Tuesday, December 31, 2013

चूहे बस चूहे

चूहे बस चूहे
---------

आज़ादी के बाद
आज़ादी से 'चूहे' बढ़ते जा रहे चूहे
चूहों की तरह
सरकारी दफ़्तरों की फ़ाईलों में
रक्षा / वित्त / शिक्षा / की मुँडेर पर
न्याय के चोग़े में चूहे
प्रदेश / देश के हर विभाग में चूहे
निर्णयों की भूलभुलैया में
हस्ताक्षर के घुमाव पर बैठे
यत्र तत्र सर्वत्र चूहे ही चूहे
हर रंग जाति के चूहे

बिलों में खींचते / टेंडर/ खदानें / ठेके
तेल / गैस / हवा/ पानी / जंगल / ज़मीन
क्या नहीं कुतरते चूहे
ईमान / धर्म / ज़मीर
कार्यपालिका में भी मुस्तेद चूहे 
अदालतों में बरसों चलते मुकदमे 
चूहे गवाह चूहे जाँच अधिकारी
'चूहा न्याय' में बाइज़्ज़त छूटते चूहे
मेरा देश 'करणी माता का मंदिर' हुआ
जहाँ बस चूहे चूहे ही चूहे




Monday, December 30, 2013

क्या खोया क्या पाया

क्या खोया क्या पाया
-------------------

दंगों में बचपन ही नहीं गुमा
खिलोनें भी खो गये
दूधमुँही तुतलाहट गई
गिल्ली डंडा कोड़ा जमालशाही
बरसों का याराना गया
शर्म हया उड़ी आँख का पानी मरा
रिश्ते तिड़के स्वाभिमान टूटा
बहू बेटी ने अस्मत खोई
रोटी गई रोज़गार गया
लुटे खेत खलिहान
आग बरसी जले मकान
इंसान मरा

पाया क्या
उग्र साम्प्रदायिकता आतंक
डरावने सपने दुश्मनी सतत नफरत
बच्चों में भय बेचेनी
जीवन भर की उदासी
कुंठा कुटिल राजनीति
धर्म के नाम पर अधर्म
थोड़े से वोट
***

Sunday, December 29, 2013

ठंड से मरता है कौन

मंत्री ने कहा ठंड से कोई नहीं मरता
----------------------------------

जनाबे आली ठीक है आपका सामान्य ज्ञान
दुरूस्त फ़रमाया आपने
ठंड से मौत कहाँ होती है
कौन ज़िंदा रहता साइबेरिया में
दंगा पीड़ितों यहाँ 'ईगलू' बनाओ
ठंड से बचने के लिये साइबेरिया जाओ
ठंड से कोई नहीं मरता
मरता है निमोनिया हायपोथर्मिया से
देश में कब कौन भूख से मरा है
पोषक तत्वों की कमी से सदा मरा है
फ्रांस में रानी ने सही कहा था
रोटी नहीं तो भूखे केक क्यों नहीं खाते
'लू' नहीं डीहाइड्रेशन मारता है 
'केदारनाथ' त्रासदी प्रकृति जन्य आपदाएँ हैं
भारतीय दर्शन कहता सब कर्म गति है बाबा
जैसा बोए वैसा पाए
शरीर नश्वर है आत्मा अजर अमर
कबीर से क्षमा
अफसर खड़ा केंप में लिये हंटर हाथ
झुग्गी फूंको अपनी चलो हमारे साथ

*कैंप में रह रहे दंगा पीड़ितों की ठंड से हुई मौतों पर मंत्री का बयान कि ठंड से कोई नहीं मरता.

Thursday, December 26, 2013

पचमड़ी में सूर्यास्त और पकोड़े

पचमड़ी में सूर्यास्त और पकोड़े
---------------------------
सन् सेट पाइंट पर
गर्म पकोड़े बनाने वाले से पूछा
बहुत लकी हो
रोज़ देखते हो सन् सेट
अच्छा लगता होगा
आसमान पर बिखरता सोना
सूरज को डूबते देखना

आसमान ताक बोला
देख रहे हो
बादल छाये हैं आज
मौसम गीला है
डूबेगा नहीं सूरज
आँखो ओझल है
लोग कम आयेंगे
कम बिकेंगे पकोड़े
मौसम साफ़ हो
सन् सेट तभी अच्छा है
पकोड़े बनें
पेट भरे


Tuesday, December 24, 2013

टी वी पर शिकार



टी वी पर शिकार
————••—

टीवी के मुँह ख़ून लगा है
खबर नहीं शिकार करते हैं
हिंस्र द्दृष्टि से चिँघाड़ते 
टूट पड़ते हैं वक्ता पर
तर्क कुतर्क से धुर्रे उड़ा देते
उस की मौत चाहते
रोज स्टूडियो में मजमा सजाकर
कभी महीनों तक तड़फा तड़फा कर
किश्तों में चेनल करते एक का शिकार
अल्पसँख्यक,दलित आसान शिकार
शिकार की हर दलील ख़ारिज
दीवार पर पहले ही लिखा है नाम

हाँका डालते उघेड़ते निर्वस्त्र करते
रात दिन ढूँढते दूसरा शिकार


☘ ज स बी र  चा व ला

Sunday, December 22, 2013

लघु कथा १

लघु कथा:मैं मर कर गधा बनना चाहता हूँ १
——————————————

चार दोस्त गपिया रहे थे. प्रश्न उठा अगले जन्म में कौन कहाँ पैदा होना चाहेगा और क्यों.

एक बोला मैं मरने के बाद अगले जन्म में अमेरिका में पैदा होना चाहूँगा.मौज ही मौज.मेरा तो इस जन्म में यही सपना है.

दूसरे का सपना अगले जन्म में कहीं का भी प्रधानमंत्री या राजा बनने का था.फिजूल की भागादौड़ी.कोई काम न करना पड़े.निरंकुश सत्ता का उपभोग.

तीसरा तेल से भरपूर अरब देश में किसी शेख़ के घर पैदा होने की इच्छा रखता था.खाओ पियो ऐश करो
आराम ही आराम.

चौथे से पूछा गया वह अगले जन्म में कहाँ पैदा होना चाहता है और क्या बनना चाहता है.

उसका उत्तर सुनकर सब चौंक गये. उसने कहा कि वह प्रायश्चित करना चाहता है,भारत में ही पैदा होना चाहता है और मर कर गधा बनना चाहता है.

तीनों मित्र व्यंग्य से हंस पड़े-'गधा'- भला गधा क्यों ?

'क्योंकि गधा प्रतीक है मेहनत का,ईमानदारी से काम का'.'इस देश में लोग काम नहीं करते. दफ़्तरों में मक्कारी करते हैं' -'श्रम से जी चुराते हैं'-अगर कोई साथी मेहनत से काम करें तो कहतें हैं कि -'क्या गधे के समान काम कर रहा है'-'उसका मज़ाक़ उड़ाया जाता है-उसे गधा कहा जाता है'

तीनों मित्र आवाक रह गये

व्यंग्य/३/जनरल मुर्ग़ा और वर्दी

                                           जनरल मुर्ग़ा और वर्दी
                                            ------------------

यह सच्ची कहानी है एक ऐसे मुल्क के 'चीफ आफ आर्मी स्टाफ़' जनरल की जिसनें उठापटक कर अपने को मुल्क के आईन (संविधान) और नेशनल असेंबली से प्रेसीडेंट भी बनवा लिया.वह दोनों पदों पर क़ाबिज़ हो गया.इस क़िस्से का हिंदुस्तान नाम के मुल्क के नज़दीक़ी मुल्क पाकिस्तान या जनरल परवेज़ मुशरफ से कोई ताल्लुक़ नहीं है सो ताकीद हो.

जनरल साहब को अपनी फ़ौजी वर्दी से बेपनाह मुहब्बत थी.वे कहा करते की वर्दी मेरा ईमान है,वर्दी ही मेरी जान है. वर्दी उनकी चमड़ी है. भला जिस्म से चमड़ी को क्या अलग किया जा सकता है ? वे उसे कभी नहीं उतारेंगे,चाहे जान चली जाये.अक्सर तो वे उसे पहन कर ही सो जाते,पता नहीं कब मुल्क में बग़ावत हो जाये.

वहाँ की अवाम दिलोंजान से चाहती थी कि मुल्क में जम्हुरियत (प्रजातंत्र) क़ायम हो जाये पर जनरल साहब वर्दी उतारनें को तैयार ही नहीं थे.बस शीशे में अपना अक्स देखा करते और मुस्कुराते रहते.

उन प्रेसीडेंट - जनरल जिन्हें उनकी बीबी मज़ाक़ में 'टू इन वन' कहा करती थी-के पास एक क़द्दावर मुर्ग़ा था.बेहद ख़ूबसूरत ऊंची कलगी,बुलंद आवाज़. जनरल साहब को भी उससे भी बेपनाह मुहब्बत थी.जनरल साहब ने उसका नाम अपने नाम की तर्ज़ पर जरनैल रख दिया था.जरनैल जब सीना फुलाकर कुकड़ू कूं की ज़ोरदार बांग देता तो जनरल साहब का सीना भी फूल जाता.उस वक़्त घर पर भले ही वे 'ग्रुप आफ मिनिस्टर' से ज़रूरी गुफ़्तगू कर रहे होते,ख़ुश होकर कहते देखो जरनैल की बांग में नियाग्रा प्रपात की आवाज़ सुनाई देती है.

मुर्ग़ा जरनैल भी कम न था.पक्का आतंकवादी.वी आई पी एरिया में दनदनाता फिरता.दूर दूर के पड़ोसियों के बगीचों में घुस जाता.बगीचा ख़राब कर देता.रोके कौन जनरल साहेब का चहेता मुर्ग़ा जो ठहरा.मुर्गियों पर रौब झाड़ता.दूसरे मुर्ग़ों को दूर तक खदेड़ देता.उसकी ख़ास अदावत थी सड़क पार की एक और नामचीन हस्ती चौधरी शहरयार के मुर्ग़े से जिसे वह गाहे बगाहे चोंच मारकर ज़ख़्मी कर देता.मजाल है जरनैल उसके पास किसी मुर्ग़ी को कभी फटकने देता या दाना दुनका चुगने देता.

उधर चौधरी शहरयार भी जनरल-प्रेसीडेंट से नफरत करते थे.वे भी आवाम की तरह चाहते थे कि मुल्क में जम्हुरियत हो.इसको लेकर उनकी जनरल साहब से अक्सर तकरार हो जाती.वे चाहते थे कि जनरल साहब अपनी फ़ौजी वर्दी उतारें,लेकिन जनरल साहब नें भी अवाम के ग़ुस्से और मुजाहारात के बावजूद वर्दी न छोड़ने की क़सम खाई थी.

