Thursday, August 20, 2015

मुझे जीने दो

मुझे जीने दो
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मैं दंगों में मरा हूँ कई बार
मारा जा रहा हूँ रोज 
किस शहर प्रांत की बात करूँ
आँख के पटल पर सब हैं
                                                     
भिवंडी मे अकेला नहीं मरा
परिवार,घर,पेट,हुनर के साथ मरा 
लक्ष्मणपुरबाथे,कंधमाल,झज्जर में
मुरादाबाद,भागलपुर में मरा
दिल्ली,मुंबई,गुजरात में
मुज्जफरनगर में फिर मरा
उसके बाद गिनते जाओ
एक..दो..सौ..दो सौ....
ये बस नाम भर हैं दोहराने के
मौसम में बड़े तूफ़ान का कोई नाम होता है
दंगो का भी नाम होता है
चौरासी / बानवें / दो हज़ार दो...
९/११ के समान ये भी हैं पहचान के साल
सैंतालिस के बाद मैं इक गुमनाम आँकड़ा भर हूँ
गृह मंत्रालय की किसी बिसरी फ़ाइल का


मारा जाता हूँ रोज हिंदू,मुसलमान के नाम
कभी सिख,ईसाई,दलित के नाम
गाय के नाम
श्रीराम के नाम 
पहचान बिना पहचान के साथ
कुरेदे जाते हैं ज़ख़्म मेरे
मेरी आत्मा निरंतर कुचली जाती
रंगनाथ,श्रीकृष्ण,लिब्राहन आयोगों में
एसटीएफ़ की जाँचों में 
शपथ पत्रों में,अदालतों में
एड़ियाँ रगड़ता न्याय
बेताल सा उड़ लटक जाता है सरकारी पेड़ों पर
मैं फिर से मार दिया जाता हूं
दफ़्न कर दिया जाता हूँ न खुलने वाली अलमारी में


शांतिमार्च के मुखौटे
रैलियाँ,सम्मेलन,टीवी की बहसें 
नश्तर चुभोते,नमक मलते हैं
तेज़ाबी बारिश में बार बार नहला दिया जाता हूँ
शरीर,आत्मा बँट जाती मेरी 
क़लम की नोक भी टूट गई
कौन अब आँखें पोंछे
मरते हुए का बयान दर्ज कर लो 
मैं जीना चाहता हूँ

मैं भी जीना चाहता था

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