Saturday, October 25, 2014

कटी दुमों का मौसम

कटी दुमों का मौसम
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कटी दुमों का मौसम 
''''''''''''''''''''''''''''''
दुम 
चला चली की आशंका
हो चली गुम

पद पैसा पद्म के लिये हिलती दुमें
कुर्सी के लिये अकुलाती दुमें
बुद्धिजीवी पत्रकार दुम
लार टपकाती
अकादमिक समाजसेवी की दुम
ज़ोर जोर से हिल रही दुमें
टाँगों के मध्य दबी दैन्य दुमें 
दासभाव ओड़े दमदार दुमें
नये दुम काल के नये समीकरण 
जिसका राज उसके पूत
सिरे से कटी दुम बोली बोझ है यह
तीन सौ साठ डिग्री घुमा दो 
अब दुम का नहीं दुमछल्लों का काम है 

पीछे देखो कहीं हिल न जाये
टाँगों के बीच दब न जाये 
सलामत रहे तुम्हारी दुम

Friday, June 6, 2014

खंडित द्रौपदी

खंडित द्रौपदी
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न खाने की थी न पीने की वस्तु थी 
माँ कुंती का आदेश था
पाँच आज्ञाकारी बेटों में बँट गई

द्रौपदी तब से बँटी ही है

Thursday, June 5, 2014

जागो

जागो
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चापलूसी
जय जयकार
छुपे भेडिये
भेड़ की खाल
लुट रहा माल
बँट रहा देश
बुरा हाल
जागो

कबीर की लापता चादर

कबीर की लापता चादर

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'दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया'

इतनी ही पूँजी थी 

फक्कड़ जुलाहे की

खुद ओढ़ता बिछाता

सबको ओढ़ाता 

मन में तहा कर रखी चादर

फटनें न दी जीते जी चादर

अब खो गई है वह

ढूँढ रहे हम कबीर की लापता चादर

हिन्दुओं सिक्खों मुसलमानों में

काशी क़ाबा अयोध्या में

बाबाओं के धोबी घाटों में


गंदे कपड़ों के ढेर मिलते हैं

धर्म की दुकानें,घृणा मिलती है

सद्भाव नहीं मिलता

भाईचारा नहीं मिलता

खोई चादर नहीं मिलती

कबीर नहीं मिलता

कुप्पा

कुप्पा
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कर दूँ चीन के दाँत खट्टे
पाकिस्तान का मुंह तोड़ दूँ
डरे अमेरिका मुझसे
सारी कायनात डरे
हर बीमारी का इलाज हे मेरे पास
सर्वशक्तिमान
विकास हो या विनाश
हर समस्या का हल
रुठी प्रेमिका को मनाना है
उठाना है
संतान होने की गारंटी
विवाह / मुकदमें में जीत
मेल बेमेल रिश्ते ही रिश्ते
वशिकरण जानता हूँ
एक बार मिल तो लें

रोड शो

रोड शो
------
चुनाव खत्म हुए
राजनैतिक रोड शो ख़त्म हुए
रोड पर जो रहते थे
अब भी वहीं रहेंगे
उनके बच्चे
उनके भी बच्चे
राजनीति के रोड मेप में उनका कोई स्थान नहीं
वे वहीं मरेंगे
भूख से बिमारी से
सलमान की बेक़ाबू गाड़ी से

तमाशबीन जुटते हैं
किराये पर मिलते है
रामलीला हो या फ़ैशन शो हो
राजनैतिक रोड शो हो

शो मस्ट गो ऑन


पाठक की व्यथा

पाठक की व्यथा
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खूब बिक रहा अख़बार
पाँचो उँगलियाँ घीं में
जब से 'बिका' मालिक और उसका अखबार

नये देवताओं की तलाश

नये देवताओं की तलाश
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कभी हम थे तैंतीस करोड़ 
तैंतीस करोड़ देवता थे
एक के लिये एक देवता

हम बढ़ कर एक सौ तीस करोड़ हुए
देवता बढ़े नहीं 
उन पर बोझ बड़ा
चार आदमी के लिये एक देवता
बहुत नाइंसाफ़ी है
भार से लदे देवता हमें माफ़ करे
अब किस देव की उपासना हम करें

तलाशें नये देवता ईश्वर
धर्मस्थल क़ब्ज़ाएँ 
पहाड़ों नदियों गुफाओं का अतिक्रमण करें  
नये धर्म स्थल बनाएँ 
सड़कों चौराहों पर लाल पत्थर लगाएँ 
नये देवताओं का जश्न मनाएँ

इतिहास का परिहास:मेरा टेसू वहीं अड़ा

इतिहास का परिहास
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सिकन्दर लौटा था पँजाब से वापस
इनका बिहार तक गया
भगतसिंह / राजगुरू / सुखदेव बंद थे लाहोर जेल में
इन्होंने अंडमान भेजा
आज भी तक्षशिला पाकिस्तान में है
इन्हें बिहार में मिला
इतिहास पर भारी अज्ञान
'मैं चाहूँ यह कहूँ मैं चाहे वह कहूँ मेरी मर्ज़ी'