तो जनाब क़िस्सा यह है कि एक दिन जनरल साहब का मुर्ग़ा जरनैल घर से बाहर तफ़रीह करने निकला दरवाजे पर गार्ड ने उसे सलामी दी.जरनैल ने पहले तो पड़ोसियों की मुर्ग़ियों के साथ मटरगश्ती की.चोंचे लड़ाई,फ़िर दनदनाता चौधरी शहरयार के मुर्ग़े को ललकारनें सड़क पार कर गया.

इसके बाद उस क़द्दावर मुर्ग़े जरनैल को किसी ने नहीं देखा.

शाम हो गई थी,जरनैल घर नहीं लौटा.उसकी खोज घर में,गेराज,बग़ीचे सब जगह हुई पर उसे नहीं मिलना था-वह नहीं मिला.

जनरल-प्रेसीडेंट बेचेन हो उठे.घर में मिलेट्री के आला आफिसरान की ज़रूरी मिटींग हो रही थी पर जनरल साहब का दिल नहीं लग रहा था.उन्होंने अपनें मुंहलगे नौकर रुल्दू को आवाज़ दी और कहा कि जरनैल को कहीं से भी ढूँढ कर लाओ चाहे सारी फ़ौज भी भेजना पड़े.सिक्योरिटी गार्ड चारों तरफ़ दौड़ गये.

नौकर रुल्दू सीधा चौधरी शहरयार के मुर्ग़ मुसल्लम स्पेश्लिस्ट ख़ानसामा अच्छन मियाँ के पास पहुँचा और पूछा की क्या उसने जरनैल को देखा है ? अच्छन मियाँ एक आँख को थोड़ा दबाते हुए बोले-"नहीं लेकिन जरनैल की वर्दी-पंखों भरी खाल और कलगी-कंपाउड वाल के बाहर कूड़ेदान में पड़ी है"

रुल्दू ने वह वर्दी कूड़ेदान से उठाई और सीधा दौड़ कर जनरल-प्रेसीडेंट की मिटींग में पहुँच गया ओर रोते हुए कहा कि जरनैल तो नहीं मिला उसकी वर्दी मिली है.सभी फ़ौजी आफिसरान हक्के बक्के रह गये.सबके हाथ फ़ातिहा के लिये उठ गये.

उस रात प्रेसीडेंट - जनरल सो न सके.बेचेन करवटें बदलते रहे.सबेरे चाय के वक़्त उनकी ख़ूबसूरत चहेती बीबी ने रुल्दू को आवाज़ दी की वह जनरल साहब का वर्दी ले आये.जनरल साहब जो अब तक वर्दी को बीबी से भी ज़्यादा मुहब्बत करते थे-बेगम से बोले कि वह उसे अब जनरल कहकर न बुलाए.बोले-"अब सोचता हूँ की वर्दी उतार ही दूँ"

(नई दुनिया में सन २००८ में प्रकाशित)

Thursday, December 19, 2013

जिया बेक़रार है

जिया बेक़रार है
---------------
सूरदास उवाच
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे
अमीर खान ने कहा
दिल है कि मानता नहीं
मेरा मनपंछी भी नहीं मानता
एक बार तो सोते जागते
उड़ जाता है डौंडियाखेड़ा के खंडहरों में
शोभन सरकार ने बताया
दबा है वहाँ सोना हज़ार टन
कर रहा इंतज़ार
कोई आये खोद ले जाये

दूर कहीं बज रहा गाना
जिया बेक़रार है
आजा मोरे बालमा तेरा इंतज़ार है
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे





Friday, December 13, 2013

क्योंकि तुम 'तुम' हो

क्योंकि तुम 'तुम' हो
--------------------
तुम 'तुम' हो
नाम तो तुम्हारा ही लिया जायेगा

तुम बोलो तो चर्चा तुम्हारा होगा
ना बोलो तो भी
क्योंकि 'तुम' हो
चुनाव प्रदेश में हों या देश में
राजनीति की बिसात पर मोहरे तुम ही होंगे
तुम्हारी हैसियत होगी मात्र बिंदू
पर तुम होंगे केन्द्र बिंदू

तुम्हारे में विवेक है नहीं मानते
तुम तो भीड़ हो / भेड़ चाल हो
वोट बैंक हो
तुम्हारे हित का हर काम तुष्टिकरण

होंगी जात पाँत तुममे भी अनेक
अलग फिरके / अलग जमातें
अलग सियासी रुझान
अकीदा तो एक है
इतना ही काफ़ी है तुम्हारे ख़िलाफ़ भड़कनें के लिये
क्योंकि तुम 'तुम' हो



Tuesday, December 10, 2013

काग भगोड़ा : सच्चे भगोडा

काग भगोड़ा नहीं सच्चे भगोडा
-----------------------------

निशस्त्रिकरण का मुद्दा हो या आणविक शक्ति का
धुँआधार चर्चा
बहस पर बहस
महिला मुक्ति / कन्या भ्रूण
दलित / जाति / गहन चिंतन
समाजिक मुद्दों पर भाषण
माओ मार्क्स मंडेला की तस्बीह फेरते
मंच / महफ़िल में तान मुट्ठियाँ
परास्त करते चिंतक
समाज सेवी / बुद्धिजीवी
छुपा है उनके अंदर
सजग शातिर काग
तुरंत भाँप लेता सीमा
कब पलायन / उड़ान
तन का मन से विद्रोह
भाग लेते
बांस कपड़े का बेजान बिजूका भर नहीं वे
सच्चे काग हैं
सच्चे भगोड़ा हैं 

Saturday, December 7, 2013

व्यंग्य/२/गांधी के तीन बंदर और गठबंधन की सरकार

                          गांधी के बंदर और गठबंधन की सरकार
                           ...................................................

"उस राज्य"में चुनाव बाद विषम स्थिति हो गई थी.किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था.बेमेल दल,पचमेल दल और घालमेल दल तीनों में से कोई दो दल मिल कर ही सरकार बना सकते थे. पर सभी दल शंकित थे,डरे हुए थे. अगर कुछ समय सत्ता में रहकर दूसर दल ने तय समय के बाद सरकार की लगाम उसे न सोंपी तो ?

अतीत में ऐसा देश में कई बार हो चुका था.मायावती- मुलायम ने सरकार बनाई. मायावती ने बाद में मुलायम सिंह को जो अगूठा दिखाया वह स्थाई रूप से ठोस पत्थर का हो गया है.दोनों दल अब कट्टर दुश्मन हैं,फूटी आँखों एक दूसरे को नहीं सुहाते.भाजपा- मायावती का जोड़ भी कमज़ोर निकला,आइने के मानिंद टूटा.दोनों में अब चोबीसों घंटे तलवारें खिंची रहती हैं.

हरियाणा ने देश की राजनीति को नई दिशा,मुहावरे दिये -आयाराम-गयाराम.भजनलाल की जनता पार्टी का रातों रात कायाकल्प हो गया.पूरी पार्टी कांग्रेस में शामिल हो गई.बिहार,गोआ,झारखंड में अतीत मे न जाने कितनी सरकारें कब कब किस के साथ बनी.जोड़-तोड़ से मुड़ी-तुड़ी सरकारें बनीं- गिरी,उठी- लँगड़ाई और अंततःराष्ट्रपति शासन की सदग्ति को प्राप्त हो इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों (?) से अंकित हो गईं.

कर्नाटक में देवेगोड़ा कुमारस्वामी सरकार का क़िस्सा और भी मज़ेदार था.देवेगोड़ा ने अपने हिस्से की सत्ता भोग ली.भाजपा की बारी आई तो ठेंगा दिखला दिया.कहा कि उनके परिवार पर भाजपा के एक विधायक ने अदालत में
भ्रष्टाचार का मुक़दमा क्यों किया,नहीं सौंपते तुम्हें कुर्सी.उन्होंने तर्क दिया कि उन दो दलों के मध्य सत्ता का बँटवारा "आपसी एडजेस्टमेंट" था,न कि"आपसी समझौता".अंततःसरकार इच्छा मृत्यु को प्राप्त हुई.

ऐसे विकट हालात में "उस राज्य"के बेमेल ओर घालमेल दल नें तय किया कि वे दोनों दल मिलकर जनता की गाँठ में सेंध लगाने के लिये फेविकाल के पक्के जोड़ वाली मज़बूत गठबंधन की सरकार बनायेंगे.अतीत से सबक़ लेते हुए एक ऐसा"समझौता"हो कि सरकार स्थाई रूप से चलती नज़र आये.एक के लिये सब- सब के लिये एक.

तय हुआ की एक सलाहकार परिषद् का गठन हो -जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलाल, प्रापर्टी डीलर, बिल्डर,शेयर बाज़ार के खिलाड़ी,उद्योगपति,अखबारपति,टीवीपति,फ़िल्मी बंदे,क़ानूनी जोड़ तोड़
विशेषज्ञ हों. (ताकि वक़्त ज़रूरत पर काम आ सकें) यह परिषद् एक "समझौता-पत्र" का प्रारूप बना कर दे ताकि स्थाई सरकार बन सके.

परिषद् ने"सबके हितों" का ध्यान रख कर जो समझौता पत्र बनाया उसकी एक प्रति लेखक के हाथ लगी,
जिसका मोटा मोटा सार पाठकों के लिये परोसा जा रहा है.

बेमेल-घालमेल गठबंधन की सरकार ने राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह शेर की तर्ज़ पर गांधीजी के तीन बंदरों के खिलोनें को कुछ फेर फार के बाद अपना राज्य प्रतीक चुना.उनके प्रतीक में तीनों बंदर न तो हाथों से आँखें ढकते हैं,न कान न मुंह ढकते हैं.अब वे गांधी के बंदरों के विपरीत बुरा देखेंगे,बुरा सुनेंगे ओर बुरा बोलेंगे.हाथ मुक्त होने से मुंह से काट सकेंगे.हाथों से लूट सकेंगे ओर कान मुक्त होने से एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल सकेंगे.

दूसरा प्रतीक तय हुआ"गिरगिट".किस विधायक की अंतरात्मा कब गिरगिट सा रंग बदल कर दूसरे दल के परमात्मा में विलीन होने को मचल जाये,कब उसे अन्य दल से सकारात्मक सिगनल प्राप्त होने लगें,कौन जानता है.इसके लिये गौरवशाली प्रतीक "शुभंकर गिरगिट"तय किया गया.

