Wednesday, December 30, 2015

पोतनें में दक्ष

पोतनें में दक्ष
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वे दक्ष हैं स्याही पोतनें में 
चेहरे हों
दीवार पर लगा पोस्टर
या इतिहास

🌿 जसबीर चावला 

Saturday, December 12, 2015

बेदाग

बेदाग
——

सबूत का तय है भाव
सदा बरी हुए
सबूतों का अभाव

कभी रंगे हाथ नहीं पाये गये
रंग बदल दें
हाथ बदल दें
जज बदल दें
दस्तानें चढ़ाने में माहिर
दस्तानों में उँगलियों के निशान नहीं होते

दाग़दार हैं
फिर भी बेदाग हैं

☘ जसबीर चावला

अंधा कानून

अंधा कानून
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हेर फेर भी
देर भी
अंधेर भी
कानूनी कूडे का ढेर भी
अंधे के हाथ
बटेर भी

🌿 जसबीर चावला


Thursday, December 10, 2015

कैंचियों के व्यापारी

कैंचियों के व्यापारी
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पानी पर लकीर खींच दी
ऊंचे  पाये  के  मदारी  हैं

हुमा के  पर  क़तर दिये
कैंचियों  के  व्यापारी है

पोटली में  बँधा सत्तू लूटा
इनके पुरखे भी पिंडारी हैं


कहाँ गई अमन की फ़ाख्ता 
इन्होंने ही  की  बटमारी   है 

भौंकने की आजादी

भौंकने की आजादी
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एक भौंका फिर दूसरा
पास की गली से तीसरा
चौथा नुक्कड़ से
कोई टीवी अखबार पर
मोहल्ले से लेकर गाँव शहर
एक सुर में भौंकने लगे
अभिव्यक्ति की आजादी है
आजादी के नाम पर
आजादी रोकने लगे




Monday, December 7, 2015

पँछी और मतदाता

मेरे देश का मतदाता 
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सड़क किनारे
पिंजरे का पँछी बाहर आता है 
चोंच से कार्ड उठाता 
बदले में अन्न का दाना पाता है
जजमान का बँचता है भाग्य 
पँछी का तय है भाग्य 
भूल चुका अपनी उड़ान
वापस पिंजरें मे क़ैद हो जाता है
कौन है यह ?
मेरे देश का मतदाता है
5 किलो राशन मुफ़्त पाता है.





Wednesday, December 2, 2015

अब वे दबे पाँव नहीं आते

अब वे दबे पाँव नहीं आते
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अगर वे चीते से दबे पाँव आते
तुम अवाक् रह जाते
मुँह खुला रह जाता
चीख भी न पाते
अचंभे में पड जाते

वे अब ऐसे नहीं आते
बाजे गाजे के साथ आते हैं
सामनें नजर आते हैं

तुमसे छीन लिये हैं सारे अनुभव
पलक झपकते उठा ले जाते हैं

Saturday, November 28, 2015

अक्षर ज्ञान

अक्षर ज्ञान
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कुछ सोचो
कुछ पढो

न सोचने
न पढने से
आदमी शिक्षामंत्री बन जाता है 

जितेन्द्रिय

जितेन्द्रिय

इनकी आँखे देखती नहीं
ज़बान खुलती नहीं
चीख़ हो या रोना
कान सुनते नहीं
सांप्रदायिक गंध
नाक सूँघती नहीं
मोटी त्वचा पर स्पर्श नहीं होता 
लक्षण मरीज़ के हैं
गंभीर बीमार है
यह सरकार है 



लकड़बग्घे

लकड़बग्घे
————
लकड़बग्घे तय करते हैं
किसकी उछालना टोपी
किसकी चबाना 
किसको पहनाना 
किसकी बदलना 
हँसते लकड़बग्घे
एकजुट होकर चल पड़ते
नये सिर तलाशते लकड़बग्घे 

🌿 जसबीर चावला

अतीत का खंडहर है धर्म

अतीत का खंडहर है धर्म
————————


धर्म क्या है
हथियार है धर्म
एक ढाल ओढ़ी हुई खाल है
उन्माद धमकी दबाव फ़साद है
धारदार कैंची छद्म मुखोटा है
झूठा दिलासा लालीपॉप है धर्म

न खत्म होनें वाली चुईंग गम है
मृग तृष्णा खुलती क़लई
अतीत के खंडहर हैं
जिल्दों में बँधे मुद्रित पन्ने
कुछ सजे सँवरे पत्थर
स्वर्ण जड़ित दीवारें
गड्ड मड्ड आवाज़ें है धर्म
अपनी अपनी ढपली है धर्म
हँकने को तैयार रेवड़
भीड का भगदड़ है


धर्म का क्या कोई धर्म है ?

