Tuesday, August 18, 2015

संगीनों के साये में स्कूल

संगीनों के साये में स्कूल

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डरी फ़िक्रमंद माँओं ने
बलैयाँ ली नजर उतारी
दुआएँ माँगी अल्लाह ताला से
जिगर के टुकड़ों को चूम कर रुखसत किया
फ़ौजी संगीनों का साया
स्कूल बैरक हो गई
जेल सी ऊँची स्कूल की दीवारें थी
अमन की फ़ाख्ता नदारद थी
फूलों में बसी बारूदी गंध
जेहन में गोलियों की तड़ तड़
तितलियों के कटे पँख
लो बच्चे फिर स्कूल आ गये


बच्चों ने गाया क़ौमी तराना
पाक ज़मीं शाद बाद
किश्वर ए हसीन शाद बाद *
बच्चों ने सोचा क्या अब भी ख़ूबसूरत है हमारी जमीं 
सिजदे के क़ाबिल है लहूलुहान ज़मीं
कहां ले जायेगा हमें क़ौमी परचम
बचाए कौन खुदा का 'निशान ए परचम'


क्लास में नहीं थे ढेरों दोस्त
सलमा नहीं सलमान नहीं था
आयशा नहीं अरमान नहीं था
यहाँ रहमान वहां तब्बसुम बैठती थी
अहमद ने इस जगह दम तोड़ा नजमा वहाँ गिरी थी
ज़िंदा जलायी प्रिंसिपाल ताहिरा नहीं थी
बच्चों की ख़ातिर यहाँ नौ टीचर क़ुर्बान हुई थी 
रोई आँखों ने सिजदे किये
हाथों ने दुआएँ माँगी
खून के धब्बे साफ थे दीवारों से
भर दिये गये थे गोलियों के निशाँ
दिलों के ज़ख़्म भरे थे कहां


बच्चे जिनकी आँखों में दहशत थी
दिल मे नफरत थी
बच्चे जो सोये नहीं कई रातों से
बाबस्ता थे डरावने ख़्वाबों से
इंतकाम की आग लिये सुलग रहे बच्चे
बच्चे चुप थे गुम सुम थे
बच्चे स्कूल में थे फिर भी गुमशुदा थे
ग़मज़दा थे ख़ौफ़ज़दा थे

केमरे पर बोलते थे बच्चे
कलाश्निकोव बंदूक़ मांगते थे बच्चे
बच्चे तो बच्चे ठहरे
तालीबानी फ़ितरत क्या जानें
थमा देंगे हाथों में बंदूक
बाँध देंगे कमर में बम
बच्चे उड़ जाएंगे बेगुनाहों के संग
शहीद का दर्जा देंगे
दहशतगर्द बना देंगे
बोको हराम से लश्करे तैयबा
आईएस से जैशे मुहम्मद
यही किया हैं यही करेंगे



बच्चों बच्चे ही रहो
तालीम लो दानिशमंद बनो
इक अमनपसंद नई दुनियाँ की तामीर करो


( पाक ज़मीं शाद बाद * पाकिस्तान का क़ौमी तराना है और यहाँ उसमें देश के लिये की गई सद्भावना से लिये गये शब्द और भाव हैं )









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