परिषद् ने अपने प्रारूप में आगे लिखा कि राज्य की जनता के हित में हम दो पक्ष-अधिक विधायक वाले सत्ताकामी प्रथम पक्ष ओर कम विधायक वाले सत्ताकामी द्वितीय पक्ष (जिन्हें लोग अपनी अपनी अकल से राजनैतिक दल कह देते हैं) आपस में यह अनुबंध करते हैं कि प्रथम पक्ष -बेमेल दल कुल ५ वर्षों में ३ वर्ष और द्वितीय पक्ष- घालमेल दल २ वर्षों तक सत्ता का सुख भोगेगा.

प्रथम पक्ष चार बार अाठ-आठ माह की अवधि में शासन करेगा. द्वितीय पक्ष चार बार छे-छे माह की अवधि में बारी बारी से शासन करेंगे.एक बार यह एक बार वह,ताकि दोनों को समान मोका मिले. बाकी चार माह की अवधि में दोनों दल बारी बारी से दो-दो माह सत्ता संभालेंगे ताकि कोई भी दल दूसरे को "कर्नाटक शैली" में अँगूठा न दिखा सके ओर सत्ता का ईमानदारी से बँटवारा हो सके.

यह भी समझौते में लिखा गया कि दोनों पक्ष आठ-आठ,छे-छे और दो-दो माह के लिये अलग अलग मुख्यमंत्रियों का चुनाव करेंगे.इसके कई फ़ायदे होंगे.कुल जमा १० मुख्यमंत्री ५ वर्षों में राज (?) करेंगे.(गोआ-झारखंड में भी उल्टा पुल्टा होकर ५ सालों में कितने मुख्यमंत्री राज करते रहें हैं- याद है) इससे दलों में आंतरिक संतोष ही संतोष होगा.

दूसरा फ़ायदा होगा कि ५ वर्ष बाद १० भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला,आजीवन पेंशन,वीआईपी दर्जा और अभूतपूर्व होनें के अन्य अनेकों लाभ मिलेंगे. छटे या आठवें माह शपथ के वक़्त सारा मंत्रिमंडल बदला जायेगा.हर विधायक को मंत्री पद बारी बारी से मिलेगा.सभी संतुष्ट - सभी के पेट भरे हुए-अघाये हुए.फिर भी अगर कुछ विधायक मंत्री पद से वंचित रह जायें उन्हें कैबिनेट मंत्री की सुविधा देकर निगमों-उपक्रमों में खपाया जाये.गोदाम में कभी भी लालबत्ती और कारों का टोटा न पड़े एवं पर्याप्त बंगलें हों इसका ध्यान रखने की समझौता पत्र में ख़ास ताकीद की गई.लालबत्ती,कार निर्माता कंपनियों और पीडब्ल्ूडी को भी इसकी सूचना दी गई.

सत्ता के बँटवारे के प्रारूप से पता चला की मलाईदार विभाग जैसे जनकार्य,वन,वित्त,गृह,उद्योग,आई.टी.
सहकारिता,परिवहन में किस किस पक्ष को कौन सा विभाग मिलेगा और मलाई किस अनुपात से बँटेंगीं सबका उल्लेख किया गया ताकि बिना वजह की छीना झपटी और बंदरबाँट का आरोप न लगे. सब साफ़ सुथरा हो ताकि छवि उज्जवल रहे.

ट्रांस्फर,थानों की नीलामी,शराब की दुकानों,खदानों,-सबके विस्तृत नियमों का अनुबंध पत्र में उल्लेख था ताकि समाजवादी छवि बने और मिल बाँटकर सब खाएँ .तय यह भी हुआ कि पहले दोनों पक्षों द्वारा किसानों से ज़मीनें ख़रीद ली जायें फिर मास्टर प्लान बनाएँ ताकि सबके परिवार भी सुखी हों.

अनेकों उपबंधों के इस अनुबंध पत्र में एक शपथ पत्र का नमूना भी मिला.इसके पूर्व लिखा गया था कि केंद्र में यूपीए की सरकार में अमेरिका के साथ आणविक समझौते को लेकर लेफ़्ट फ़्रंट रोज टाँग खींचता था.हमें शपथ लेकर इससे बचना होगा.अंदर सदन में भले ही कभी कभी नूराकुश्ती कर लें,बाहर तो दोनों हाथों को हाथों में लेकर कंधे से उपर उठा हँसते हुए टीवी-अख़बारों के लिये पोज़ और बाइट देना है.

सुनता हूँ कई और राजनैतिक दल इस अनुबंध में अपनी अपनी संभावनाओं को तलाश रहे हैं.








Sent from my iPad

व्यंग्य/१/चेनल चूँ चूँ का मुरब्बा धोनी और भैंस

                          चेनल चूँ चूँ का मुरब्बा धोनी और भैंस
                          ...............................................

बेहद परेशान थे टीवी चेनल सीसीकेएम(पूरा मतलब चूँ चूँ का मुरब्बा) के सीईओ इन दिनों.परेशानी का सबब था उनके चेनल की कमाई का गिरता ग्राफ़. दूसरे चेनल खूब चाँदी काट रहे थे, उनकी टीआरपी भारत सरकार की साख की तरह घट रही थी.

उन्होंने आनन-फ़ानन में अपने अपने सारे एंकर से लेकर फ़ील्ड संवाददाता,प्रोड्यूसर,केमरामैन सबकी आपात् बैठक बुलाई.सबको देशमें - तेज़ी से लेकर सुस्त चलने वाले,१० मिनट में २०० ख़बरें परोसने वाले,चैन की नींद सोने के बहाने जगाने वाले कई चेनलों के कामयाब नुस्खे वाले कार्यक्रम दिखाये,विशेषज्ञों के भाषण करवाये.

उन्होंने कुछ  टीवी क्लिपिंग दिखलाई,जिनसे उन चेनलों के दिन फिर गये थे.उनमें कुछ के नमूने ये थे."मिल गया,मिल गया,रावण का महल मिल गया. वह एअरपोर्ट भी मिल गया जहाँ उसका विमान लेडिंग करता था"- पार्श्व में रामायण सीरियल की धुन बजने लगी."आज रात बाज बकरी को आठ बजे उठा ले जायेगा,देखना न भूलें,आपके अपने टीवी ‘इंडिया भार' पर अगला चेनल-"अंतरिक्ष से उड़न तश्तरियाँ आ कर गायों को ले जा रही हैं,हमारे जाँबाज पायलटों ने हेलिकॉप्टर से पीछा किया पर वे चकमा देकर भाग गईं"-अगला समाचार "आकाश से एलियन आ चुके हैं,कहीं आपकी खिड़की से झाँक तो नहीं रहे उठ कर देख लीजिए"-पार्श्व में खोफनाक संगीत बजता है.

अगले चेनल पर-"मिल गया भगवान श्रीकृष्ण का शंख"-नेपथ्य में शंख ध्वनि."मिल गई सीता की रसोई जहाँ वे भोजन बनाती थी."पार्श्व में रामायण की चोपाईयां.तरह तरह के हिट कार्यक्रम.

ख़बरें और भी थी-बनारस मे बरगद का पेड़ जिसमें तीन पत्ते लगते हैं-ब्रम्हा विष्णु महेश.जनता पूजा कर रही है.अगला समाचार में -"दार्जीलिंग के कुर्सीयांग में एक उड़न तश्तरी जमीन पर गिरी".जमीन पर एक २ फ़ुट लोहे की डिस्क जो किसी मशीन का पुर्ज़ा था -पड़ी थी.वाचक संवाददाता उसे ही उड़न तश्तरी मान कर चर्चा करने लगे-"लोग डरे तो नहीं,पूजा शुरू हुई की नहीं"-वाचक चाहता था कि लोग पूजा शुरूं करें तो कहानी लंबी खिंचे.

"सांई बोलने लगे-आँखें झपकने लगी".दो चेनलों नें इस एनिमेशन फ़िल्म ओर उसके परम रहस्य को कई दिनों तक दर्शंको को समझाया."बंदर जो केवल गोरी लड़कियों का दीवाना है"."आज सिर्फ़ देखिये हमारे चेनल पर.बाबा सूर्यदेव की घोषणा-२०१४ में धरति पर प्रलय"- नेपथ्य में भुकंप की गढ़गढ़ाती आवाज़ें,हाहाकार,
समुद्र का गर्जन,भक्त जनों का कीर्तन.

चेनल सीसीकेएम उर्फ़ चूँ चूँ का मुरब्बा के सीईओ ने उन्हें बाबा घासाराम,चरायणसांई,भूतप्रेत,सेक्स,अपराध,
अघोरी,तंत्र-मंत्र,धर्म-अध्यात्म के फ़िल्मी काकटेल,आश्रमों हो रही रास लीलाएँ ,अंधिवश्वास के खेल तमाशे
कच्चे अधपके चुनावी स्टिंग आप्रेशन और इनसे चेनलों को बढ़ती टीआरपी ओर कमाई,सब की आडियो विडियो दिखलाई.

ख़बरें कैसे बनाई जाती है,यह भी उदाहरणों के साथ समझाया.एक खबर की क्लिप में श्रीगर के लालचौक में अलगाववादी तिरंगा खरीदते ओर जला देते.अब उनसे कौन पूछे की भइयै,वहाँ कोई झंडे की दुकान भी है क्या ? यह सब अंग्रेज़ी के एक अख़बार की नक़ली प्रायोजित फ़ोटो थी."आँखो-देखी" की बिहार में नक़ाबपोश हथियारबंद दादाओं द्वारा बूथ केपचरिंग की स्टोरी गढ़ी हुई थी.बनारस में २ वर्ष पूर्व १५ विकलागों की गुमटियां सड़क अतिक्रमण में हटना थी.उन्हें चेनलों ने उकसाया की वे ज़हर खा लें हम कैमरे से शूट करेंगे,और तुम्हें बचा लेंगे.सबने टीवी पर इसे देखा.उन्होंने सचमुच ज़हर खा लिया.५ की जान चली गई पर चेनलों की टीआरपी आसमान छूने लगी.

सीईओ ने चेलेंज किया जो कोई धाँसू स्टोरी - चाहे गढ़कर लाये चाहे स्टिंग कर के,उसे १० लाख रुपये नक़द और थाईलैंड की सैर पर भेजा जायेगा.सारे रिपोर्टर दौड़ पड़े -'इस्टोरी'की तलाश में.जिस झारखंडी रिपोर्टर की स्टोरी चुनकर टेलिकास्ट हुई वह कुछ ऐसी थी.

"मिल गया,धोनी के चौकों छक्कों का राज.आज रात प्राइम टाईम में ८ बजे चेनल सीसीकेएम पर.कौन है जो उसे ऊर्जा से भर देती है,कौन है वह सलोनीश्यामा.जिसका राज धोनी भी नहीं जानता,हम उठायेंगे पर्दा इस रहस्य से जिसे हमारे संवाददाता कूड़ाप्रसाद नें जान पर खेल कर उठाया है".