Saturday, November 14, 2015

मांग और पूर्ति

मांग और पूर्ति 
----------

सुलभ हैं
चुनाव में 
दल को 
*
जैसे
सुलभ शोचालय 
सब को 

Monday, November 9, 2015

क्या है जंगलराज

जंगलराज
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जंगल की अपनी है आचारसंहिता
अपनी मर्यादा
सबकी आहार श्रृंखला 

शेर चीते शिकार करेंगे 
हिरणों को घास पत्ते मिलेंगे
पक्षियों को फल बीज
रीछ को शहद तितली को फूल
बाघ शिकारी होगा
हाथी शाकाहारी होगा
अलिखित कानून से तय है सबकी भूख
भूख से ज्यादा कोई नहीं खायेगा
सबको न्यायिक हिस्सा मिलेगा
बेवजह हिंसा नहीं होगी
यह जंगल का क़ानून है 
जंगल को बदनाम न करें
शहर में जंगलराज लाने का उपक्रम करें






Thursday, November 5, 2015

बिच्छू

बिच्छू 
------

बिच्छूओं की बारात 
कौन सरदार

जिसकी पीठ पर रखो हाथ
वही सरदार

Monday, November 2, 2015

अब शर्म नहीं आती तो नहीं आती

अब शर्म नहीं आती तो नहीं आती
-------------------------

लुप्त है यह चिड़ीया 
ढूँढने से नहीं मिलती 
इन्द्रप्रस्थ लुटियन का टीला
मोटी खाल ओढ़ चुका
लहूलुहान प्रजातंत्र 
अस्मत लुटे जनाजा उठे 
अब शर्म नहीं आती तो नहीं आती 

चुप

चुप

चुप था
पर गुपचुप था
बार बार कहा 
चुप्पी तोड़ो

अब मैं चुप नहीं हूं
अब भुगतो

बदबू

बदबू
****
बस फैलानी है 
बदबू
संडास से
या
बकवास से
सब के रुबरू 

// जसबीर चावला //

Saturday, October 31, 2015

ये लड़कियाँ क़स्बे की

ये लड़कियाँ क़स्बे की
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ऊन के फँदे डालती
गाँठ लगाती
सपनों को बुनती उधेड़ती 
मंद मुस्कुराती
किताबों में फूल भूल जाती
ये लड़कियाँ क़स्बे की
*
रस्सी का फँदा बनाती 
गाँठ लगाती 
घर की इज़्ज़त बचाती 
खुशी खुशी 
झट फाँसी पर झूल जाती 
ये लड़कियाँ क़स्बे की

🌿   जसबीर चावला 


Thursday, October 29, 2015

युद्ध की मानसिकता

 युद्ध की मानसिकता
—————------

देश में युद्ध चल रहा 'इन दिनों'

दनादन दगते कटाक्ष के गोले 
शब्दों के ज़हर बुझे तीर 
तुरही नाद नगाड़े जय घोष
देश कुरुक्षेत्र बना
देश में हाँका पड़ा 
सतत महाभारत घट रहा 
युद्धोन्माद है 'इन दिनों'

हुँकार रैली महारेली 
परिवर्तन शँखनाद रेली
धिक्कार रेली थू थू रेली
स्वाभिमान रेली
गलाफाड़ बकवास रेली
सब तरफ़ चित्कार हाहाकार
रेलियों की रेलमपेली 'इन दिनों'

जो भी योद्धा है इस युद्ध का
भौंक रहा अपनें हिस्से का
आइने में देखता हूँ अपना चेहरा
घबरा जाता हूँ
आँखें लाल हुईं हैं
हिंस्र हुआ जाता है
मेरी भृकुटि भी तनी रहती है 'इन दिनों'

