Tuesday, August 18, 2015

यही न्याय है

यही न्याय है
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इन्द्र का पाप
ऋषि का श्राप
अहिल्या हुई पत्थर 

पत्थर की आँखें
पत्थर का मन
खड़ी रही एकटक

राम की प्रतीक्षा 
चौदह बरसों तक 

कैसे होता है क्षण में पत्थर हो जाना
धडकते दिल का रुक जाना
संवेदनाओं का मर जाना
किसी राम की प्रतीक्षा करना
किसी और के पाप के लिए
किसी के श्राप के लिये
चुप रहना बुत बने रहना

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