Saturday, December 7, 2013

व्यंग्य/२/गांधी के तीन बंदर और गठबंधन की सरकार

                          गांधी के बंदर और गठबंधन की सरकार
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"उस राज्य"में चुनाव बाद विषम स्थिति हो गई थी.किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था.बेमेल दल,पचमेल दल और घालमेल दल तीनों में से कोई दो दल मिल कर ही सरकार बना सकते थे. पर सभी दल शंकित थे,डरे हुए थे. अगर कुछ समय सत्ता में रहकर दूसर दल ने तय समय के बाद सरकार की लगाम उसे न सोंपी तो ?

अतीत में ऐसा देश में कई बार हो चुका था.मायावती- मुलायम ने सरकार बनाई. मायावती ने बाद में मुलायम सिंह को जो अगूठा दिखाया वह स्थाई रूप से ठोस पत्थर का हो गया है.दोनों दल अब कट्टर दुश्मन हैं,फूटी आँखों एक दूसरे को नहीं सुहाते.भाजपा- मायावती का जोड़ भी कमज़ोर निकला,आइने के मानिंद टूटा.दोनों में अब चोबीसों घंटे तलवारें खिंची रहती हैं.

हरियाणा ने देश की राजनीति को नई दिशा,मुहावरे दिये -आयाराम-गयाराम.भजनलाल की जनता पार्टी का रातों रात कायाकल्प हो गया.पूरी पार्टी कांग्रेस में शामिल हो गई.बिहार,गोआ,झारखंड में अतीत मे न जाने कितनी सरकारें कब कब किस के साथ बनी.जोड़-तोड़ से मुड़ी-तुड़ी सरकारें बनीं- गिरी,उठी- लँगड़ाई और अंततःराष्ट्रपति शासन की सदग्ति को प्राप्त हो इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों (?) से अंकित हो गईं.

कर्नाटक में देवेगोड़ा कुमारस्वामी सरकार का क़िस्सा और भी मज़ेदार था.देवेगोड़ा ने अपने हिस्से की सत्ता भोग ली.भाजपा की बारी आई तो ठेंगा दिखला दिया.कहा कि उनके परिवार पर भाजपा के एक विधायक ने अदालत में
भ्रष्टाचार का मुक़दमा क्यों किया,नहीं सौंपते तुम्हें कुर्सी.उन्होंने तर्क दिया कि उन दो दलों के मध्य सत्ता का बँटवारा "आपसी एडजेस्टमेंट" था,न कि"आपसी समझौता".अंततःसरकार इच्छा मृत्यु को प्राप्त हुई.

ऐसे विकट हालात में "उस राज्य"के बेमेल ओर घालमेल दल नें तय किया कि वे दोनों दल मिलकर जनता की गाँठ में सेंध लगाने के लिये फेविकाल के पक्के जोड़ वाली मज़बूत गठबंधन की सरकार बनायेंगे.अतीत से सबक़ लेते हुए एक ऐसा"समझौता"हो कि सरकार स्थाई रूप से चलती नज़र आये.एक के लिये सब- सब के लिये एक.

तय हुआ की एक सलाहकार परिषद् का गठन हो -जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलाल, प्रापर्टी डीलर, बिल्डर,शेयर बाज़ार के खिलाड़ी,उद्योगपति,अखबारपति,टीवीपति,फ़िल्मी बंदे,क़ानूनी जोड़ तोड़
विशेषज्ञ हों. (ताकि वक़्त ज़रूरत पर काम आ सकें) यह परिषद् एक "समझौता-पत्र" का प्रारूप बना कर दे ताकि स्थाई सरकार बन सके.

परिषद् ने"सबके हितों" का ध्यान रख कर जो समझौता पत्र बनाया उसकी एक प्रति लेखक के हाथ लगी,
जिसका मोटा मोटा सार पाठकों के लिये परोसा जा रहा है.

बेमेल-घालमेल गठबंधन की सरकार ने राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह शेर की तर्ज़ पर गांधीजी के तीन बंदरों के खिलोनें को कुछ फेर फार के बाद अपना राज्य प्रतीक चुना.उनके प्रतीक में तीनों बंदर न तो हाथों से आँखें ढकते हैं,न कान न मुंह ढकते हैं.अब वे गांधी के बंदरों के विपरीत बुरा देखेंगे,बुरा सुनेंगे ओर बुरा बोलेंगे.हाथ मुक्त होने से मुंह से काट सकेंगे.हाथों से लूट सकेंगे ओर कान मुक्त होने से एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल सकेंगे.

दूसरा प्रतीक तय हुआ"गिरगिट".किस विधायक की अंतरात्मा कब गिरगिट सा रंग बदल कर दूसरे दल के परमात्मा में विलीन होने को मचल जाये,कब उसे अन्य दल से सकारात्मक सिगनल प्राप्त होने लगें,कौन जानता है.इसके लिये गौरवशाली प्रतीक "शुभंकर गिरगिट"तय किया गया.