Saturday, October 24, 2015

गोल घेरे में घूमती औरत

गोल घेरे में घूमती औरत
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वर्जनाओं का दायरा बढ़ा
खिंच रही लक्ष्मण रेखाएँ 

मासूम लगते शिकंजे
लुभाते नये हथकंडे
गोल घेरे में घूमती औरत
बाड़े में बंद औरत
अपने हिस्से का ढूंढ रही आसमान
अपनें हिस्से का मकान 

लक्ष्मण घेरे से बाहर था
अब भी बाहर है 


Wednesday, October 21, 2015

गर्म तवा

गर्म तवा
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सेंको रोटियाँ 
गर्म    तवा है
बाकी तो बस
हवा ही हवा है

राजा तब और अब

राजा तब अब 
--------------

उन्होंने 
कुएँ खुदवाये 
*
इन्होंने 
खाइयाँ 

🌑 जसबीर चावला 

सुकरात और सुअर

सुकरात और सुअर
--------------
मन के असहमत सुकरात को 
मार दिया 
अब पूर्ण संतुष्ट हूँ
बाड़े में बंद सुअर हूँ 

// जसबीर चावला //

विष्णुजी स्विस में

विष्णुजी ग़ायब
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विष्णुजी लापता
परेशान लक्ष्मी
पड़ोस में नहीं
'बैकुंठ' में कहीं नहीं

'उल्लू' दौड़ाया
खबर लाया
विष्णुजी मिल गये
दो नंबरी लछमी संग
'स्विसबैंक' में रमण कर रहे

☘️ जसबीर चावला 

Tuesday, October 20, 2015

देवताओं से मिली इन्हें मारनें की सनद

देवताओं से मिली इन्हें मारनें की सनद
—————————————

वे जब मार देंगे
तर्क और वजह ढूँढ लेंगें
विचारक वकील दलील जुटा लेंगे
बोलना लिखना पढ़ना भी एक जायज़ वजह है मारने की
मरने वाला उनके हित मे लिखता नहीं था
उनकी पुस्तकें पढ़ता नहीं था
विधर्मी था नास्तिक था
और बड़ा गुनाहगार था
मारने के लिये मार देंगे
देवताओं से मिली है उन्हे मारने की सनद



Saturday, October 17, 2015

पार्टी प्रवक्ता:सुकरात से सुअर

पार्टी प्रवक्ता : सुकरात से सुअर


सोमवार से वीरवार तक
चेहरे पर तना मुक्का टंगा था
शुक्रवार सत्ता से मिला
छक कर अघा गया
शनिवार आईना देखा
बदलाव नजर आया 
रविवार पूर्ण रुपांतरण हो गया 
असंतुष्ट सुकरात से संतुष्ट सुअर हो गया 
अब बाड़े में रहता है
पार्टी का प्रवक्ता है 



आरती नहीं महा आरती

आरती नहीं महा आरती 
-----------------
अब पंचायत नहीं महापंचायत होती है
प्रसाद महाप्रसाद
प्रभु महाप्रभु
कहाँ होती है रैली
महारैली होती है
आरती नहीं महाआरती
यज्ञ महायज्ञ
आंदोलन बने महाआंदोलन
शिवरात्रि हुई महाशिवरात्रि
राणा गये महाराणा आ गये
नायक महानायक हुए
पुरुष महापुरुष हुए
अब घोटाला नहीं महाघोटाला होता है
शांति मौत सी महाशांति हुई
यात्रा जैसे कंधे पर सवार महायात्रा हुई
पंडित महापंडित बने
संत अब चरित्रहीन नहीं महाचरित्रहीन हैं
सत्ता में अब कमीन कम महाकमीन हैं

😜  जसबीर चावला 







मेरे गाँव का मुखिया

मेरे गाँव का मुखिया 
------------------

जहाँ चुप रहना है
बोलता हैं
जहाँ बोलना है 
भौंकता हैं
जहाँ भौंकना है
मुड़कर दौड़ता हैं
जहाँ दौड़ना हे 
रुकता हैं
जहाँ रुकना है
झुकता हैं
जहाँ  झपटना हैं
दुम टटोलता हैं

गाँव का मुखिया
डुबो देगा लुटिया

इस देश को क्या हुआ

इस देश को क्या हुआ

सतत डराते जिन्न 
बुरी आत्माएँ
सन्नाटा तोड़ती उल्लूओं की आवाज़
चमगादड़ों का शोर 
कभी डायनों का प्रलाप
आग उगलता अगिया बेताल
शांति भंग हुई
राम का देश 
रामसे बंधु की हॉरर मूवी बना
दिन रात टीवी पर करकट दमनक की हुआ हुआ
तुम पूछते हो देश को क्या हुआ ?

