टी वी पर शिकार
————••—
टीवी के मुँह ख़ून लगा है
खबर नहीं शिकार करते हैं
हिंस्र द्दृष्टि से चिँघाड़ते
टूट पड़ते हैं वक्ता पर
तर्क कुतर्क से धुर्रे उड़ा देते
उस की मौत चाहते
रोज स्टूडियो में मजमा सजाकर
कभी महीनों तक तड़फा तड़फा कर
किश्तों में चेनल करते एक का शिकार
अल्पसँख्यक,दलित आसान शिकार
शिकार की हर दलील ख़ारिज
दीवार पर पहले ही लिखा है नाम
हाँका डालते उघेड़ते निर्वस्त्र करते
रात दिन ढूँढते दूसरा शिकार
☘ ज स बी र चा व ला
No comments:
Post a Comment