चलो मर्द बनो

चलो मर्द बनो
—————
     
देश का वीरगाथा काल
घर घर में रोपेगें अश्वगँधा
मुफ्त मिलेगी शिलाजीत की पुड़िया
लोक गीत में किन्नर गाते थे
'हाय हाय आग लगे तेरे अश्वगँधा के खेत में'
किन्नर अब गा न सकेंगे
दिन फिरे बाबाओं भाटों के
चरमराती खाटों के
भारतमाता की जय बोलो
लाठी चलाओ
मर्द बनाने का काम प्रगति पर है
फटाफट अपना नाम लिखाओ

🌿 जसबीर चावला 
       6/5/2014 


उपयुक्त स्थान

 उपयुक्त स्थान
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बहुत सिर चढ़ गया भगवान
थोड़ा करें किनारे
कम दुलारें
🔹
कहीं बस्ती में भेजें
उसे इंसान बनायें
सिर से उतारें

पाँचों उँगलियाँ घीं में

पाँचों उँगलियाँ घीं में
——————–—

मीडिया का स्वर्ण काल
बिकाऊ रीढ़
पुष्य नक्षत्र
धनतेरस
खबरों का अकाल
अब यही है 'बड़ी खबर'
बरस रहा सोना
अख़बार और टीवी पर

☘  जसबीर चावला





सवाल करने में दिल लगता है

सवाल करने में दिल लगता है
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टोपी उतारते हैं
स्याही पोतते हैं
मुक्का मारते
जूता फेंकते
पत्थर फेंकते 
घेराव करते
अफ़वाहें फैलाते हैं
बन पड़े सब करते हैं

बस सवाल नहीं करते
सवाल करनें में दिल लगता है
दिमाग़ भी लगता है


Monday, March 24, 2014

तृष्णा :भाग रहे

तृष्णा : भाग रहे
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सोये हैं
कहते जाग रहे
रामायण से कुछ नहीं सीखा
स्वर्ण मृग था नहीं
पीछे भाग रहे

Sunday, March 23, 2014

शांत रहें दलबदल चालू है

शांत रहैं दलबदल चालू है 

यूँ ही कम थी रीढ की हड्डियाँ
कुछ लग गई उन्हें जो थे केंचुआ
तनते कैसे
बिना शर्म हया के रेंग रहे
इस दल से उस दल में
दलदल में पेल रहे

उनका सच है
असंतुष्ट सुकरात से संतुष्ट सूअर अच्छा है
लोकतंत्र से खो खो खेल रहे



Thursday, March 13, 2014

चुनावी दिनों में दलबदल का दांपत्य

चुनावी दिनों में दलबदल का दांम्पत्य
 —————————————

चुनाव के पहले जो 'निकाह' क़ुबूल थे
तलाक तलाक में बदले
'सप्तपदी' ने गरिमा खोई
'आनंद कारज' ने मैली चादर ओढ़ी
अवैध 'मैत्री क़रार' गुजरात से चला
राजनैतिक दलों में आया
दलों के दूल्हे बेचैन बेक़रार
कहीं विवाह से पहले हनीमून हुआ
बिना रिलेशन के 'लिव इन' हुआ
गाँठे खुली नये गठबँधन बने
कई अपनें बच्चों को बारात में ले गये
कईयों के बगल बच्चे पीछे छूट गये
कहीं बाराती दूसरे दूल्हे के साथ हो लिये
रिश्तों की परिभाषा बदली
नैतिकता अपराध हुई
लोकतंत्र का क्या हुआ
चुनाव बिगड़ा दांम्पत्य हुआ

















Wednesday, March 12, 2014

राम की माया रामविलास

राम की माया रामविलास
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राम जी की कृपा
रामकृपाल रामविलास रामदास
'उदित'हो गये
'भागीरथ' प्रयत्न किया
मन मुदित हो गये

बरसों जम कर कोसा
शब्दबाण चलाये
अब 'मिठी लगे रे तेरी गारी रे'
किसी ने क्या छेड़ा
कुपित हो गये


Saturday, March 8, 2014

परहेज़

परहेज़
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न गुड़ दिया
न गुलगुले
परहेज़ करूँ
किससे.... ?




Monday, February 24, 2014

आठ कणिकाएं

आठ कणिकाएं
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बीते
दिन रीते
~*~
रूक
मत झुक
~*~
आई
रुकी गई
~*~
आग
गई जाग
~*~
प्रेम
खुला फ्रेम
~*~
रात
खुला गात
~*~
दिन
तारे गिन
~*~

पल
आना कल




चुप्पी २

चुप्पी २
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इन दिनों क्या नहीं टूटा
रिश्ते टूटे
संस्कार वर्जनाएँ टूटी
बस न टूटी
तुम्हारी चुप्पी


बस मुस्कुराईये

बस मुस्कुराइए
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मुस्कुराईये बस मुस्कुराइये
बेबात मुस्कुराइये
कोण से मत नापिये
बस मुस्कुराईये
किसी बहाने से मुस्कुराईये
बिना बहाने के मुस्कुराईये
बस मुस्कुराईये

मोनालीसा क्यों मुस्कुराई उसे छोड़ो
पर्याप्त है मुस्कुराई
नहीं खुला न खुलेगा
उसकी मुस्कुराहट का भेद
इस बात पर भी मुस्कुराइये

सोये शिशु की अबोध मुस्कान
मां के चेहरे पर मुस्कुराहट
मां की मुस्कान पर
आप भी मुस्कुराईये
दूध पीते बछड़े को देखिये
नन्हें बच्चे को खेलते
पानी में बदख तैरते
आसमान में पंछी उड़ते
इस पर भी मुस्कुराईये
बस मुस्कुराईये








