Friday, August 28, 2015

प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां

प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां 
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रोज नया नाग डँसता है
डराता फ़न काढ़े 
जकड़ लेता कुंडली खोलकर 
अकड़ती मांसपेशियाँ 
उखड़ती सांसे
कुंद कर देता हाथ क़लम और दिमाग को

फिर भी जीजिविषा है
प्रतिरोध में उठती मुट्ठियां 
कोई बल है
द्वंद है
अंतरात्मा है
जो जिंदा रखती है बुझती आग को

( जीजिविषा=जीने की प्रबल आकांक्षा )

// जसबीर चावला //

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