Wednesday, December 4, 2013

संतोषी

संतोषी
--------
वे दौड़े तेज
खूब तेज
दूसरों को ढकेलते
पीछे छोड़ते
गिरे औंधे मुंह धड़ाम
उच्चतम न्यायालय में काम तमाम
वे भी दौड़े दौड़ रहे
फर्राटे से
फूली साँस हांफ रहे

वे चल रहे हैं कभी धीरे कभी मध्यम
लौटते भी हैं उल्टे पाँव कभी कभार
देख छांव
मुदित मन अब भी चल रहे हैं

No comments:

Post a Comment