Saturday, February 22, 2014

अकाल मृत्यु

अकाल मृत्यु
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कुछ पैदा होते हैं
असमय 
झरने के लिये 

ओर कहीं विचार
जन्म / समय से पहले
जमने के लिये

पर पीड़क

पर पीड़क
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किसी की
क्रीड़ा
*
किसी की
पीड़ा

क्यों

क्यों
-----

सब
दूसरों को
ढो रहे 

क्या पा रहे
क्या
खो रहे 
००

हम उनके आभारी हैं

उनके आभारी हैं
---------------
चट कर गये
हमारे हिस्से का अमन चैन
हम सब पर भारी हैं


विडम्बना है
फिर भी हम उनके आभारी हैं


ख़ुदा खुदाई और ख़िदमतगार


ख़ुदा खुदाई और ख़िदमतगार
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एक दो मोहल्ले नहीं हर तरफ़  ख़ुदा रखा है
किस ख़ुदा की बात करूँ शहर ख़ुदा रखा है.

किस तरफ़ से किधर जायें पता वहीं चलता
परेशाँ  हर बशर हर विभाग ने ख़ुदा   रखा है.

दिन रात खुदाई से आजिज़ ख़ुदा कहाँ जाये 
खुदा बंदों से खुद पूछे बता कहाँ ख़ुदा रखा है.

देख ली तेरी खुदाई  ज़रा इनकी खुदाई देख
इसने भी खुदा रखा है उसने भी ख़ुदा रखा है.

ख़ुदा को सजदा करने चले ख़ुदा के नेक बंदे
खुदा की हर राह को भी इन्होंने  ख़ुदा रखा है.

                  🦉 जसबीर चावला

अमर उठ

चुनावी पाठशाला
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अमर उठ अब उठ
बहुत सोया
सो मत रो मत
बहुत खोया अब खो मत
*
बक बक मत कर
चख चख मत कर
मत मत मत कर
मतदान कर
*
अब चल चाल चल
दल दल सब दलबदल
इनका छल बल बाहुबल
इनकी करनी करनी का फल
*
लगा अकल दे बदल
'मत'-मत बता 
इनकी गत बना
इनकी औक़ात बता
मतदान कर सरकार बना

नारायण भगोड़ा सांई

नारायण भगोड़ा सांई
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पुलिस क्यों नहीं सम्पर्क करती
ढूंढने भगोड़े सांई को
उनसे

तीनों लोकों में वीणा बजाते दिन रात
पुकार लगाते हमारे अपने
नारद मुनि से

जो जानते हैं कहाँ है नारायण
नारायण नारायण
मनुहार कर कहें तो ज़रा
दिल से

नारायण नारायण

ख़बरदार खबर

ख़बरदार खबर
---------------
बिना खबर के 
खबर बनती है
बे खबर रहे तो 
खबर बनती है
*
खबर यह है कि
कोई खबर नहीं
बाखबर हो तो
खबर बनती है
*
खबर की आड़ में
खबर होती है
छुपाओ खबर
खबर बनती है
*
बेपर की उड़ाओ 
खबर उड़ती है
ठीये पाये की हो
खबर बनती है
*
खबरों में रहना है
तो फ़ंडा सीखो
इस्तेमाल करो
खबर बनती है
*
खबर से बचना
ख़बरदार रहो
हर लम्हें यहाँ
खबर बनती है

खबरों की मण्डी है हुज़ूर आप बाखबर रहिये
खबर  बन  जायें  कहीं ओर खबर  भी ना  हो

दिल्ली में प्याज

दिल्ली में प्याज
-------------
दिल्ली की सड़कों पर
शीला आंटी
लगाती आवाज़
बेचती प्याज
प्याज़ लो प्याज़
*
रस्ते का माल सस्ते में
वोटर पलट
देख तेरा ध्यान किधर है
प्याज़ की दुकान इधर है
सस्ता प्याज़
शीला की छबड़ी का प्याज
*
मोदी / शिवराज / ममता
रमण / जयललिता
लगेगी कब इनकी छबड़ी
आयेगी कब इनकी आवाज़
प्याज़ लो प्याज़
देश में और भी हैं
 हवाबाज 

चुनाव आयोग में आग

चुनाव आयोग में आग
----------------------

आग लगी है
बताएँ कहाँ लगी है
चुनाव आयोग में लगी है
माफ करें पानी नहीं है
कुँए खोद नहीं सकते
आचार संहिता लगी है 

जज की आचार संहिता

जज की आचार संहिता
------------------------
जज साहब अब हम साथ नहीं रह सकते

बहुत हो गया सहते सहते 
ख़त्म करें मुकदमा

अब जारी कर ही दें
तलाक का आदेश
मिटें सब दुख क्लेष चिंता

जज ने सिर हिलाया
कुछ दिन अभी ओर भुगत
घोषित हो चुकी है आचार संहिता

बेटी की आचार संहिता

बेटी की आचार संहिता
------------------------


पत्नि ने तल्ख़ी से कहा पति को
मैं न कहती थी 
जल्दी जाओ
बहू को बिदा करा लाओ
अब मना कर देगा बहू का पिता

हँस कर कहेगा क्षमा समधीजी
बेटी भेज नहीं सकता 

आप जानते ही हैं
लग चुकी है आचार संहिता

आचार मुक्त आचार संहिता

आचार मुक्त आचार संहिता
--------------------------


लगती है लग जाये आचार संहिता
हमारे आचार / विचार / संस्कार अलग
क़ानून / दलील / नज़ीर अलग
ठसक / अकड़ / गुरुर जुदा

