Sunday, December 22, 2013

व्यंग्य/३/जनरल मुर्ग़ा और वर्दी

                                           जनरल मुर्ग़ा और वर्दी
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यह सच्ची कहानी है एक ऐसे मुल्क के 'चीफ आफ आर्मी स्टाफ़' जनरल की जिसनें उठापटक कर अपने को मुल्क के आईन (संविधान) और नेशनल असेंबली से प्रेसीडेंट भी बनवा लिया.वह दोनों पदों पर क़ाबिज़ हो गया.इस क़िस्से का हिंदुस्तान नाम के मुल्क के नज़दीक़ी मुल्क पाकिस्तान या जनरल परवेज़ मुशरफ से कोई ताल्लुक़ नहीं है सो ताकीद हो.

जनरल साहब को अपनी फ़ौजी वर्दी से बेपनाह मुहब्बत थी.वे कहा करते की वर्दी मेरा ईमान है,वर्दी ही मेरी जान है. वर्दी उनकी चमड़ी है. भला जिस्म से चमड़ी को क्या अलग किया जा सकता है ? वे उसे कभी नहीं उतारेंगे,चाहे जान चली जाये.अक्सर तो वे उसे पहन कर ही सो जाते,पता नहीं कब मुल्क में बग़ावत हो जाये.

वहाँ की अवाम दिलोंजान से चाहती थी कि मुल्क में जम्हुरियत (प्रजातंत्र) क़ायम हो जाये पर जनरल साहब वर्दी उतारनें को तैयार ही नहीं थे.बस शीशे में अपना अक्स देखा करते और मुस्कुराते रहते.

उन प्रेसीडेंट - जनरल जिन्हें उनकी बीबी मज़ाक़ में 'टू इन वन' कहा करती थी-के पास एक क़द्दावर मुर्ग़ा था.बेहद ख़ूबसूरत ऊंची कलगी,बुलंद आवाज़. जनरल साहब को भी उससे भी बेपनाह मुहब्बत थी.जनरल साहब ने उसका नाम अपने नाम की तर्ज़ पर जरनैल रख दिया था.जरनैल जब सीना फुलाकर कुकड़ू कूं की ज़ोरदार बांग देता तो जनरल साहब का सीना भी फूल जाता.उस वक़्त घर पर भले ही वे 'ग्रुप आफ मिनिस्टर' से ज़रूरी गुफ़्तगू कर रहे होते,ख़ुश होकर कहते देखो जरनैल की बांग में नियाग्रा प्रपात की आवाज़ सुनाई देती है.

मुर्ग़ा जरनैल भी कम न था.पक्का आतंकवादी.वी आई पी एरिया में दनदनाता फिरता.दूर दूर के पड़ोसियों के बगीचों में घुस जाता.बगीचा ख़राब कर देता.रोके कौन जनरल साहेब का चहेता मुर्ग़ा जो ठहरा.मुर्गियों पर रौब झाड़ता.दूसरे मुर्ग़ों को दूर तक खदेड़ देता.उसकी ख़ास अदावत थी सड़क पार की एक और नामचीन हस्ती चौधरी शहरयार के मुर्ग़े से जिसे वह गाहे बगाहे चोंच मारकर ज़ख़्मी कर देता.मजाल है जरनैल उसके पास किसी मुर्ग़ी को कभी फटकने देता या दाना दुनका चुगने देता.

उधर चौधरी शहरयार भी जनरल-प्रेसीडेंट से नफरत करते थे.वे भी आवाम की तरह चाहते थे कि मुल्क में जम्हुरियत हो.इसको लेकर उनकी जनरल साहब से अक्सर तकरार हो जाती.वे चाहते थे कि जनरल साहब अपनी फ़ौजी वर्दी उतारें,लेकिन जनरल साहब नें भी अवाम के ग़ुस्से और मुजाहारात के बावजूद वर्दी न छोड़ने की क़सम खाई थी.

तो जनाब क़िस्सा यह है कि एक दिन जनरल साहब का मुर्ग़ा जरनैल घर से बाहर तफ़रीह करने निकला दरवाजे पर गार्ड ने उसे सलामी दी.जरनैल ने पहले तो पड़ोसियों की मुर्ग़ियों के साथ मटरगश्ती की.चोंचे लड़ाई,फ़िर दनदनाता चौधरी शहरयार के मुर्ग़े को ललकारनें सड़क पार कर गया.

इसके बाद उस क़द्दावर मुर्ग़े जरनैल को किसी ने नहीं देखा.

शाम हो गई थी,जरनैल घर नहीं लौटा.उसकी खोज घर में,गेराज,बग़ीचे सब जगह हुई पर उसे नहीं मिलना था-वह नहीं मिला.

जनरल-प्रेसीडेंट बेचेन हो उठे.घर में मिलेट्री के आला आफिसरान की ज़रूरी मिटींग हो रही थी पर जनरल साहब का दिल नहीं लग रहा था.उन्होंने अपनें मुंहलगे नौकर रुल्दू को आवाज़ दी और कहा कि जरनैल को कहीं से भी ढूँढ कर लाओ चाहे सारी फ़ौज भी भेजना पड़े.सिक्योरिटी गार्ड चारों तरफ़ दौड़ गये.

नौकर रुल्दू सीधा चौधरी शहरयार के मुर्ग़ मुसल्लम स्पेश्लिस्ट ख़ानसामा अच्छन मियाँ के पास पहुँचा और पूछा की क्या उसने जरनैल को देखा है ? अच्छन मियाँ एक आँख को थोड़ा दबाते हुए बोले-"नहीं लेकिन जरनैल की वर्दी-पंखों भरी खाल और कलगी-कंपाउड वाल के बाहर कूड़ेदान में पड़ी है"

रुल्दू ने वह वर्दी कूड़ेदान से उठाई और सीधा दौड़ कर जनरल-प्रेसीडेंट की मिटींग में पहुँच गया ओर रोते हुए कहा कि जरनैल तो नहीं मिला उसकी वर्दी मिली है.सभी फ़ौजी आफिसरान हक्के बक्के रह गये.सबके हाथ फ़ातिहा के लिये उठ गये.

उस रात प्रेसीडेंट - जनरल सो न सके.बेचेन करवटें बदलते रहे.सबेरे चाय के वक़्त उनकी ख़ूबसूरत चहेती बीबी ने रुल्दू को आवाज़ दी की वह जनरल साहब का वर्दी ले आये.जनरल साहब जो अब तक वर्दी को बीबी से भी ज़्यादा मुहब्बत करते थे-बेगम से बोले कि वह उसे अब जनरल कहकर न बुलाए.बोले-"अब सोचता हूँ की वर्दी उतार ही दूँ"

(नई दुनिया में सन २००८ में प्रकाशित)

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