विवेकानंद रॉक
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विवेकानंद की मौन आँखें
लगता है कुछ कहना चाहती है
याद आई वह लंबी मुलाक़ात
एक सौ बीस साल पहले
युवा सन्यासी नरेन्द्र / खेतड़ी नरेश अजीत
दो मित्र / गुरू चेला
मित्र ने राजस्थानी पग्गड़ सिर पर बाँधा
भरपूर मदद की
नाम धरा विवेकानंद
तीस वर्षीय विवेकानंद ने निराश नहीं किया
शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन
गाड़ दिये झंडे
विरोध किया धार्मिक असहिष्णुता का
कहा विश्व सौहार्द हैं जीवन मूल्य
सर्वधर्म समभाव की बात की
पूर्वाग्रह / घृणा से सबको विरत किया
वह जीवन दर्शन
वह सम भावी दृष्टि
वह विश्व धरोहर शिकागो भाषण
अब उसका अपहरण हुआ
राजनीति के क्रूर हाथों छला गया
प्रेरित नहीं करता
अपलक चुपचाप खड़ी मूर्ति निराशा से देख रही
लौटा सको तो लौटा लो
मुक्त करा लो उसके विचार आत्मा
अपना युवा नरेन्द्र
अपना विवेकानंद
🌿 जसबीर चावला
(18/8/2015, कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक पर हुई अनुभूति)
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