ठेंगे पे आचार संहिता
हमारी अपनी 'मुक्त संहिता'

सुना नहीं शत्रुघ्न का जुमला
ख़ामोश हम जहाँ खड़े होते वहीं से लाईन शुरु होती

दबंग हैं हम जो कहें वही आचार संहिता

हम नोट बाँटे / झाँझ बजाएँ
दारू पिलाएँ 
नफरत फैलाएँ
हमारा यही आचार व्यवहार है
तुम लिये बैठे रहो अपनी किताबी आचार संहिता

सास बहू की आचार संहिता

सास बहू की आचार संहिता
-----------------------------


सास ने कहा बहू से
जानती हूँ मैं
अच्छा लगता है अचार तुझे 'इन दिनों'

छोड़ चिंता

खा ले तू भी खा ले
जब सारे दल खा रहे
तोड़ रहे हैं 'आचार संहिता'

००

बेटी की आचार संहिता
------------------------


पत्नि ने तल्ख़ी से कहा पति को
मैं न कहती थी 
जल्दी जाओ
बहू को बिदा करा लाओ
अब मना कर देगा बहू का पिता

हँस कर कहेगा क्षमा समधीजी
बेटी भेज नहीं सकता 

आप जानते ही हैं
लग चुकी है आचार संहिता

जज की आचार संहिता
------------------------
जज साहब अब हम साथ नहीं रह सकते

बहुत हो गया सहते सहते 
ख़त्म करें मुकदमा

अब जारी कर ही दें
तलाक का आदेश
मिटें सब दुख क्लेष चिंता

जज ने सिर हिलाया
कुछ दिन अभी ओर भुगत
घोषित हो चुकी है आचार संहिता

हनीमून पर आचार संहिता
---------------------------
विवाह बाद
कब कहाँ जायेगा हनीमून
नव विवाहित जोड़ा
बोला समधन से कन्या का पिता

परिहास से बोली समधन
कैसे जा सकते हैं
चुनाव घोषित हो गये
लग चुकी है 'आचार संहिता'

चुनाव आयोग में आग
----------------------

आग लगी है
बताएँ कहाँ लगी है
चुनाव आयोग में लगी है
माफ करें पानी नहीं है
कुँए खोद नहीं सकते
आचार संहिता लगी है 

हनीमून पर आचार संहिता

हनीमून पर आचार संहिता
---------------------------
विवाह बाद
कब कहाँ जायेगा हनीमून
नव विवाहित जोड़ा
बोला समधन से कन्या का पिता

परिहास से बोली समधन
कैसे जा सकते हैं
चुनाव घोषित हो गये
लग चुकी है 'आचार संहिता'

राजनीतिक आकाश

राजनीतिक आकाश
———————

वे ख़ुश हैं
अख़बार में नहीं देखते
कब होता है सूर्योदय -'सनराइज़'
क्यों देखें
उनके सारे 'सन' राइज़ कर रहे हैं
राजनीति के आकाश में
*
उधर वो दुखी हैं
बहुत अप सेट हैं
उनके सारे पुत्र राजनीति में पप्पू
ढलते सूरज
'सनसेट' हैं

संत और अदालत

संत औरअदालत
'''''''''''''''''''''''''''''''
बड़ा     संत
बड़ा  वक़ील

ऊंची अदालत
बड़ी    दलील

बार       बार
नई     अपील

उड़ी   फ़ाख्ता
मिंया   ख़लील

लौटे      बुद्धु
हुए     ज़लील
**

स्खलन

स्खलन
ंंंं
स्खलन चाहे भू का हो
हिम का
धर्म का हो
आश्रमों में हो
विचारों का हो
स्खलन ही है

**

रामलीला मैदान

रामलीला मैदान
''''''''''''''''''''''''''''
रामलीला मैदान 
अब नहीं होती क्रांति
दिखता है शोर शराबा
आभास / छलावा 
भ्रम / भ्रांति
वहां रामजी की 'लीला' कम
राजनैतिक नोटंकी ज़्यादा
लंबा मौन / विश्रांति

जंतर मंतर

जंतर मंतर
'''''''''''''
जंतर मंतर
परजातंतर
धरना अनशन
लाठी गोली
दे दनादन
फ़ायर ब्रिगेड 
टन-टन टन-टन
क ख ग संघर्ष करो
हम तुम्हारे साथ हैं
उधर देखो
भागे नेता
गिली गिली
छूमंतर

सख़्त जरुरत है

सख्त जरूरत है
''''''''''''''''''''''''''''
उन्हें चाहिये
खाली दिमाग
और
खाली लिफाफे
कूडा भरने के लिये
और बंदे भी
फ़साद में काम आएँ
मरने के लिये
००

हंगामा है क्यों बरपा

हंगामा है क्यों बरपा
''''''''''''''''''''''''
प्रकाशित हुए नाम और सूची
हंगामेदार सदस्यों की
सदन में फिर हो गया
जोरदार हंगामा
०००

पैसे की नियति

पैसे की नियति
------------
गड्ढों का पैसा
गड्ढे में
नाली का बहे
नाली में
००० 

वकार

वकार
------
तुम क्या
पत्थर मारोगे

खुद ही
पथरा चुका हूं

आल इज वेल

आल इज वेल
ंंंंंंं
मम्मी मम्मी
हां बेटा
राजनीति खेलें
हां बेटा
मम्मी का बेटा
हां बेटा
पापा का बेटा
ना बेटा
?.....?.......?