क्रिकेट इस देश का सन्निपात बुखार है और कभी उतरता ही नहीं. सारा देश सदा तपता रहता है.प्रलाप करता रहता है.देश में इस खबर से हलचल मच गई.देश थम गया,चर्चाओं का बाज़ार गर्म हो उठा,कौन है वह सुंदरी..परम जिज्ञासा से सब 'चू चूँ का मुरब्बा देख रहे थे.

"जी हाँ धोनी के चौके छक्के के पीछे जिस व्यक्ति का हाथ है वह हैं मुक्तिकुमार ,जिनकी भैंसों का दूध धोनी पीते हैं"- कैमरा मुक्तिकुमार पर फ़ोकस होता है."ये भैंसें पालते हैं,दूध निकालते हैं,- दूध जो अमृत होता है जिसकी देश में नदियाँ बहती थी"-मुक्तिकुमार जी गदगद् हैं.पीछे उनकी घरवाली लजाती सकुचाती नज़र आती है जिस पर केमरा अब फ़ोकस है,जो भैंस का दूध  निकाल रही है.कैमरा कभी मैदान में चरती भैंसों पर जाता है कभी मैदान में क्रिकेट खेलते चौके छक्के लगाते धोनी पर कभी दूध निकालती मिसेज़ मुक्तिकुमार पर कभी गिलास से दूध पीते ओर मलाई पोंछते धोनी पर.बड़ा ही मनोहारी दृष्य बनता है.दूध निकालती घरवाली,बाल्टी में झागदार दूध,भैंस,मैदान ओर धोनी के चौके छक्के..........! तभी मुक्तिकुमार बतलाते हैं की  धोनी की फ़ेवरेट भैंस कोई और ही है....! रहस्य...रोमांच...! रहस्य भरा संगीत....।

स्टूडियो से वाचक घोषणा करता है- जाइयेगा नहीं हम मिलेंगे ब्रेक के बाद,और दिखायेंगे उस भैंस ओर तबेले को जिसे मुक्तिकुमार से इजाज़त न मिलने पर भी 'जान पर खेल कर' ढूँड निकाला है,हमारे संवाददाता के.प्रसाद ने.सारा देश टकटकी लगाये टीवी से चिपका रहा- परम रहस्य से पर्दा जो उठना था.

ब्रेक के बाद केमरा घोसीपुरा में मुक्तिकुमार के तबेले में घूम रहा है.संवाददाता के कपड़े गोबर-गंदगी से भरे पड़े हैं.केमरा चारा,रस्सीयां,गोबर,मरियल से बिजली के लट्टू,टोके,गंडासे से होता हुआ भैंसों की क़तार दिखाता हुआ एक ख़ास श्यामासलोनी 'भैंस' पर टिक जाता है.संवाददाता उवाच-"यही है वह वह अनमोल प्यारी भैंस जिसका दूध पीकर धोनी रनों की बरसात कर देता है"पार्श्व में गाना बजता है-"तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया".अब केमरा भैंस की आँखों पर जाता है,रुकता है-गाने की आवाज़-"झील सी इन आँखों में डूब डूब जाता हूँ".अब केमरा भैंस के सींगों के क्लोज़ से उसकी पूँछ तक मिड शॅाट से लांग शॅाट में जाता है.वाचक पूछता है -"इसकी उम्र क्या है"-संवाददाता-""बाली उम्र है"-शरारत से-"महिलाओं की उम्र नहीं पूछते".संवाददाता भैंस के नज़दीक़ हो गया.क्लोजप शॉट में भैंस ने उसका गाल चाट लिया-संवाददाता लजाता है.भैंस रंभाती है,सारा देश इस अद्भुत कौतुक को देख तालियाँ बजाता है.

चेनल सीसीकेएम पर यह स्टोरी टुकड़ा टुकड़ा कई दिनों तक सारा सारा दिन चली टीआरपी उछल कर सातवें आसमान पर चढ़ गई.खूब विज्ञापन मिले.चेनल निहाल हो गया.रिपोर्टर को १० लाख रुपये और बैंकाक में सुंदरीयों से मसाज का अवसर मिला -उसके पहले बोनस में गोआ ट्रिप अलग से.

जैसे "चूँ चूँ का मुरब्बा" तथा रिपोर्टर के दिन फिरे सब चेनलों के दिन फिरें.










 


Thursday, December 5, 2013

उत्तराखंड

स्वीकारोक्ति
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
खण्ड खण्ड
उत्तराखण्ड

नदियों पर निर्माण
हर प्रखण्ड

विनाश तय
लिखा शिलाखण्ड

नहीं चलेगा
पर्यटन पाखंड

क्यों सहती धरती
तय था दंड
**  

  

पुनःमूषक भव:

पुनःमूषक भवः आसाराम
-------------------------
/१/ आसाराम से
आसा
आसा से
आसू
फिल्म बनेगी
धाँसू
**
/२/ चलो
बुलावा आया है
जोधपुर ने 
तुम्हें
बुलाया है
**
/३/ भागमभाग
---------------

भाग
आसा 
भाग
यहां से भाग 
वहां से भाग
भाग
कर
गुस्सा
मुंह में झाग
उकसा
बंदे
धर्म राग
दिखा 
आंखे
उगल आग
अब ना 
छूटे
चुनरी दाग़

/४/ माया
---------
इस माया 
के 
तीन नाम
आसू
आसा 
आसाराम
           



















वह और वे

वह और वे
-----------
वह
सेंक रही
भुट्टे
*
वे
आँखें
***
वह
सुखा रही
बाल
*
वे
खून
***
वह
देख रही
लहरें
*
वे
चेहरे
***

Wednesday, December 4, 2013

जीत हार

जीत-हार
---------
मध्य रेखा से
स्वयं
ही
पैरों को
उखड़ने दिया तुमने
ताकि
मै जीतूँ
और तुम हारो
मैं
जीत कर भी
हार गया
पर क्या तुम
हार कर भी
जीती ?

गाँव

गाँव
----

कहाँ गाँव
कहाँ छाँव
*
शहरी मुद्रा
शहरी भाव
*
पंच चोपाल
काँव  काँव
*
गया लौटा
उल्टे  पाँव
*
गाँव ढूंडता
अपना गाँव

तलाश एक अदद् मुद्दे की

 तलाश एक अदद मुद्दे की

न आटे की जरूरत
न आग तवे की
न शेप  साईज की चिंता
न गूँथना पड़े न बेलना
न वक्त का तकाजा
कभी भी कहीं भी
लाशों पर चिता पर
सेना के हथियारों पर
किसानों की जमीनों पर
शिक्षा पर स्वास्थ पर
गरीबों के निवाले मिड डे मील पर
हर मुद्दे बे मुद्दे पर

किसी रंग का कोई दल
डाल गले में
राजनीतिक पट्टा
उठाकर झंडा
किसी पल किसी
कूद कर
खुश होकर
किलकारी मार  बजा के ताली
जाजम बिछा सकता है
पार्टी को जिमा सकता है
माहोल गर्मा सकता है
नोच सकता है
जिस्म से बोटियां
लाल कर सकता है गोटियां
सेक सकता है राजनीितक रोटियाँ

आ चरखा चला

आ चरखा चला
----------------

राजनीति  में  आ
शुरु  कर  चरखा

चुंधिया रहीं आंखे
धन  की  बरखा

देश  चरागाह  है
तू 'चारा' भी खा

जिंदे  जी    खा
मर कर भी खा

गली गली में बुत
बुतों में  भी  खा

सत्ता का बंटवारा
कब किसनें देखा

लुटेरों के गिरोह
पुत्र  भाई  सखा

हिंसा भी  मकबूल
इनको स्वाद चखा

पुश्तों    की    सोच
सूत्र   जाँचा  परखा

खोज

खोज
-----
जो मिला
उसे  खोजा न था

जिसकी तलाश थी
वह खोया न था

बार बार ढूँढ रहे अपने को ही



दुरभिसंधि : क्रिकेट

दुरभिसंधी :क्रिकेट
------------------

चुप चुप
स्पाट फ़िक्सिंग
गुप चुप
मैं भी चुप
तू भी चुप
   *
छुप छुप
देश में छुपद
विदेश में छुप
मिडीया से भाग
कहीं भी छुप
     *
रुक रुक
होटल में रुक
डील कर
फील कर
इन्द्रिय लोलुप
       *
भिड़ा तुक
फंसा हुक
डाल अड़गें
हम्माम में नंगे
पूरा झुक

गोआ में धड़ाम

गोआ में धड़ाम
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
तोड़ मरोड़
टुकड़ा जोड़
गिनती कर
जोड़ बेजोड़
     *
ओर दौड़
तेज दौड़
राजनीतिक रेस
घुड़दौड़
      *
कर होड़
अडवानी छोड़
इसी पढ़ाव
इसी मोड़
      *
रणछोड़
बने हंसौड़
करो बैठकें
ताबड़तोड़
     *
भण्डाफोड़
निकालो तोड़
इधर खाज़
उधर कोढ़
   

मसखरों के हाथ प्रजातंत्र

मसखरों के हाथो में प्रजातंत्र
-----------------------------

जाति   जाति  अगली  पांति

पिछड़े पिछड़े  क्यों  बिछड़े

अगड़े   अगड़े अब   बिगड़े

खाप     खाप माई      बाप

एसटी   एसटी कैसे    कटी

एससी एससी सबकी एजेंसी

दलित  दलित सबका गणित

भतीजा भतीजा साला जीजा

बेटी     बेटी   मत      पेटी

राम      राम  गया      राम

प्रजा     प्रजा   चख     मजा

तंत्र       तंत्र   मकड़     मंत्र
     

अथःसाक्षी पुराण

अथ:साक्षी पुराण
------------------
साक्षी ने साक्षी से कहा
सुन साक्षी धोनी
क्यों शक्ल हो गई रोनी
देनी होगी तुम्है अदालत में साक्षी
क्यों था विदू दारा साथ में
तुम्हारे बगल के बाक्स में

  **
साक्षी बोली साक्षी से
सुन साक्षी झाला
तुमने भी किया क्या कम गड़बड़झाला
संथ से तोहफा किया स्वीकार
अब कौन जीता पता नहीं
क्रिकेट पूरी तरह गया हार

