण से जहाँ उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई हैं,वहीं राजनैतिक कारणों से समाज में गहरा तनाव भी बढ़ा है।









Saturday, December 1, 2018

तालिबान का मंगल यान

तालिबान का मंगल यान
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'तालिबान' नें मंगल ग्रह पर अरबों डालर के मिशन पर 'तालियान' भेजा.


1.10 रात.बजे क्रूज से अलग होनें की स्टेज शुरु.
1.17 रात.यान का मंगल की कक्षा में प्रवेश.
1.21 रात.पेराशूट खुला.
1.23 यान के लेग खुले,पेराशूट यान से अलग हुआ.
1.24 रात.यान ने मंगलग्रह को छुआ.

तुरंत ही यान के अंदर से आवाज आई 'अल्लाह हू अकबर' और यान ने खुद को 'आत्मघाती बम' से उड़ा लिया.😜