सीख : राजनीति में कोई स्थाई दोस्त,दुश्मन या सगा नहीं होता

दंगों का मौसम आ गया

दंगो का मौसम आ गया : मुनादी 
--------------------------------

हर खास और आम को इत्तला
ढम...ढम...ढम...ढम.........

नंगो का मौसम आ गया
जंगो का मौसम आ गया

गाय गाय का मौसम आ गया
हाय हाय का मौसम आ गया
  
फिज़ा में चुनाव तैर रहे
दंगो का मौसम आ गया
  *
ढम...ढम...ढम...ढम.........

आओ गठबंधन तोड़ें

आओ गठबंधन तोड़ें
ंंंंंंंंंं


घात           हुआ
प्रतिघात      हुआ
          
+
तनी        मुट्ठियां
आघात       हुआ
            +
शब्द  बाण    चले
विश्वासघात  हुआ
            +
गुर्राये   बड़बड़ाये
सन्निपात     हुआ
             +
पेट दिमाग बंद  हुए
शहर में उत्पात हुआ
              +
मर   गई     संवेदना
मन में पक्षाधात हुआ
***

नौ कणिकाएं

नौ कणिकाएं
-------------

बीते
दिन
रीते
~*~

पल
आना
कल
~*~
रूक
मत
झुक
~*~
आई
रुकी
गई
~*~
आग
गई
जाग
~*~
प्रेम
खुला
फ्रेम
~*~
रात
खुला
गात
~*~
दिन
तारे
गिन
~*~
हारा
जग
मारा
***

          "आय बट व्हाय"-"हूं पर क्यूं"-इंग्लिश में लिखी इस अर्थ पूर्ण कविता की तर्ज पर ये लघू कणिकाएं/कविताएं अचानक एक कौंध-एक छपाक् की ध्वनि करती हैं ओर फिर गहरा मौन/गुड़ुप...........!

ये तो बददुआ करते हैं

ये तो बददुआ करते हैं
----------------------

ये    न      दवा   करते   हैं
न     ये   दुआ    करते   हैं
            ~*~
टी वी     के   चैनलों     पर
बस  हुआ   हुआ   करते  हैं
            ~*~
बंदी    हैं  कुंद  विचारों   के
दूसरों को  बंधुआ  कहते  हैं
           ~*~
बोलते   गुलामी  की  बोली
पिंजरे  का  सुआ  कहते   हैं
            ~*~
देश  को  मारते  निस  दिन
श्राद्ध  में   हलुआ   करते  हैं
            ~*~
बहस  को  जिंदा  रखना  है
ये   तो   बददुआ  करते   हैं
***
      

उनका पता


उनका पता
------------

ये रास्ता जाता है जहाँ
वो नहीं रहते वहां

वो रहतें हैं जहाँ
कोई रास्ता नहीं जाता वहां

तात्

तात्
ंंं
तात्
जाड़ा 
ठंडा गात 
*
तात्
कब
बनेगी बात
*
तात्
मत 
करो घात 
*
तात्
कब 
मिटी जात 
*
तात्
बीत 
गई रात 
*
तात्
फिर
हुई मात
*
तात्
हिल
गये पात

पूर्ण विराम

पूर्ण विराम
————-
उद्यान का प्रात:भ्रमण
होता है
बरास्ता मुक्तिधाम

सनद रहे
भटक न जांये रास्ता
अंतिम मजिंल
पूर्ण विराम
०००

सोना जागना

सोना जागना
-------------


वे जागे
अभिनय किया जागने का
सो गये
सोये ही हैं

वे सोये थे
चेतन्य हुए
जाग गये
जागे ही हैं

उम्र और सपने

 उम्र और सपने
---------------


यह उम्र
झुकने की नहीं
तनने की है
सांस छोड़ने की नहीं
नये सपने
बुनने की है
०००

क्रिकेट

क्रिकेट
-------

ज़माने में और भी ग़म हैं क्रिकेट के  सिवा
मेरे महबूब खो खो मैदान मिला करमुझसे 

क़ाफ़िया कोश

काफिया कोश
---------------


नहीं मिल रहा
सही शब्द
क़ाफ़िया

कैसा रहेगा
खनन
माफ़िया
 **

क्षमता

क्षमता
--------
वे भुना सकते हैं
हर चीज
चाहे रिश्ता हो
दोस्ती

फर्जी चैक
राजनीति
या
मोका

वाचाल सुख

वाचाल चुप
ंंंंंंं


चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे
चुप है धोनी चुप है सिद्धू
चुप हैं खिलाड़ी प्यारे
चुप हैं शिल्पा चुप हैं जिंटा
चुप हैं शाहरुख़ हमारे
चुप हैं कोच चुप हैं अम्पायर
चुप हैं मालिक सारे*