***



वे न दुआ करते हैं न दवा करते हैं

वे न दुआ करते हैं न दवा करते हैं
---------------------------------

वे   न    दुआ    करते  हैं
न   वे    दवा    करते  हैं
          *
बोते    हैं  ज़हर   के बीज
समाज  में  घृणा  रोपते हैं
          *
किसी पर रहम नहीं  आता
लोग  घुटघुट के  मरते  हैं
            *
वे   बस  पलिता  लगाते  हैं
देश  में  बारूद    भरते  हैं
            *
आत्मा  मर  चुकी  उनकी
वे   विद्रूप   से      हंसते  हैं
            *
हिंसक हुआ  चेहरा  उनका
जिसे लोग  देख    डरते  हैं

क्षणिकाएँ

क्षणिकाएं
---------
काश
न होता असीम
आकाश
    *
धन
भरा होता
मन
    *
उदास
गहरी चुभी
फांस
    *
जीवन
उधेड़ बुन
सीवन
      *
पत्ते
पेडों के
लत्ते
      *
उड़ान
छू लूँ आकाश
अज्ञान
      *
बुद्ध
कब तक
युद्ध
        *

तलाक तलाक तलाक

तलाक तला तलाक
--------------------
गठबंधन टूटा
बरसों का संग
पल में छूटा
      **
किसके वादे
किसकी कसमें
कसमों का घट
क्षण में फूटा
        **
कौन भारी
कौन पिटा है
किसने घर में
किसको लूटा
      **
यह हरजाई
वह दगाबाज
कौन कहेगा
किसको झूटा
        **
इसने मनाया
उसने डराया
सनम बेवफा
जम कर रूठा

आस्था

आस्था
-------
आस्था
अनंत काल से
क्रूर होती है
अंधी होती है
अपने ही मद में
चूर होती है
इसीलिये
समाप्त होने को
मजबूर होती है



सोनभद्र में सोना

सोनभद्र में सोना
——————

बचपन से सुनते आये थे सपने देखो
देखने लगे
नींद अच्छी आती थी
राष्ट्रपति कलाम ने कहा
बड़े सपने देखो
बड़े सपने देखने लगे
साधू शोभन ने ओर बड़ा सपना दिखाया
डोंडीयाखेड़ा में सौ टन सोना दबा है
खुदाई करो ले जाओ
दिन में भी सपने देखने लगे
नींद खुली तो बेचेन हो गये
करवटें  बदलने लगे
रात दिन की नींद ग़ायब हो गई
खबर पढ़ी
सोनभद्र में हज़ारों टन सोना मिला
बौरा गये
फिर पढ़ा झूठ है
खोदा पहाड़ निकला चूहा

सोना तो क्या रोज़ का सोना भी गया
अब सपने क्या ख़ाक देखें

😜 जसबीर चावला


ऊँचे लोग ऊँची पसंद

ऊँचे लोग ऊँची पसंद
---------------------

क्रिकेट खेल है भद्र जनों का
बड़ों का कुलीनों का
एलीट क्लास का
जैंटलमेनो का
ऊँचे लोगों का
ऊँचे लोग-ऊँची पसंद
चीअरगर्ल कालगर्ल
परम आनन्द
        *
बड़े लोग बड़ी बातें
बड़ी पार्टियाँ रंगारंग रातें
करोड़ों की बारिश रन बनाते
वारा न्यारा आते जाते
काहे की बही काहे के खाते
ऊँचे लोग-ऊँची पसंद
छोटा शकील बड़ा दाउद
नित्य आनंद

तस्वीर नहीं बनती

तस्वीर नहीं बनती
--------------------
चिपकी मुस्कान / भंगिमा
ओढ़ी उदासी से
प्रसांगिक
हो सकता है
फोटू
स्मृतियों में
अंकित स्मित / याद
मौन / उदास / अवसाद
से
घिरे मन / क्षण
का चित्र
कौन केमरा लेगा
किस गति से?

चुनोती

चुनोती
-----
क्या गिराओगे
तुम मुझे

मैं खुद ही
पक चुका हूं अब
**

सखि वे मुझे जेल लेकर जाते

सखि वे मुझे जेल लेकर जाते
-----------------------------
पच्चिस सौ साल पूर्व
नींद से जागी यशोधरा
बगल में लेटे तथागत गायब
पलायन बाद गौतम बुद्ध कहलाये
यशोधरा का त्याग / पीड़ा
'सखि वे मुझसे कह कर जाते'
     *
चौदह बरस का बनवास
राम सीता गमन
साथ भाई लक्ष्मण
सीता के संग राम
विवाहित उर्मिला विरहिणी एकाकी
उर्मीला का त्याग / पीड़ा
'सखि वे मुझे वन लेकर जाते'
      *
इन्हीं दिनों की बात
जमानत पर छूटे
अंकित चव्हाण का साथ
ले हाथों में हाथ
मंगेतर नेहा ने रचाया ब्याह
कोर्ट में किया समर्पण
अधूरे हनीमून की कसक / पीड़ा
'सखि वे मुझे जेल लेकर जाते'

जिन खोजा तिन पाईया

जिन खोजा तिन पाईया
------------------------    
तुमने न खोजा
न तैरे न गहरे पेठे
बस रहे किनारे बैठे
फिर भी यशस्वी कहलाए
मोतियों के थाल पाये

हम तैरे भी डूबे भी
उतराए गोते खाए
बहुत हाथ पैर मारे
वाह री क़िस्मत
मोती तो दूर कौडी भी ना पाये
 

          

आँगन की लोकी

आँगन की लोकी
-------------

आँगन में लगी लोकी
घर की लड़की
दोनों तेज़ी से बढ़े
लोकी लोकी की तरह
लड़की मुहावरे की तरह
नाख़ून गढ़ा लोकी परखी गई
सब्ज़ी बनी परोसी गई
अांखे गढ़ा लड़की तोली गई
अगवा हुई मसली गई
पंचायत ने फैसला दिया
मारी गई

कल और आज

कल और आज
---------------

कल और आज
--------------
कल के खंडहर बतलाते हैं
इमारत बुलंद थी
आज का मलवा बतलाता है
इमारत भ्रष्ट थी


असंतोष

असंतोष
--------
क्या नहीं
मिला उन्हें
भरे पूरे
जीवन में
    ०
फिर भी
पड़े रहे
उधेड़ में
सीवन में
***


कदम्ब के नीचे

अच्छे भले इंसान थे वे
उन्होने सुना
पेड़ के नीचे कभी बैठे गौतम
ज्ञान मिला
महात्मा बुद्ध कहलाये

ज्ञान की तलाश में वे भी कदम्ब के नीचे जा बैठे
उन्हें ज्ञान मिला
प्रेम सत्य अपरिग्रह सद्भावना
बेकार की बकवास
अंतिम सत्य है सत्ता

जांच हुई एक भला आदमी कैसे फँसा
राजनीति के कीचड़ में
नतीजा अाया
कदम्ब का पौधा रोपा सींचा था
किसी राजनीतिज्ञ ने

अथ:राजनीतिज्ञ कथा

अथ:राजनीतिज्ञ कथा
----------------------

खरबूजों का समाज है
सड़ान्ध मारते ख़रबूज़ों का
यहाँ स्वागत नहीं दूसरे का
रेल के डब्बे में आये नए यात्री का

इनके अपने नियम कानून हैं
गिरगिट सा रंग बदलना है हर खरबूजे को
दूसरे की खींचनी हैं टांग केकड़े समान
अलग अलग झपटना,नोचना है
झगड़कर खाना है गिद्धों के समान

यह समाज है राजनीतिज्ञों का
गिद्धों,खरबूजों का
गिरगिटों,केकड़ों का
सड़े अंडों का,अपने डंडों झंडों का

मुकदमा ईश्वर बनाम धर्माचार्य

मुकदमा ईश्वर बनाम धर्माचार्य
—————•—————

ज़िहाद, क्रुसेड,धर्मयुद्ध
'धर्म' के काम हैं
युद्धों से ज्यादा धर्मयुद्ध हुए
कितने भवसागर पार हुए ?
कितने बन्दे मार दिए ?
बस्तियां वीरान हुईं 
कितने बलात्कार किये ?

क़यामत का दिन / फैसले की घड़ी
खुदा, ईश्वर जो कोई भी होगा
करेगा हिसाब किताब
पूछेगा सवाल जवाब
खुलेगा सबका 'पक्का' चिट्ठा
सेवकों,मोमिनों,रामभक्तों का
वाहेगुरु के बंदों का
* *
सवाल ईश्वर से है
तुझे पता है कि तू है
है,तो चुप क्यों था ?
अब भी चुप क्यों है ?

☘ ज स बी र   चा व ला
       

मिड डे मील

मिड डे मील
अगर होता 'मिड डे मिली'
तो तुक मिलाते
उचित है खाने में छिपकली
पर बिना नाम बदले भी
खाना पोषक है / पाचक है
मारक है
क्योकि इसमें कीट नाशक है
 
(सन्दर्भ : बिहार में मिड डे मील में कीट नाशक
     मिलने से अनेक बच्चें की मौत हुई)

प्रतिप्रश्न

प्रतिप्रश्न
--------
क्यूँ होती है सदा व्यवस्था निगरानी
संवेदनशील बेबस क्षेत्रों में ही
क्यों नहीं होती गश्त चोकसी
वेदनाहीन निष्ठूर आस्थाओं के मठों में
जाति धर्म के आश्रमों में
अँधेरे विवेकशून्य कोनों में
सहस्त्रबाहू के महलों में गलियों में
   

फोटू हो जाना

फोटू हो जाना
--------------

कितना आसान है 
क्षण में दुनिया से लुप्त हो  जाना
फोटू हो जाना
महंगी फ्रेम के चौखटे में जड़ जाना
जड़ कर जड़ हो जाना
चंदन का हार डल जाना
घर की किसी उदास दीवार पर टंग जाना
कितना आसान है
*
कितना मुश्किल है
उस फोटू से संवाद करना
फोटू से आँख मिलाना
फोटू से आंख चुराना
कितना मुश्किल है 
कितना मुश्किल है.

