Monday, August 17, 2015

वे सब कहां गई

वे सब कहां गई 

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खो गई निराला की कालजयी 'रचना'
'वह तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर'
अब कम मिलते हैं पत्थर
ज्यादा तोड़ता है ‘क्रशर’
अब्बास की नायिका बबूल की दातुन नहीं बेचती 
पूछता है बच्चा दातुन किसे कहते हैं 
हम कहते हम पेस्ट करते हैं
रेणू कृश्न चंदर की नायिकाएँ 
नहीं बनाती बेचती चटाई झाड़ू डलियाएँ
प्लास्टिक ने सब बुहार दिया
हम भी नहीं खरीदते
वन से बांस नहीं मिलते


कभी कदा दिख जाती है
गारोड़िया बंजारन लुहारन 
सड़क किनारे चूल्हा फूँकती
लोहा कूटती धोंकनी धौंकती
बिना पते की 'घरगाड़ी' में 
बिता रही सतत निर्वासन
किसी महाराणा प्रताप की आन में
नहीं जानती उसके औजार अब टाटा बनाता है
किसानों को यही भाता है
कहां 
किस हाल है पत्तल दोने वाली
धुनकी से तुन्न तुन्न कर रूई पींजने वाली
अपनी खाला रशीदा बी पिंजारन
कहाँ गई सब 
लगाकर ताले
कहाँ बिला गये घरवाले
चलत मुसाफिर का मन मोहने वाली पिंजरे की मुनिया
गोदान की धनिया

लील गया सबको
विकास का बनिया

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