Tuesday, December 3, 2013

हम बँट चुके हैं

हम बँट चुके
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हम बँट चुके
एकता दिखावा,मुल्लम्मा है,छद्म है
कलई हर बार उतर जाती हल्के झोंके से
*
वैचारिक ही नहीं,मानसिक रूप से बँटे
हमारी एकजुटता लहसुन की गाँठ है
क्षणिक दबाव
खंड खंड बिखरती फाँके
*
इतिहास संस्कृति का बलात् बँटवारा
ये और वे की भाषा
नगरों का भौगोलिक सीमांकन
मोहल्ले,जातियों के सूबे
कालोनियों की सीमा पर पुलिस चौकियाँ
गलियां दुकाने भौगोलिक इकाईयां
इस / उस समाज का टोला
*
अपने मज़हब का नहीं
नहीं रहेगा मोहल्ले में
मकान से बेदख़ल करो
डरता हूँ
रहना चाहता हूँ यार की गली में
रह नहीं सकता
*
संस्कृति / भाषा भूषा बंटी
दिमाग़ बँटे
रिश्ते बँटे / भाईचारा बँटा
काम बँटे
संवेदनाएँ अलग,पीड़ा अलग
*
अनेकता में एकता कह देते
हम भोले हैं
मंचों से ताली बजती एक सतत कर्मकांड है
क्या सचमुच एक हैं हम
कोई कहे कि ग़लत हूँ मैं
      

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