*मारल:एक चुप सौ सुख

क्रिकेट कलंक कथा

क्रिकेट कलंक कथा
---------------------


क्रिकेट को ओढे
क्रिकेट बिछाएं
क्रिकेट को अपने मन में बसाएँ
दायें बाएं जहाँ भी जाएँ
क्रिकेट ही पायें
क्रिकेट चबाएँ क्रिकेट ही खाएँ
     *
ये तेरा क्रिकेट ये मेरा क्रिकेट
तू बचा मेरा विकेट मैं बचाऊँ तेरा विकेट
कुछ प्लेयर तेरे चेहरे
कुछ बुकी मेरे मोहरे
तेरे चट्टे मेरे बट्टे
भारी फिक्सिंग भारी सट्टे
     *
चीअर गर्ल के छल्ले हैं

नेता अभिनेता गलबहियाँ डाल रहे
इनकी बल्ले बल्ले है 

आओ सबको मूर्ख  बनायें
क्रिकेट को ओढ़ें क्रिकेट बिछाएँ

मोनालीसा और धोनी

मोनालीसा और धोनी
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बीत गये पांच सौ साल
लियोनार्डो डी विंची की मोनालीसा
मंद मंद मुस्काई

पेरिस के 'लूव्र' मे
सम्मोहिनी मुस्कुरा रही आज भी
क्यों मुस्काई मोनालीसा
रहस्य है बरकरार
किस सदी में कब खुलेगा
कौन खोलेगा रहस्य
इस मुस्कान का
          *
धोनी भी मुस्कुराये मोनालीसा की तरह
मौन रहे
रहस्यमय  बने

अनुत्तरित ताकते रहे पत्रकारों को
पत्र वार्ता में
         *
कभी ना कभी उठेगा पर्दा
खुलेगा राज
मोनालीसा / धोनी
दोनो की मौन मुस्कान का

आपदा

आपदा
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सुन
गेहूँ के साथ
घुन
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Wednesday, February 19, 2014

संसद में पेपर स्प्रे

संसद में पेपर स्प्रे
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देश नें तरक़्क़ी की
हाई टेक हुए सांसद
वैज्ञानिक द्धृष्टिकोण अपनाया
पहले देते थे गालियाँ
फेंकते काग़ज़ के गोले कुर्सियाँ
अब माईक का चाक़ू बनाया
खुद गिनीपिग बन क़ुर्बानी दी
'पेपर स्प्रे' आँखों में अजमाया

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जाँच चल रही है

जाँच चल रही है
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साँच पर न आये आँच
संसद में माईक
कैसे उखड़ा हाथ से
अब होगी जाँच

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एक लोकतंत्र मरा सा एक संसद मैली सी

 एक लोकतंत्र मरा सा एक संसद मैली सी
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फिर शर्मसार हुआ लोकतंत्र
इसके पहले भी हुआ था
उसके पहले कितनी बार हुआ
अर्थ खो चुकी शर्म
संसद की आँखों में धूल नहीं मिर्चें झोंकी
क्या होता जो नर्व गैस छोड़ी जाती
'शोको अशारा' छ़ोड़ चुका है टोक्यो की ट्रेनों में

संसद का प्रसारण / लाॅबी / द्वार बंद
आहत विचार लोकतंत्र बंद

इसे कहा इतिहास का काला दिन
संसद के स्याह सफ़ेद का हिसाब करें
जो बचा क्या उसी के हक़दार हैं हम

लोकतंत्र की हत्या हुई ख़ून बहा
बार बार मरा लोकतंत्र
कह रहे यह धब्बा है
विधायिका की चादर के काले धब्बे गिनो
चादर नज़र नहीं आती
टूटे माईक रोती कुर्सियाँ
अब कौन कहे
'दास कबीर जतन से ओड़ी ज्यों की त्यों धर दिनीं चदरिया'

( जापान में 'शोको अशारा' नामक व्यक्ति ने 'ओम शनरिक्यो' नामक संप्रदाय का गठन किया जिसनें टोक्यो की ट्रेनों में नर्व गैस छोड़कर अनेक व्यक्तियों की जान ली )

Monday, February 10, 2014

इतिहास बोध

इतिहास बोध
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घूम रहे बावले सा
यहाँ वहाँ
सारा देश विदेश

भेजा घूम जाता
घूम घूम
असँगत बड़बड़ाते
इतिहास कभी जाना न था
सन्दर्भ भूल जाते

Thursday, February 6, 2014

अंत्योदय

अंत्योदय
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हम अंतिम साँस तक लड़ेंगे
अंतिम के लिये
हमारा लक्ष्य अंत्योदय
अंत वाले का उदय होगा
पहले वाले का हो जब
पहला मैं हूँ
उसके बाद भी मैं हूँ
फिर मैं ही हूँ
फिर कोई और
आखिर में अाखरी का भी होगा अंत्योदय
गिनती कभी अंत से शुरू नहीं होती 
मज़ार के पहले दिया घर में जलता है

व्यंग्य कविता : श्रमायुक्त

श्रमायुक्त
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अंग्रेज़ी में लेबर कमिश्नर
हिंदी में श्रमायुक्त
श्रम तो करता है
'शरम' कैसी
 श्रमिक भी श्रम से पैसा कमाता है

प्रधानमंत्री ने कभी कहा था
पैसे पेड़ पर नहीं लगते
ठीक कहा
पैसा गुप्त संधियों से आता है
अंदरखाते
गुपचुप जमावट
'श्रम' लगता है
जरा कमिश्न-'र' तोड़ो
बाकी कमीशन ही बचता है

( श्रमायुक्त के यहाँ लोकायुक्त का छापा )