☘ जसबीर चावला



Friday, October 16, 2015

प्रेम दीवानी मीरा और सहेली

प्रेम दीवानी मीरा और सहेली 
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प्रेम दीवानी मीरा 
मेरो दरद न जाने कोय
सहेली ने कान में चुपके से कहा
गायनोक्लोजिस्ट को दिखाया
तेरो  दरद न जाने कोय
उठ बावली घर बैठी क्यों रोय

कबीर और ड्रायक्लिंनिंग

कबीर और ड्रायक्लिंनिंग 
—————————

‘दास कबीर जतन से ओड़ी,ज्यों कि त्यों धर दीनी चदरिया‘ 
कबीर घर में घुसे गुनगुनाते हुए

अंदर से कर्कश आवाज आई 
भुनभुनाते हुए 

ड्रायक्लीन कब करवाओगे
कहा पिनपिनाते हुए

संदूक में क्यों रखी मैली चदरिया‘
कब सुधरोगे कबीर,बोला झल्लाते हुए

😊 जसबीर चावला 

गेंडों में हीनता बोध

गेंडों में हीनता बोध
------------------
मंत्री का मुँह खुला
गेंडे लजाये 
गेंडो को अपनी मोटी खाल का गुमान था
डूब मरे

मंत्री तो श्मशान का अगिया बेताल था 
उनका भी बाप था


Monday, September 28, 2015

धरती के अंतिम सम्राट

धरती के अंतिम सम्राट
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जब अंतिम फल भी तोड़ लिया जायेगा पेड़ से
अंतिम पेड़ काट लिया जायेगा
आखरी नदी विषाक्त होगी
पाताल तक छेदा जायेगा
पानी की अंतिम बूँद निचोड़ी जायेगी 

उदरस्थ होगा अंतिम पक्षी 
सागर की अंतिम मछली 
आख़री जानवर हलाक हो चुका होगा
जहर घुला होगा हवाओं में 
रानी मधुमक्खी भी मर चुकी होगी शहद के छत्ते में 
रॉकी पर्वत से उड़ चुकी होगी आख़री मोनार्क

मेरे आका सारी धरती तुम्हारी होगी
बस तुम ही अकेले होगे अंतिम सम्राट 


// जसबीर चावला //

अंडमान में सभ्यता की तलाश

अंडमान में सभ्यता की तलाश
———-————————

अँडमान का वर्जित 'सेंटीनल द्वीप' 
वहाँ रहना चाहता हूँ
सबसे अलग थलग
भाषा,स्कूल नहीं
कुछ इशारे हैं,कुछ ध्वनियाँ हैं
बिना भाषा के अनपढ़ रहना चाहता हूँ

कोई धर्म नहीं,धर्मस्थल नही
अधर्मी रहना चाहता हूँ 
मकान नहीं
पेडों पर रहना चाहता हूँ
बिना दीवारों की झोपड़ी में रहना चाहता हूँ
खेती नहीं अनाज कपडे नहीं
दिगम्बर रहना चाहता हूँ
कँदमूल,शहद,शिकार है
लकड़ी के भाले से मछली मारना चाहता हूँ

'गार्डन आफ ईडन' चाहता हूँ
अपनी लाखों साल पुरानी जड़ों की तलाश में हूँ
आदिम 'सेंटीनली' के बीच रहना चाहता हूँ
बाहरी को मार डालते हैं
शायद मुझे अपनायें
भय मुक्त होना चाहता हूँ
थोड़ा सभ्य बनना चाहता हूँ

     ☘️ जसबीर चावला

मनरेगा

सारेगम / मनरेगा

                       