परिषद् ने अपने प्रारूप में आगे लिखा कि राज्य की जनता के हित में हम दो पक्ष-अधिक विधायक वाले सत्ताकामी प्रथम पक्ष ओर कम विधायक वाले सत्ताकामी द्वितीय पक्ष (जिन्हें लोग अपनी अपनी अकल से राजनैतिक दल कह देते हैं) आपस में यह अनुबंध करते हैं कि प्रथम पक्ष -बेमेल दल कुल ५ वर्षों में ३ वर्ष और द्वितीय पक्ष- घालमेल दल २ वर्षों तक सत्ता का सुख भोगेगा.

प्रथम पक्ष चार बार अाठ-आठ माह की अवधि में शासन करेगा. द्वितीय पक्ष चार बार छे-छे माह की अवधि में बारी बारी से शासन करेंगे.एक बार यह एक बार वह,ताकि दोनों को समान मोका मिले. बाकी चार माह की अवधि में दोनों दल बारी बारी से दो-दो माह सत्ता संभालेंगे ताकि कोई भी दल दूसरे को "कर्नाटक शैली" में अँगूठा न दिखा सके ओर सत्ता का ईमानदारी से बँटवारा हो सके.

यह भी समझौते में लिखा गया कि दोनों पक्ष आठ-आठ,छे-छे और दो-दो माह के लिये अलग अलग मुख्यमंत्रियों का चुनाव करेंगे.इसके कई फ़ायदे होंगे.कुल जमा १० मुख्यमंत्री ५ वर्षों में राज (?) करेंगे.(गोआ-झारखंड में भी उल्टा पुल्टा होकर ५ सालों में कितने मुख्यमंत्री राज करते रहें हैं- याद है) इससे दलों में आंतरिक संतोष ही संतोष होगा.

दूसरा फ़ायदा होगा कि ५ वर्ष बाद १० भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला,आजीवन पेंशन,वीआईपी दर्जा और अभूतपूर्व होनें के अन्य अनेकों लाभ मिलेंगे. छटे या आठवें माह शपथ के वक़्त सारा मंत्रिमंडल बदला जायेगा.हर विधायक को मंत्री पद बारी बारी से मिलेगा.सभी संतुष्ट - सभी के पेट भरे हुए-अघाये हुए.फिर भी अगर कुछ विधायक मंत्री पद से वंचित रह जायें उन्हें कैबिनेट मंत्री की सुविधा देकर निगमों-उपक्रमों में खपाया जाये.गोदाम में कभी भी लालबत्ती और कारों का टोटा न पड़े एवं पर्याप्त बंगलें हों इसका ध्यान रखने की समझौता पत्र में ख़ास ताकीद की गई.लालबत्ती,कार निर्माता कंपनियों और पीडब्ल्ूडी को भी इसकी सूचना दी गई.

सत्ता के बँटवारे के प्रारूप से पता चला की मलाईदार विभाग जैसे जनकार्य,वन,वित्त,गृह,उद्योग,आई.टी.
सहकारिता,परिवहन में किस किस पक्ष को कौन सा विभाग मिलेगा और मलाई किस अनुपात से बँटेंगीं सबका उल्लेख किया गया ताकि बिना वजह की छीना झपटी और बंदरबाँट का आरोप न लगे. सब साफ़ सुथरा हो ताकि छवि उज्जवल रहे.

ट्रांस्फर,थानों की नीलामी,शराब की दुकानों,खदानों,-सबके विस्तृत नियमों का अनुबंध पत्र में उल्लेख था ताकि समाजवादी छवि बने और मिल बाँटकर सब खाएँ .तय यह भी हुआ कि पहले दोनों पक्षों द्वारा किसानों से ज़मीनें ख़रीद ली जायें फिर मास्टर प्लान बनाएँ ताकि सबके परिवार भी सुखी हों.

अनेकों उपबंधों के इस अनुबंध पत्र में एक शपथ पत्र का नमूना भी मिला.इसके पूर्व लिखा गया था कि केंद्र में यूपीए की सरकार में अमेरिका के साथ आणविक समझौते को लेकर लेफ़्ट फ़्रंट रोज टाँग खींचता था.हमें शपथ लेकर इससे बचना होगा.अंदर सदन में भले ही कभी कभी नूराकुश्ती कर लें,बाहर तो दोनों हाथों को हाथों में लेकर कंधे से उपर उठा हँसते हुए टीवी-अख़बारों के लिये पोज़ और बाइट देना है.

सुनता हूँ कई और राजनैतिक दल इस अनुबंध में अपनी अपनी संभावनाओं को तलाश रहे हैं.








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