Monday, February 3, 2014

शोर पर सवार धर्म

शोर पर सवार धर्म
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सतयुग त्रेता द्वापर अतीत हुए
कलयुग भी गया
अब 'धर्मयुग' आया
डेसीबल की हदों के पार शोर बना धर्म
आठों पहर कानों से अनचाहे टकराता धर्म
संचारी रोग बना
फहर रहीं धर्म पताकाएँ
अछूता नहीं कोई प्रकृति का कोना
वायु अग्नि जल सब धर्म के तले दबे
पर्यावरण पर सवार धर्म
क़ानून पर भारी आस्था
ठेले पर घर पहुँचे भगवान
सीढ़ियों के कोनें में पीक से रक्षा करता धर्म
उपग्रह प्रक्षेपण में धर्म
धर्मवाहक बने फ़ेसबुक सेलफ़ोन
मंत्र आयतें गुरबाणी बोलते स्मार्टफ़ोन
धर्म की 'मार्केटिंग' चली
धर्माचार्य ब्राँड एम्बेसेडर बने
जो दिख रहा वह बिक रहा
फिर भी ढीठ अधर्म बढ़ रहा











घड़ियाली आँसू

घड़ियाली आँसू
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'झूट टाईम्स'
विज्ञापन छपा
धाँसू

तुरंत चाहिये दल को
कुछ घड़ियाल
जो बहा सकें मोके बेमोके
आँसू



Tuesday, January 21, 2014

लघु कथा 4 : एक होने वाले रिश्ते का दुखांत

लघुकथा 4 : होने वाले रिश्ते का दुखांत
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उन्हें अपने सुशील लड़के के विवाह के लिये सुघड़ लड़की की तलाश थी.एक रिश्ता आया जो  उन्हें और सारे परिवार को पसंद आया.लड़की बेंगलोर में साफ्टवेयर ईंजिनियर थी.लड़का पुणे में जाॅब करता था.

दो सप्ताह बाद दोनों पक्षों ने मुंबई में मिलकर एक दूसरे की देखा-देखी करने का तय किया.

लड़का होशियार था.उसने "अ" नाम के प्रायवेट डिटेक्टिव की सेवाएँ ली.वह जानना चाहता था का लड़की ऐसी वैसी तो नहीं है."अ" जासूस को विशेष रूप से कहा कि वह पता करें कि लड़की का कोई ब्वाय फ़्रेंड तो नहीं.वह किसी नाइट क्लब की मेंबर तो नहीं है.बंगलोर की किसी रेव पार्टी में शामिल तो नहीं.ड्रिंक्स-ड्रग्स लेती है क्या.

एक सप्ताह में डिटेक्टिव "अ" की रिपोर्ट आ गई.रिपोर्ट सकारात्मक थी.लड़की में कोई अवगुण नहीं था बल्कि उसमें और भी कई कलात्मक रुचिया थी.

लड़का परिवार ख़ुश था.अगले सप्ताह मंुबई की तैयारी में जुट गया.होने वाली बहू के लिये ज़ेवर साड़ी भी ख़रीद ली.

मुंबई रवाना होनें के एक दिन पूर्व उन्हें"ब" डिटेक्टिव की एक भारी भरकम रिपोर्ट मिली ,जिसे लड़की ने लड़के की जानकारी जुटाने को कहा था.

रिपोर्ट में कई गर्ल फ़्रेंड के साथ लड़के के फ़ोटो,ड्रग्स और ड्रिंक्स लेते फ़ोटो और पुणे में पुलिस की रेव पार्टी की रेड के समाचार पत्र की कटिंग एवं फ़ोटो थी जिसमें लड़का भी गिरफ़्तार हुआ था.

ज़ाहिर है मुंबई जाना निरस्त हो गया और 'बहू'के लिये लाये ज़ेवर साड़ी मिठाइयों परफ़्यूम धरे के धरे रह गये.




लघु कथा 3 : सूखा चारा और श्वेत क्रांति

सूखा चारा और श्वेत क्रांति 
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बिहार का कैमूर सिटी ग्रीन सिटी बन गया.वहाँ भवनों को भी हरे रंग से पेंट किया गया ताकि हरियाली नज़र आये.पेड़ हों या न हों पर शहर सावन के अंधे को ही नहीं,सबको सदा हरा भरा नज़र आयेगा.

प्रांत के पशु पालन मंत्री के समझदार पुत्र को इससे एक मौलिक रचनात्मक ख़्याल आया.पिता से बोला-"अपने प्रांत की गाय भैंसे इन दिनों दूध कम दें रही हैं.कारण सूखा चारा.अगर घास हरी हो तो दूध का उत्पादन बढ़ जायेगा.दूध की ‘श्वेत क्रांति’ में  'हरित क्रांति’ हो सकती है".

"पर समस्या है कि इन दिनों हरी घास मिलना मुश्किल है.हम एक काम कर सकते हैं,हम गाय भैंसों की आँखों पर प्लास्टिक के हरे चश्मे चढ़ा देते हैं,उन्हें सूखी घास हरी नज़र आयेगी,वे हरी समझ कर खाएंगी,दूध ज़्यादा देंगी - देश में फिर से दूध की नदियाँ बहेंगी"

पिता ने अपने होनहार लाल की अद्भुत समझ पर हँसकर उसे माँ  यशोदा के समान गले से लगा लिया.सचिव से कहा कि गाय भैंसों के लिये चश्मों का टेंडर कॉल करें और शाम को प्रेस कान्फरेंस का आयोजन करें ताकि लोग इस महान खोज के बारे में जान सकें.