'मनरेगा' का पैसा आया
मुदित हुआ मन
सरपंच / नेता पुत्र का

संगीत शिक्षक पुत्र द्वय से बोला
गाओ सा रे ग म
दोनो ने गाया
सारेगम 'मनरेगा'
मन रे 'गा'
गा मेरे मन गा
मन तू नाच गा
गा गा बस गा
मन रे'गा'
सफल हुई तेरी अाराधना
मन रे'गा' मन रे'गा'

// जसबीर चावला //

चुप रहैं दंगे जारी हैं

चुप रहैं दंगे जारी हैं 
---------------

चुप रहैं दंगे चल रहे हैं
ख़लल पडता है बोलने से 
तुम्हारे सोचने से
दंगों की शांति भंग न करें
शांतिपूर्वक चलनें दें दंगे
सड़कों पर भी / मन में भी चलनें दें
मनुहार है / डाँट है / धमकी है चुप रहैं 
यज्ञ की पूर्णाहुति के लिये 
चुप रहैं दंगो की वैधता के लिये 

दंगे तो नित्यकर्म है
राष्ट्रीय धर्म / विचारित कर्म है
एजेंडा है / पीटनें का डंडा है
दंगे पहचान है / दंगों में जान है
दंगे स्पंदन हैं / नवनीत मंथन हैं
विचार धारा है / भाईचारा है
अभिव्यक्ति है / बचपन से पिलाई  घुट्टी है
एक मानस है / सोच है / जोश है / ख़ौफ़ है
दंगे उद्यम है / उद्योग है
उन्माद है / प्रमाद है
साध्य है / साधन है
विध्वंस हैं / विस्थापन हैं
रोजगार है / पुनर्निर्माण है
धर्म की खोट हैं / भावनाओं का विस्फोट हैं 
श्रीकृष्ण लिब्रहान आयोग हैं
दंगे जज वकील दलील हैं 
दंगे ज्ञान विज्ञान है / ललित कला है
क्रिया की प्रतिकिया न्युटन का लॉ है

दंगे धमनियों में बहता रक्त है
अवरोध न लगाएँ 
चुपचाप चुप लगाएँ 
भीगी बिल्ली बन घर बैठें / दूम दबाएँ 
घर में केरम खेलें
दिमाग को साम्प्रदायिक ताला लगाएँ 
रोके नहीं सुचारू चलनें दें दंगे

चुप रहैं दंगे जारी हैं

// जसबीर चावला //

पेटलावद

पेटलावद 

पेटलावद तो पेटलावद है
अक्षरधाम नहीं
आसाराम नहीं
मुंबई की इन्द्राणी,राधेमाँ नहीं
हार्दिक पटेल,ललित मोदी नही
ऊंघती सरकार की लापरवाही नहीं
प्रभु की लीला है
झाबुआ ज़िले का रोता गाँव
फालतू फ़ुटेज का हकदार नहीं
बहुत खा चुका अखबारी स्पेस 
जले माँस के लोथड़े,गँधाती ख़बरें 
अब ज़ायक़ेदार नहीं
पेटलावद गहरी चुप्पी है
गूगल के पेट पड़ी अर्थहीन सरकारी जांच 
दाग धोने काम आयेगी किसी वक्त
आदिवासी है पेटलावद 
शहरी राजघाट नहीं
डिज़ीटली स्मार्ट नहीं
पेटलावद बस पेटलावद है

// जसबीर चावला // 

Thursday, September 24, 2015

पूर्ण संतुष्ट सुअर

पूर्ण संतुष्ट सुअर

वे अखबार नहीं पढते 
समाचार नहीं सुनते
किताब नहीं पढते
बहस नहीं करते
बेचेन नहीं होते
कहीं अपना मत नहीं देते
मुक्का नहीं तानते
प्रतिरोध नहीं करते
माला जपते हैं
कभी असंतुष्ट सुकरात हुए नहीं
पूर्ण संतुष्ट सुअर हैं
उनकी असहमती की औक़ात नही 