     
     

धर्मं पताकाएँ

धर्म पताकाएँ
—————

किसी ने चुराया हरा रंग 
किसी ने सफ़ेद
कोई भगवा
तो कोई केसरिया ले उड़ा

नोंच लिया नीला पीला
बाँट लिया इन्द्रधनुष 
बना ली धर्म ध्वजाएँ 
रंगों से पहिचान बनी
रंगों पर झगड़ा हुआ 
धर्मं दूर कहीं छिटक गया


राजनीति की बालपोथी :अमर उठ अब घर चल

 राजनीति की बालपोथी:अमर उठ अब घर चल 
-----------------------------------------------

उन्होंने पाल लिये तोते 
कुछ कैद किये 
कुछ तोते मार दिए
नहीं उड़ते उनके हाथों के तोते
न रेंगती जुएँ कानों पर
न पड़ती सिलवटें माथे पर
अंतरात्मा की आवाज से
आर्तनाद सुनाई नहीं देता 
टंगी आत्माएँ सत्ता की खूंटी पर
भ्रष्टाचार के दलदल में शूकर स्नान हो रहा 
गिद्धों का महाभोज
साम्प्रदायिक गलियों में भौंकते श्वान
कौन सा दल
किया न जिसने दल बदल
कौन नायक,कौन खल
अमर उठ अब घर चल

द्वन्द

द्वंद
----

संलिप्त होना था
निर्लिप्त रहे
निर्लिप्त होना था
संलिप्त रहे
कभी विरत हुए
आसक्त हुए
कशमकश रही
कब उनका हुए कब ना हुए

महाजनी सभ्यता

महाजनी सभ्यता
----------------

विशेष हवा मिट्टी अधोरचना में इनका बीजारोपण हुआ
अंकुरित हुए
सजाया  सँवारा  दुलारा गया कुशल हाथों से
दूसरों का हक़ मार खाद पानी दिया
बढ़ने के अवसर दिये
ये जमे  फले
एक के चार चार के चालीस हुए
अस्तित्व में आ चुका इनका वजूद
अब इनका वर्ग आचार विचार संस्कृति अलग
अलग धरातल नस्ल जुदा
बोन्साई पैदा होते
हाथों हाथ लिये जाते
जड़े गहरी नहीं
न विचार न व्यापार की
वैश्विकरण की महाजनी सभ्यता के प्रतीक
ये कारपोरेट बोन्साई

कठपुतली रोबोट

कठपुतली रोबोट
-----------------


उन्हें चाहिये थे  ढेरों रोबोट
पहली पीढ़ी के
जो न सोचें समझें न बोलें
बस कमान्ड समझें
आदेश मानें
**
गांव गली रोबोटिक संस्थान खुले
छात्रों के दिमाग खोले
भरे डाटा / झूंटे आंकड़े
काल्पनिक गाथाओं / कल्पित शत्रुओं के
धर्म युद्धों के
धार्मिक अधर्मिकता के
अतीत के
मिथ्याभिमान के
रूढियों / अत्याचारों के
विकारों के
इतिहास की
सायास विकृत समझ के
**
भर दिये शब्द
बदला लूंगा
फाईलों में / स्मृतियों मे
चस्पा कर दी छद्म छवियां / उकेर दी मुर्तियां
मन की भित्तीयों में
रोप दी युद्ध नीति / युद्धोन्माद
सतत घृणा
**
सील कर दिये गये मन / मस्तिष्क / विचार
बंद खिड़की / बंद द्वार
न ताजी हवा / न विविधता
गुमा दिये पासवर्ड
हर आदेश के लिये तैयार
क्या हुकुम मेरे आका
**
अलग रोबोट / अलग काम
लड़ने वाले / दंगे वाले
नंगे वाले
आग वाले / अफवाह वाले / विध्वंस वाले
नोचने वाले / भौंकने / टी वी पर बोलने वाले
वाचाल / चौंकने वाले
तनी भ्रकुटि / फूलती नासा / बिगड़ी भाषा
किस्म किस्म के रोबोट
और अब सुपर रोबोट

श्वान प्रवृत्ति

श्वान प्रवृति 
————-
तन मन में अदम्य इच्छा उत्तेजना
जागती है उनके
कहीं भी कभी भी
देखते ही खाली दीवार

टांग उठाऊ
आदिम कुत्ता प्रवृत्ति 
त्याग करेंगे
बटन खोल कर 

पहले पोत देंगे 
या चिपका देंगे
अपना नाम नारा
पार्टी पोस्टर

पंचायती राज

पँचायती राज
—————

आज नजर नहीं आया वो प्रेमी जोड़ा
मिलता था रोज
हँसता / कूकता / किलकारी भरता 
ले हाथों मे हाथ 
चुपके से प्यार करता
भविष्य के सपने बुनता 

एक अखबारी खबर 
पेड़ से प्रेमी युगल लटकाया
पँचायत का फैसला 
दोनों की जात अलग थी

एक और जोड़ा लटका
खाप के आदेश से
एक ही गोत्र था उनका

सच कहा है
प्राण जाये तो जाये 
जात न जाये
     
☘ जसबीर चावला 


राजनीतिज्ञ कबीले

राजनीतिज्ञ कबीले
--------------------

सारा दिन / बक बक / चख चख
दागते गोलियाँ / गालियाँ / बोलियाँ
इस पर / उस पर
'अ' ने 'ब' पर निशाना साधा
'ब' ने पलट वार किया
'अ' ने फिर वार किया
अंत हीन सिलसिला
राजनीतिज्ञ नहीं आदिम कबीले
वही संस्कृति / मानसिकता
दाँव पेंच दंगल
खबरों की गुफाएं घटाटोप जंगल
टी वी का कल्याण कुशल क्षेम मंगल
 

डाक्टर 'नो'

डाक्टर 'नो'
-----------
लोग ऐसा कहते थे
वह भगवान नहीं थे
भगवान से कम भी नहीं

अफवाहों सी फैलती शोहरत
हाथ साफ है उनका
दिल का हर आपरेशन कामयाब
चले गये एक दिन चुपचाप दुनिया से
सोये सोये दिल के ही दौरे से
उद्घाटित हुआ सच
दिल की जगह खाली थी
तनिक न थी जगह न कोना
करूणा दया ममता का
गोदाम में भरे थे दौलत के अंबार
शोहरत की पूंजी चस्पे अखबार
कैसे थे डाक्टर वो
शायद डाक्टर 'नो'

अंतर्द्वंद

अँर्तद्वंद
--------

'हाँ' कहने में
दिल लगता है
'ना' में दिल भी दिमाग भी
कैसे कह दूं
'ना'
तुम्हारी इस
'हाँ' के बाद


हलफनामा

हलफ़नामा
----------

सुने को अनसुना किया
अनसुने को सुन लिया
तुमने कुछ कहा
मैंने क्या सुन लिया
मैने क्या कहा तुमने क्या सुन लिया
कुछ उधेड़ दिया
कुछ बुन दिया
बस उधेड़-बुन में जीवन बीत गया



       

तमसो माँ ज्योतिर्गमय

तमसो माँ ज्योतिर्गमय
-----------------------

आस्था होती है मूक बधिर
पुरोगामी अतीत
गांधारी  धृतराष्ट्र
कभी वाचाल
विवेकहीन भीड़ भेडचाल
अनास्था है तर्क बुद्धि
ज्ञान खोज विज्ञान
नईजमीन समाधान
 
आस्था पर बढ़ रही अनास्था
अनास्था पर आस्था
   

नई गरीबी रेखा : ब्रांडेड ब्लू जींस

नई ग़रीबी रेखा:ब्रांडेड ब्लू जींस 


दूसरा पहलू
—————

वे गरीब नहीं थे 
ग़रीबी दिखाना चाहते थे
मॉल में गये 
देखी परखी ब्रांडेड ब्लू जींस /टॉप /शार्ट
चूना सा पुता था पीछे आगे 
लटक रहे पायंचो के धागे
छपे फटे थेगले
टखनों से जाँघों तक कटी फटी बेतरतीब 
लिखा था प्रियंका चोपड़ा के क़रीब 
खुश हुए
पहनने पर बीपीएल लगेंगे 
अमीरों में गरीब लगेंगे
ख़रीद लिये ढेरों अपने लिये
बीबी बाबा बेबी बबुआ के लिये 
अब वे भी बहुत नीचे थे
‘हाई क्लास’ ग़रीबी की रेखा के 

🦉  जसबीर चावला





बार बार

बार बार
---------

मन आँखें उत्सुक होते हैं
जानते हैं
रंग बिरंगे चमकीले कागज से लिपटा डब्बा
सस्ता सा उपहार होगा
खोल कर देखने छूने की जिज्ञासा

ऐसी ही बेचेनी / अतृप्ति
ले जाती है बार बार कदमो को
किसी अज्ञात की तलाश में
ठगाने के लिए

उपक्रम

उपक्रम
--------

बुना गढ़ा हुआ सन्नाटा
मौन तोड़ें
भंग करें पसरी नीरवता उदासी
एक चीख से
चाहे उसाँस से
एक कनखी से
एक आहट से
चुंबन से
दस्तक से
दिल की एक धड़कन से
बस उपक्रम करें

किसी का भी नाम लो

किसी का भी नाम लो
-----------------------

ये पुरुषों का जंगल है
जहाँ बेकायदा है कायदा
उन्हीं की हुकूमत
उन्हीं का डँडा
करते शिकार पड़ता है हाँका
मधुमिता शहला गीतिका निर्भया अनुराधा
ढेरों नाम हैं और भी
सबके थे सपने
भरना चाहती थी उड़ान मुक्त आसमान में
पर कतरे गए पिंजरे में कैद हुईं
मरी / मारी गईं
ये जंगल है पुरुषों का
यहाँ पड़ सकता है हांका
कहीं भी कभी भी

राम की चिंता राम ही जाने

राम की चिंता राम ही जानें
---------------------------

राम की सौगँध
राम ने कब सोचा था
राम के नाम पर ही बोला जायेगा झूट
उसके नाम पर होगा छल कपट
दंगा फ़साद लूट
राम ने कब सोचा था
नफरत की आँधी होगी
बँट जायेगा देश खानों  में
हिन्दुओं मुसलमानों में
राम ने कब सोचा था
मुँह में राम बगल में छुरी
किसी एक के ही नहीं लाखों मुँहों में राम होगा
बगलो में हथियार होंगे
राम ने कब सोचा था
ऐसा राम ने कब सोचा था ?