लघु कथा 2 : कंबल कथा

कंबल कथा
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रात का वक़्त था.बाहर बड़ी ठंड थी.पति पत्नि कार में जा रहे थे.सड़क किनारे पतली पुरानी चादर में लिपटे एक बूढ़े भिखारी को देख पत्नि का दिल द्रवित हो गया. पति से कहा कि वह बूढ़ा ठंड से काँप रहा है,कार रोको.पति ने कार रोक दी.पत्नि बोली कार में जो कंबल पड़ा है उसे दें देते हैं.पति बोला-"क्या कहती हो.इतना मंहगा कंबल,वह उसे बेच देगा.ये ऐसे ही होते हैं".पत्नि न मानी.अनमने पति नें कंबल उठाया और ले जाकर बूढ़े को ओढ़ा दिया-"ले बाबा ऐश कर"

अगले दिन दिन में भी ग़ज़ब की ठंड थी.पति पत्नि उसी रास्ते से निकले. सोचा देखें रात वाले बूढ़े का क्या हाल है. देखा तो बूढ़े भिखारी के पास वह कंबल नहीं था. वही पुरानी चादर ओढ़े भीख मांग रहा था.पति ने पत्नि से कहा -"मैंने कहा था कि उसे मत दो बेच दिया होगा". दोनों कार से उतर कर उसके पास गये.पति ने व्यंग्य से पूछा- "बाबा रात वाला कंबल कहाँ हैं बेच कर नशे का सामान ले आये क्या ?

बूढ़े ने हाथ से इशारा किया थोड़ी दूरी पर एक बूढ़ी औरत भीख मांग रही थी. कंबल उसने ओढ़ा हुआ था.बूढ़ा बोला-"वह औरत पैरों से विकलांग है, मेरे पास तो पुरानी चादर है,मैंने कंबल उसे दें दिया "

पति पत्नि हतप्रभ रह गये, फिर धीरे से पति नें पत्नि से कहा-"घर से एक कंबल लाकर बूढ़े को दें देते हैं"

Saturday, January 18, 2014

बेटी बेटे

बेटी बेटे
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उन्होंने बेटियों को
बेटों  समान पाला
           *
किसी बेटे को नहीं
बेटी  समान  पाला

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स्टार शेफ़

स्टार शेफ़
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फ़ाईव स्टार शेफ़
पत्नि के खाने में
सदा मीन मेख
          *
झल्लाई पत्नि
बना लो आप
वे चीखे शेफ़ हूँ
पैसे देगा बाप

Friday, January 17, 2014

समुद्र मंथन तब

समुद्र मंथन तब
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अंततःअसुरों की हार हुई जो तय थी
अमरत्व के झाँसे छले गये 
रणनीतिक साझेदार विष्णु कच्छप बने 
वासुकि नाग रस्सी बना
मन्दराचल पर्वत मथानी बना 
घोर गर्जन में चौदह रत्न निकलना तय था
कामधेनु को ऋषि 
रावत को इन्द्र ले गये 
विष्णु को वरा लक्ष्मी ने
रंभा अप्सरा देवताओं को रिझाने गई इन्दर सभा 
बाक़ी रत्नों का भी ‘देव न्याय’ हुआ
अमृतघट ताकत से असुरों के हाथ लगा 
देवता बेचारे हताश हुए
भगवान मोहनी बन सामने आये
असुरों को फुसलाया नैन बाण चलाये 
छल से सोमरस पिला मदहोश किया
चालाक राहू अमृत पाँत में बैठा 
कंठ से अमृत न उतार पाया
भगवान का 'सुदर्शनचक्र' चला
धड़ से सिर कटवा बैठा
अब राहू केतु बन आकाश के किसी कोने में पड़ा है

प्रभु तेरी लीला अपंरम्पार
तेरी माया तू ही जानें 
हम मूरख क्या जानें

🦉 जसबीर चावला 

Monday, January 13, 2014

मंत्री बोला महलों में भी मौत आती है

मंत्री बोला महलों में भी लोग मरते हैं
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मंत्री के बोलने से सत्य उजागर हुआ
लोग मरते है कैंप में ही नहीं महलों में भी 
दिव्य ज्ञान मिला

पच्चिस सौ साल पहले
तथागत ने बच्चों को जवान होते देखा
बूढ़ा होकर मरते देखा
राजपाट त्यागा
सोई यशोधरा को महलों में छोड़ा
चल पड़े सत्य की तलाश में
'बुद्ध' कहलाए
हर कहीं आनी है मौत
मंत्रीजी कुछ दिन कैंप में रहो
अपने राजवंश के साथ रहो
खुले आसमान के नीचे
पहनों ख़ैरात के कपड़े 
जियो इमदाद के साथ
टपकते पानी ठँड में रहो
सबके सामने रोओ गिड़गिड़ाओ 
रहम की भीख माँगो
बे पर्दा होने दो अपनी ज़ीनत को
बिना इलाज दवाई के मर जाओ एक दिन 
मरना तो अटल सत्य है
'मौत तो हर जगह आती है'
महलों में भी कैंप में भी

* मुज्जफरनगर दंगो में राहत केम्पस् में अपर्याप्त सुविधाओं के कारण लोगों की हो रही मौतों पर मंत्री ने बयान दिया कि लोग महलों में भी मरते हैं.