Sunday, September 20, 2015

विचार की कीमत आप ही चुकायेंगे

विचार की कीमत आप ही चुकायेंगे 

मैं सहमत हूँ आपसे
पर कोई साथ नहीं चलेगा
विचार की कीमत तो आप ही चुकायेंगे
गोलबंद हैं वे फिर मार देंगे
कोई साथ नहीं मरेगा
काग़ज़ी फूलों के साथ हम मोमबत्ती जलायेंगे
श्रद्धांजलि का सनातन क्रियाकर्म
'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:'
विचार नहीं शरीर मरता है
पिछली बार भी हमने यही कहा था
पुन:भीड़ में खो जायेंगे
लौटेंगे अगली हत्या पर
आते रहेंगे तब तक
विचार के पूरी तरह मर जानें तक
खुद मार नहीं दिये जानें तक 





Wednesday, September 9, 2015

विधवा माँओं की चिंता

विधवा माँओं की चिंता
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विधवाओं की चिंता
धर्म का ध्यान
वृंदावन छोड़ आते हैं

भजनीक बनें माएँ 
पाप धुलें सबके 
वैराग्य करें 
काशी छोड़ आते हैं 

स्वर्गारोहण की नसेनी 
भिक्षा माँगे 
कुंभ मेले में छोड़ जाते हैं


Tuesday, September 8, 2015

मैं इत्तफ़ाक़ नहीं रखता

इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता
———————

इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता
तुम्हारे झँडे से 
तुम्हारे डँडे से
तुम्हारी मज़हबी दास्तानों से 
बाँधे जा रहे तावीज़ गंडे से
इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता 
संविधान का दम घोंटती तुम्हारी उँगलियों से
कुतरी जा रही आजादी से 
'सिरफिरों' के हो रहे मुसल्सल क़त्लों से 
अगला नाम लिखने वाले पंडे से

इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ
तुम्हारे चेहरे की नक़ाब सरकने से   
क़लई के खुल जानें से
सलामत रहेगा कौन कब तक 
फिर भी नाइत्तेफाकी है तुम्हारे एजेंडे से

( दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश को समर्पित )






Sunday, September 6, 2015

वैश्विकरण के रोबोट

वैश्विकरण के रोबोट
------------------------
एक रोबोट कार बनायेगा
दूसरा चलायेगा
बैठेगा कौन ?
एक रोबोट फुटबाल बनायेगा
दूसरा किक लगायेगा
खेलेगा कौन ?
एक रोबोट अनाज उगायेगा
दूसरा वेयर हाउस बनायेगा
खरीदेगा कौन ?
एक रोबोट बंदूक़ बनायेगा
दूसरा ट्रिगर दबायेगा
मरेगा कौन ?

सभी प्रश्नों का उत्तर देगी
वंचित लोगों की फ़ौज 
और कौन ?




Friday, September 4, 2015

The last Emperor of Dynasty

The last Emperor of Dynasty 
---------------------------------

When,
The last fruit plucked 
The last tree felled,
The air turns hazardous 
The streams become poisonous,
The last drop of water drilled 
and squeezed, 
The last fish caught
The last bird consumed 
The last animal slaughtered,

When the last Monarch of Rocky Mountain has flown 
And the Queen bee dead

Then the entire world will be yours
You would be the lone Emperor 

🌟 Jasbir Chawla 🌟

मैं सहमत नहीं हूँ

मैं सहमत नहीं हूँ
——————

हाँ मैं सहमत नहीं हूँ
तुम्हारे झंडे से
तुम्हारे डंडे से
तुम्हारी पौराणिक पुड़ियाओं से 
बाँधे जा रहे तावीज़ गंडे से

हाँ मैं सहमत नहीं हूँ 
संविधान का गला घोंटती तुम्हारी उंगलियों से
कुतरी जा रही आजादी से 
'सिरफिरों' की हत्याओं से 
बही में अगला नाम लिखने वाले पंडे से

हाँ मैं सहमत हूँ 
चेहरे का मुखोटा सरकने से 
तुम्हारी क़लई खुल जाने से 
जानता नहीं कि सलामत रहूँगा कब तक 
फिर भी असहमत हूँ तुम्हारे एजेंडे से 