संतोषी

संतोषी
--------
वे दौड़े तेज
खूब तेज
दूसरों को ढकेलते
पीछे छोड़ते
गिरे औंधे मुंह धड़ाम
उच्चतम न्यायालय में काम तमाम
वे भी दौड़े दौड़ रहे
फर्राटे से
फूली साँस हांफ रहे

वे चल रहे हैं कभी धीरे कभी मध्यम
लौटते भी हैं उल्टे पाँव कभी कभार
देख छांव
मुदित मन अब भी चल रहे हैं

मस्तकाभिषेक

न चाल बदली
न चरित्र
न चेहरा

एक फोटू
हटाया
एक फोटू
बदला

नया सिर
कर आरती
बांधा सेहरा
    

मैं और कविताएं

मैं और कविताएँ 
——————-

अकेला जाता हूं सुबह
कुछ साथ हो लेती
कुछ थोड़ी देर संग करती
ग़ायब हो जाती
कई दूर तक साथ निभाती
कुछ वाचाल / जल्दी पीछा छोड़ देती
लौट लौट आती कई स्मृति पटल पर
कोई और साथ हों तो
गुरेज करती / चुप लगाती
बीच बीच में
दस्तक भी देती
जो घर तक आती
वे घर कर जाती
मजबूर करती हैं
अब उन्हे न छेड़ा जाये / न छोड़ा जाये
एक साथ हमला करती अभिसारिकाएँ 
ये कविताएं

हरि और नरहरि

क्षमा बढ़िन को चाहिये
छोटन को उत्पात
का हरि को घटि गयो
जो भृगु मारी लात'
हरि बड़े हैं / भूल चूक माफ
बड़प्पन / क्षमाशीलता भरे
वे हरि हैं
बदले संदर्भ में
सत्ता में हो नर हरि(?)
मद में चूर / मगरूर
दोहे के उलट
रघु को लाितयाए / गरियाए
तो बेचारा आम रघु
कहां जाये
सावन जो आग लगाए
उसे कौन बुझाए
      

टीवी पर : भाग खबर भाग

टीवी पर : भाग री खबर भाग
 ————•————

तेजी से और तेजी से खबर परोसो
गरमा गरम खबर परोसो
पक्की नहीं तो कच्ची परोसो
कानाफूसी गॉसिप चलाओ
दस मिनिट में सौ खबरें दिखाओ
खबर को तोड़ो टुकड़े बनाओ
दस खबरों के नाम चलाओ
भाग खबर भाग / तेज सबसे तेज / सबसे पहले
अभी अभी / बड़ी खबर / खबर से पहले खबर
मोका मत देना सोचनें विश्लेषण का
गाय गोबर पर पर अटके रहना
तलाक लवजिहाद की डाल पर लटके रहना
एँकर तू खूब चीख़ना चिल्लाना
खुद ही देश बन जाना
स्टूडियो में आग लगे मत भागना
       
☘  ज स बी र  चा व ला
          

जूते और जोड़ाघर


जूते और जोड़ाघर
——————-

आज आख़िर उन्होंने छुटकारा पा ही लिया
लंबे समय से साथी थे
ब्रांडेड एक जोड़ी जूते
*
पहन कर उन्हें देश विदेश खूब चले
हिमालय की तलहटी,बस्तर के जंगलों में
कलकत्ता की सड़कों से मुंबई के बंगलो मे
काहिरा से सेनफ्रांसिस्को में
मंदिरों,गुरूद्वारों,मजारों में
गुरुद्वारों में होता है 'जोड़ा घर'
जूतों की सफ़ाई करते भक्त
बहुत रक्षा की इन जूतों ने पांवो की
कीचड़,कंकड़,काँटों से
ऊंची नीची धरातल पर बेख़ौफ़ चले जूते

अब तले घिस गये उनके
रंग बदरंग हुआ झुर्रीयां पड़ी
चमक जाती रही
बच्चे भी कहने लगे छुटकारा पा लो इनसे
किसी काम के नहीं रहे
बू आती है अच्छे नहीं लगते
आख़िर उन्होंने डस्टबीन में फेंक दिये जूते
**
एक जोड़ा और था उसी घर में
पड़ गई उसके भी झुर्रियाँ उड़ी रंगत
पर चस्पा था अनुभव अतीत का
बच्चों की खातिर वह खूब चला ख़ूब घिसा
उनके स्वपनिल रंगो के लिये जिया था
अब पक चुका था
थक चुका था
पता नहीं चुक चुका था ?
**
खबर आई शहर के 'ओल्ड होम' में ख़ाली है कमरा
मिल जायेगा जोड़े को
कई 'सुखी जोड़े’ हैं इस 'जोड़ा घर' में
उस दिन बिदा हुए
'दो जोड़े' उस घर से

- जसबीर चावला 

ईशान कोणःफील सेड

ईशान कोण : फील सेड
—————————

कौरवों की पराजय हुई
किसी पाँडव के मन में ख्याल आया
जो हारे,जो मर गये
हमारे अपने थे सखा-बंधु
सभी पाँडवों में साँझा हुआ यह विचार
क्यों हुआ भीषण रक्तपात
क्या अपरिहार्य था युद्ध ?
क्या अंतिम विकल्प था युद्ध ?
भर गया सबका मन आत्म ग्लानि से
पश्चाताप,निस्सारता,वितृष्णा से

प्रायश्चित होगा
चल पड़े पांडव द्रौपदी और कुत्ते के संग
ईशान कोण में हिमालय की और

कोई नहीं जानता इन दिनों
फ़ील गुड / फील सेड से परे  
हिंसक घटाटोप में
कहीं कोई खोज रहा है अपना ईशान कोण
अपना हिमालय
अपने हिस्से की ग्लानि
अपना पश्चाताप
अपना धर्म 

वैज्ञानिक का कायाकल्प

वैज्ञानिक का कायाकल्प
-----------------

संस्कृति / संस्कार / परंपरा धनी वैज्ञानिक पति 
पोष माह के शुक्ल पक्ष की तिथी ग्यारह से माघ माह के शुक्ल पक्ष के मध्य की तिथी बारह को पांचाग बाँचा
संगम पर कुंभ मेले में वास किया
पत्नि संग 'कल्पवास' किया
**
पर्ण कुटी में धरती पर सोये
धैर्य / अहिंसा / सदाचारी  रहे
इन्द्रियों पर क़ाबू किया
स्वयंम भोजन बनाकर एक बार खाया
प्रातःकाल उठ भजन गाये
त्रिकाल संध्या / सत्संग किया
दिन में तीन बार त्रिवेणी स्नान किया
पत्नि संग तप किया  
होम कर स्वर्ण दान किया 
घृतदीप जलाये
ईशान कोण में ग्रहों की स्थापना की
ब्राह्मण जिमाये
सब विधी विधान से किया
मोक्ष की कामना की
मुक्ति मांगी जन्म जन्मातंरो से
**
समय के अंतराल से उनका 'कायाकल्प' हुआ
माँ के आज्ञाकारी पुत्र ने पत्नि को घर से निकाल दिया
उसने दूसरी बेटी जनी थी
वैज्ञानिक जानते थे
लिंग का निर्धारण करते हैं पुरुष के क्रोमोसोम वाय एक्स
**
मोक्ष तो बेटे से मिलता है
वंश बेटे से चलता है
अर्थी को कंधा / मुखाग्नि / श्राद्ध / तर्पण बेटा करता है 
विज्ञान क्या जाने गूढ़ बातें
समाज रूढीयों / अंध विश्वासों / बंधनों से चलता है

इसीलिये यहां सब चलता है

अमीर और ऊंट

अमीर और ऊँट
---------------

एक अरबपति को स्वर्ग में देखा
भगवान चकराया
अमीर अंदर कैसे घुस आया
मैंने तो नियम बनाया
ऊँट भले ही सूई के छेद से निकल जाये
अमीर स्वर्ग में न घुसने पाये
कहा अमीर ने मेरी बात सुनिये
मन चाहे जो फैसला कीजिये
मैं ऊँट पर बैठ व्यवस्था में छेद कर आया हूं
लॉलीपाप दी यमराज को
सूई भी साथ लाया हूँ


(बाइबिल की कथा मैथ्यू 19:24 ऊँट भले ही सूई के छेद से निकल जाये,अमीर आदमी स्वर्ग नहीं जा सकता)

जीवन का गुणा भाग


जीवन का गुणा भाग
---------------------
उद्यान में तुमसे सदा तेज चला
दो ही चक्कर लगा पाती तुम
तीन के मुकाबले
मैं अँकगणित के उदाहरणों में सदा उलझा रहा
एक धावक की गति दूसरे से तेज है
कब मिलेंगे दोनों
अवचेतन में अव्यक्त स्पर्धा
अच्छा होता जो समानांतर चलता
सहमति के अधिक बिंदु होते
जोड़ बाकी न होता
जीवन निर्द्वंद होता

बस मुस्कुराइये

बस मुस्कुराईये
---------------
मुस्कुराइये
बस मुस्कुराइये
बेबात मुस्कुराइये
किसी भी कोण की मुस्कुराहट हो
बस मुस्कुराइये
किसी बहाने से मुस्कुराइये
बिना बहाने के मुस्कुराइये
बस मुस्कुराइये
००
मोनालीसा क्यों मुस्कुराई इसे छोड़ो
पर्याप्त है मुस्कुराई
बस यूं ही मुस्कुराई
न खुला है न खुलेगा
उसकी मुस्कुराहट का भेद
भेद न खुलने पर ही
मुस्कुराइये
००
सोये अबोध शिशु की हँसी
मां की मुस्कुराहट देखिये
इस मुस्कान पर आप भी मुस्कुराइये
दूध पीते बछडे को देखिये
नन्हें बच्चे को खेलते
पानी में बदख तैरते
इन सब पर भी मुस्कुराइये
बस मुस्कुराइये

कैसे कह दूं कि मैं आज़ाद हूं

कैसा कह दूँ कि मैं आजाद हूँ 
----------------------
तुम कहते हो मैं आज़ाद हूं
तुम आज़ाद हो
हम सब आज़ाद हैं
*
हां मैं आज़ाद  हूं
यह कहने के लिये कि मैं आज़ाद हूं
तुम्हारी हर बात सहने के लिये 
हर हाल रहने के लिये
मैं आज़ाद हूं
यह मेरी लक्ष्मण रेखा है 
हद है
*
तुम सिद्ध हस्त
कुछ भी कर सकते हो
पक्के खिलाड़ी
हथेली में सरसों उगा सकते हो
सरकार बना / बिगाड़ सकते
हवा में / दिल में / दिल्ली या भोपाल में
तुम सर्वगुण सम्पन्न
सगुण निर्गुण निराकार
कर सकते जोड़ तोड़ हर प्रकार 
तुम हर जोड़ में बेजोड़
लगा सकते टांका / चूना
चमका सकते छवि अतीत के खंडहर की
खोल सकते कलई एक दूजे की
चाह कर भी उतार नहीं सकता
तुम्हारा मुलम्मा / नकाब
यह विवशता ही मेरी आज़ादी है
*
मैं आज़ाद हूँ केवल तुम्हैं ही चुनने के लिये
साल दर साल / पांच साल
तुम्हें सुनने के लिये
नाथ के बदले दूसरे नाथ के लिये
एक बांबी से दूसरी बाँबी के सफ़र के लिये
मैं आज़ाद हूं
*
क्योंकि मैं आज़ाद हूं
तुम्हारे भ्रष्टाचार के लिये
मुंह से झड़ते / विचार के लिये
मुझे आज़ादी है चुनाव की
कैसे मरना चाहता हूं मैं 
भूख / भय / अत्याचार से
थोपे / ठूंसे गये कुत्सित विचार से 
पुलिस के प्रहार से
मैं आज़ाद हूं तुम्हें हीं चुनूं
मतपत्र में कहाँ कालम है 
तुम्हें वापस बुला सकूँ
*
भूलूं कि मैंने तुम्हे चुना
तुम आज़ाद रहो / बेलगाम रहो
पस्त रहो / तनसे / मन से
अस्त वयस्त रहो
सत्तामद में / मस्त रहो
लूटते रहो / गिरवी रखो
देश को विदेश में
तुम आकाश कुसुम
न छू सकूं / न आवाज दे सकूँ 
यह तुम्हारी आज़ादी है
नहीं चाहता ऐसी आजादी
मुझे चाहिये दूसरी आज़ादी

