Tuesday, December 3, 2013

अखबारी ढाबा

अखबारी ढाबा
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हमें तो खाना ही है अखबार 
चाहे जो परोसो
धर्म सांप्रदायिकता परोसो 
पाखँड कानाफूसी परोसो 
अपना रियल एस्टेट का धंधा परोसो
देश को तंबोला खिलाओ
अख़बर को खबर बनाओ
खबर को अख़बर
कारपोरेट / सरकार की गोद में बैठो
अपनी गोदी में बैठाओ
फेक न्यूज चलाओ
तिल का ताड़ ताड़ को तिल बनाओ
सामाजिक सरोकारों से विरक्त रहो
दरी के नीचे छुपाओ

भाग कर जायेँ तो किस अखबारी ढाबे जायेँ 
वही सारहीन खाना
वही बँधुआ रसोईये सँपादक
जीहजूरिये बैरा सँवाददाता

सब भकोस रहे फ़ास्ट फुड 
रंगीन अंग्रेजी हिंगलिश खाना 

अब यही नियति है हमारी और अखबार की 


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