कभी वॉच डॉग थे ये कुत्ते

कभी वॉच डॉग थे ये कुत्ते
————————-

सतत भौंकने वाले कुत्ते
भौंकने की स्पर्धा करते कुत्ते
तेज भौंकने वाले 
रह रह कर भौंकने वाले कुत्ते
निरंतर दुम हिलाते 
तलवे चाटने वाले कुत्ते 
कारपोरेट संस्कृति में ढले 
चोरों के संग डिनर खाते कुत्ते 
वारदात पर चुप लगाते 
चुप की जगह भौंकने वाले कुत्ते
आम जन पर झपटते कुत्ते
गाफ़िल कुत्ते खूंखार कुत्ते

कभी वॉच डॉग थे ये कुत्ते
पूडल बने मेरी गली के कुत्ते 

Friday, August 28, 2015

ऊंची दुकान

ऊंची दुकान
----------
सबसे ऊंची दुकान 
बे  स्वाद  पकवान 
शेखियां   बघारना 
गपोडी  का मकान 
नोटंकी  की आदत 
लच्छेदार    ज़ुबान 
कब  तक   सहेगा 
ये  मेरा  हिंदुस्तान 

प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां

प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां 
----------------------

रोज नया नाग डँसता है
डराता फ़न काढ़े 
जकड़ लेता कुंडली खोलकर 
अकड़ती मांसपेशियाँ 
उखड़ती सांसे
कुंद कर देता हाथ क़लम और दिमाग को

फिर भी जीजिविषा है
प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां 
कोई बल है
द्वंद है
अंतरात्मा है
जो जिंदा रखती है बुझती आग को

( जीजिविषा=जीने की प्रबल आकांक्षा )

// जसबीर चावला //

Saturday, August 22, 2015

आज उधर से बारात की आमद है

आज उधर से बारात की आमद है 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

जो  तेरी  हद  है  वही मेरी  हद है 
फिर क्यों दोनों के बीच सरहद है 

कँटीले तार लगे हैं मुल्कों के दरमियाँ 
क्या परिंदों  पे कोई  पाबंदी आइद है

फ़ख्र से कहेंगे हम एक बारात उधर गई
आज उधर से भी बारात  की आमद  है 

उस गैर मुल्की शख्स की बाज़ू टटोली
उस पर  भी  बंधा  मेरे जैसा तावीज़ है

वो सीने से लिपटा और आँसू भर के बोला
यार तेरी जबान में भी वही लाहौरी शहद है


      

Friday, August 21, 2015

आ गये

आ गये
'''''''''''''
भक्तों को बस रटाया था
आ गये
वे जोर से बोलते
'अच्छे दिन'
सब बोलते-'आ गये आ गये
कब जुमला बदला 
कब रण नीति बदली
भगत अनजान थे
वे जोर लगाकर बोले
'बुरे दिन' 
भगत चेतन्य हुए
हाथ उठाये
जोर से बोले
'आ गये आ गये '

* जसबीर चावला *

न्युरेम्बर्ग में हिटलर

न्युरम्बर्ग में हिटलर
———————
अगर ज़िंदा पकड़ा जाता हिटलर
पेश होता न्युरेम्बर्ग ट्रायल में
क्या सिर झुकाए आरोप सुन लेता
मांगता माफी गुनाहों की
मुँह में तृण रख लेता
नफरत नहीं है अब यहूदियों से
बदल गये हैं उसके विचार

या तनकर बैठता/मुक्के पीटता
चीखता चिल्लाता
अवैध है न्युरेम्बर्ग जाँच ट्रायल
तुम सब दफा हो
क्यों मानूं तुम्हारी संप्रभुता
यहूदी ग़लीज़ हैं
सही हैं गेस्टापो
गैस चेंबर
मेरा प्यारा गोयेबल्स
ठीक है यहूदियों का निर्वासन
यातना चेंबर,
मेरी नस्लीय श्रेष्ठता

निभाया है मैंने राजधर्म
नहीं बदलेगा अपने विचार,
अपनी आस्था
कोई घोषणा क्यों करे
‘हिटलर बदल गया है राजनीति और वक्त के दबाव से’
वह जीयेगा इन्हीं संग
मरेगा इन्हीं संग !!