खैंच रे राम्या खैंच

खैंच रे राम्या खैंच
-----------------
कस्बा खरगोन का तलाब चौक
खुरदरी पथरीली नंगी जमीन 
देख रहे तमाशबीन
जमीन पर अधलेटी महिला
निम्न वर्गीय एक युवक निर्ममता से खींचते पीट रहा
बाल पकड़ घसीट रहा
चीख रही महिला प्रतिरोध में
मर जाऊंगी
नहीं जाऊंगी नहीं रहूंगी तेरे घर में
हाथ से आंचल ढांकती साड़ी संभालती
लोलुप निगाहों से बचने की असफल कोशिश करती
बेबस कातर निगाहों से ताकती
मदद की अपेक्षा करती
अधेड़ वय का एक व्यक्ति बार बार चिल्ला रहा
मैं ससुर हूं लड़की का
खैंच रे राम्या खैंच राम्या खैंच
राम्या उसे घसीट उसे खींच
*
किसी एक ने की हिम्मत
उसे रोका टोका
मत मार छोड़ दे महिला को
तल्खी से बोला अधेड़
आप मत बोलो बाबूजी बीच में
यह उसकी बीबी है 
घर छोड़ आई
घर नहीं जा रही
मरद है यह उसका 
हक है उसका
चाहे पीटे मारे काटे
मरद लुगाई का मामला है
आपका कोई हक नहीं जो बोलो
खैंच रे राम्या खैंच
खैंच रे राम्या खैंच
*
बीते छै दशक जब मैं चश्मदीद था
क्या हम बदले 
आज भी चश्मदीद हैं
चुप हैं तमाशबीन है
आज भी ताक रही कातर सूनी निगाहें
आ रही आवाजें दाएँ बाएँ से
खैंच रे राम्या खैंच
खैंच...............!

खबर है कि कोई खबर नहीं

खबर है कि कोई खबर नहीं
-----------------------------
केलिफोर्निया के जंगलो मे भीषण आग
चीन की कोयला खदानों मे विस्फोट
बंगलादेश में भयंकर बाढ़
सैकडों मरे लाखों बेघरबार
जापान में भूकंप
हिंद महासागर में सोमाली डाकूओं का जहाजों पर हमला
बँधक लाखों डालर में रिहा
घर वालों के आरोप सरकार की ढिलाई
पेशावर/करांची/बगदाद/ गाजा पट्टी
बसों /स्कूलों /मस्जिदों में/बमों के आत्मघाती हमले
शिया/सुन्नी/अहमदिये/कादियानी मसले
फ्लोरिडा/ ओखलाहोमा में तूफान
न्यूयार्क/शिकागो में कई फुट गहरी बर्फ की चादर
रोज की सुर्खियां हैं अखबारी पन्नो की
बेमन से उड़ती निगाह वाली सुर्खियां
वहां ऐसा ही होता है
ऐसा ही होना है
कोई संवेदना/स्फुरण/स्पंदन नहीं
सिहरन/उत्सुकता/सहानुभूति नहीं
न मन तनिक रुकता/अटकता/सोचता है
न ही चाय के प्याले में तूफान आता है
**
मेरे देश के हर शहर/गांव मे
हत्या/लूट/बलात्कार/चोरी
डकेती/आगजनी/सीनाजोरी
भारतीय दंड विधान की हर धारा
घट रही हर पल/क्षण
टेक्सचोरी/जांचे/छापे
रोज नये जांच आयोग
किस किस को नापें
हर वाहन/रेल/टकरानें/ के लिये
हम अभिशप्त हैं
लू से/शीत लहर/बाढ़/आग से मरने के लिये
हर त्रासदी के लिये
**
दिन प्रतिदिन/हर माह/ हर साल
खबरें नहीं अखबारी कर्मकांड
गढी हुई प्रायोजित पेड खबरें
एक ही शब्दावली
बेरंग/बेरस खबरें
कब नहीं घटी ये घटनाएं
कल भी/आज भी/कल भी घटेगी
चौंकना कैसा
**
किस किस को याद कीजिये
किस किस को रोईये
आराम बड़ी चीज है
अखबार ढक के सोईये
...?

Tuesday, December 3, 2013

हाउस ऑफ़ स्लेव्स

हाउस आफ स्लेव्स' माने गुलामों का घर
ओबामा सेनेगल गये जहां
पत्नि मिशेल/बच्चीयां साशा/आलिया संग
अफ्रीकी दौरे में
**
भावुक हो गये याद कर
उन अत्याचारों को
युरोपियनों/गोरों ने
कभी ढहाये थे
कालों/अश्वेतों पर
**
सत्रहसौ छियत्तर निर्मित
सेनेगल गुलामघर
गुलामो का भण्डार गृह
समन्दर किनारे
गोरी आईसलेंड पर
हालेंड नें रचा
व्यंग देखिये
अश्वेत सेनेगल/अश्वेत गुलाम
आईसलेंड 'गोरी'
**
पुर्तगाल/हालेंड/इंग्लेंड/फ्रांस/स्पेन
सबके गुलामघर
मन्डियां/बाजार
अफ्रीकी देशों में
पकड़े/रखे/खरीदे जाते
अश्वेत/गुलाम
गोरे यूरोप/ अमेरिका
निर्यात के लिये
ताउम्र गुलामी के लिये
मर कर भी
न लौटने के लिये
**
ओबामा ने देखा होगा
आठ गुणा आठ फुट का कमरा
ठूंसे जाते
बीस बीस गुलाम
पीछे हाथ बांध
बाजू/गला बांधने की चेन
बच्चों/ठूंसी औरतों
जवान लड़कियों के
अलग अलग कमरे
जुदा जुदा
परिवार से
**
दासता से मुक्त होती/पीछे छोड़ी जाती
जवान/अश्वेत लड़कियां
चमत्कार से
हो जाती जो गर्भवती
गोरों के बलात्कार से
**
कम वजनी गुलामों
का कमरा
जहां
फिट/मोटे/हो सकें
वे
खा कर
स्टार्च युक्त खाना
जैसे ब्रायलर चिकन/बिजींग डक
को खिलाया/ठूंसा जाता हैं
दाना
वजन बढ़ाने को
आज भी
**
समुद्र की जेट्टी देखी
जहाजों पर चढते गुलाम
मां/बाप/बच्चे
अलग अलग
देशों के लिये
'डोअर आफ नो रिटर्न'देखा
पार कर जिसे कोई लौट नहीं पाया
आंकडे़ देखे/सुने/समझे
डेढ/दो करोड़
असभ्य(?)गुलाम
भेजे गये
सभ्य(?)गोरों के देश
बंधे हाथ
तीन शताब्दियों में
**
जीवन से
मुक्त होते
वे गुलाम
जो कूद पड़ते
डूब जाते/गोली खाते/निवाला बनते
किसी खूंखार शार्क का
जो समन्दर में फेंके बीमार/घायलों को
खाने दौड़ी आती
**
याद आया होगा
ओबामा को
अपना
अश्वेत केन्याई मूल/अतीत
उपन्यास'अंकल टाम्स केबिन'
टाम काका की कुटिया
मार्टिन लूथर किंग
गोलियों से मरे जो
अश्वेत अधिकारों के लिये
**
दिल/आंख भर आई होंगी
बहुत काम बाकी है
करने को
अमेरिका में
अब भी
मानवाधिकारों का हनन
कम नहीं होता
**
मेरे यहां भी
गांव/शहर/देश/आस पास/समाज
मन/व्यवहार में
मौजूद हैं
गुलामघर
**
जाति/वर्ण
लिंग/ऊंच/नीच
नफरत/साम्प्रदायिक
व्यवस्था के गुलामघर
बंधुआ मानसिकता
व्यवस्था
अतीत के खंडहर
ये गुलामघर

बेसबाल

बेसबाल
--------

बेसबाल के बिके हजारों बल्ले
उत्साहित नये एजेंट ने कंपनी खबर भेजी
'खेल प्रेमी है शहर'
ताबड़तोड़ सारे खेलों का सामान भेजो
सामान आया पर बिका नहीं
धरे रह गये वालीबाल फुटबाल
क्रिकेट के डंडे
पता चला बेसबाल ही नहीं होता शहर में
बल्ले का इस्तेमाल करते हैं गुंडे

इतिहास तो इतिहास है

 इतिहास तो इतिहास है
—————————

उन्होंने मगध वैशाली पाटलिपुत्र का इतिहास खंगाला 
स्वर्णाक्षरों से लिखी नायकों की गाथाएँ देखी  
अशोक से अकबर तक के पुरातात्विक शिलालेख पढ़े 

सोचा वे भी ‘इतिहास’ बनाएँगे 
उनके बुत चौराहों बस्तियों में लगेंगे

उनका आदेश हुआ
आदेश का पालन हुआ
ग्रेनाइट संगमरमर के बुत बने 
नकली स्वर्णाक्षर से शिलालेखों पर प्रशस्ति उकेरी गई
अपने कर कमलों से बुतों का खुद ही उद्घाटन किया


निजाम बदला
बुत ढक दिये गये 
कुछ गिराये / हटाये / पोते गये
अपने भार से कुछ औंधे मुँह गिरे
शिलालेख तोड़े गये
उनके जीते जी यह भी दर्ज हुआ इतिहास में
आख़िर वे आ ही गये इतिहास में

महापौर का गुणा भाग : गाय

महापौर का गुणा भाग : गाय
---------------------

चुप है महापौर
रोक नहीं प्लास्टिक थैलियों पर 
मामला चंदे का है
मौन हैं महापौर
शहर में छुट्टे घूमते ढोर
मामला वोट का है
मुखर है महापौर
सडकों से पलास्टिक खाकर 
बीमार हुई गायों पर 
आपरेशन करवाता महापौर
करदाताओं के पैसे 
मामला धर्म का है

//जसबीर चावला //