☘ जसबीर चावला

गूगल बाबा

गूगल बाबा
''''''''''''''
गुमती है गुम जाये सिट्टी पिट्टी
गूगल है
गांधारी नहीं 
क्यों बाँधे पट्टी

// जसबीर चावला //

Thursday, August 20, 2015

मुझे जीने दो

मुझे जीने दो
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मैं दंगों में मरा हूँ कई बार
मारा जा रहा हूँ रोज 
किस शहर प्रांत की बात करूँ
आँख के पटल पर सब हैं
                                                     
भिवंडी मे अकेला नहीं मरा
परिवार,घर,पेट,हुनर के साथ मरा 
लक्ष्मणपुरबाथे,कंधमाल,झज्जर में
मुरादाबाद,भागलपुर में मरा
दिल्ली,मुंबई,गुजरात में
मुज्जफरनगर में फिर मरा
उसके बाद गिनते जाओ
एक..दो..सौ..दो सौ....
ये बस नाम भर हैं दोहराने के
मौसम में बड़े तूफ़ान का कोई नाम होता है
दंगो का भी नाम होता है
चौरासी / बानवें / दो हज़ार दो...
९/११ के समान ये भी हैं पहचान के साल
सैंतालिस के बाद मैं इक गुमनाम आँकड़ा भर हूँ
गृह मंत्रालय की किसी बिसरी फ़ाइल का


मारा जाता हूँ रोज हिंदू,मुसलमान के नाम
कभी सिख,ईसाई,दलित के नाम
गाय के नाम
श्रीराम के नाम 
पहचान बिना पहचान के साथ
कुरेदे जाते हैं ज़ख़्म मेरे
मेरी आत्मा निरंतर कुचली जाती
रंगनाथ,श्रीकृष्ण,लिब्राहन आयोगों में
एसटीएफ़ की जाँचों में 
शपथ पत्रों में,अदालतों में
एड़ियाँ रगड़ता न्याय
बेताल सा उड़ लटक जाता है सरकारी पेड़ों पर
मैं फिर से मार दिया जाता हूं
दफ़्न कर दिया जाता हूँ न खुलने वाली अलमारी में


शांतिमार्च के मुखौटे
रैलियाँ,सम्मेलन,टीवी की बहसें 
नश्तर चुभोते,नमक मलते हैं
तेज़ाबी बारिश में बार बार नहला दिया जाता हूँ
शरीर,आत्मा बँट जाती मेरी 
क़लम की नोक भी टूट गई
कौन अब आँखें पोंछे
मरते हुए का बयान दर्ज कर लो 
मैं जीना चाहता हूँ

मैं भी जीना चाहता था

समझ

समझ
''''''''''''
बहुत चले
घर बाहर
सदा दूर
साथ साथ

अब चलें
समानान्तर
पास पास
साथ साथ


        

Wednesday, August 19, 2015

चल हट

चल हट
''''''''''
काम ही पूजा है
पूजा तो कोई काम नहीं

धर्म की दुकान बढा
तेरा यहाँ काम नहीं

अर्थ ऑवर

अर्थ ऑवर
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तुमने एक घंटा लट्टू कम जलाये 
बिजली बचाई
मैं ढिबरी ही जलाता हूँ
आज घर में चूल्हा भी नहीं जला
नुक्सान नहीं करता ओज़ोन परत का
कितनी बचाता हूँ ऊर्जा 

बा बा ब्लेक शीप उर्फ़ बाबा कथा

बा बा ब्लेक शीप उर्फ़ बाबा कथा
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बाबा ने बाबा से कहा
बाबा अचकचाये
बाबा बुदबुदाये
बाबा फुसफुसाये
बाबा लजाये
बाबा हैरान
बाबा परेशान
बाबा के रंगे हाथ
बाबा की एक आँख 
बाबा की गिरी साख
बाबा की दिखी काँख 
बाबा ने झिड़का
बाबा का मुंह लटका
बाबा बोले यह 'अंदर की बात है' 
चल अंदर 
'धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले'

नफरत का मौसम

नफरत का मौसम
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नफरत बोयें 
नफरत सींचे
नफरत काटें
नफरत बाटें

अफवाह फैलाएँ
फिर गणेश को दूध पिलाएँ 
       

इतिहास के भूत

इतिहास के भूत
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रोज ब्रांडेड कपड़े
देशी विदेशी लांड्री 
ड्रायक्लीन करवाते हैं

अब क्या कहें
'दाग' अच्छे हैं
हर बार उभर आते हैं