Monday, August 17, 2015

लाल क़ालीन और मेरे पड़दादा


लाल कालीन और मेरे पड़दादा 
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मैं शर्मिंदा हूँ अपनें दादा के पड़दादा पर
नहीं खोजा उनका नाम
उनके निजी कारनामे 
दिलचस्पी नहीं किसी पंडे की बही में 
सत्रह सौ सत्तावन प्लासी युद्ध के दिन

एक बड़ा सवाल
तब कहाँ थे मेरे दादा ?

क्या मीर जाफ़र ही भीतरघाती था ?
कई जगतसेठ भी क़तार में थे 
रायदुर्लभ ओम हैं चंद नाम 
लाव लश्कर सहित अंग्रेज़ों के संग थे
ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश सँभाला

एक बड़ा सवाल
तब कहाँ थे मेरे दादा ?

कहाँ है दर्ज विरोध की आवाज़ें 
इतिहास के पन्ने कोरे अधूरे हैं
‘राष्ट्रवादी' पड़दादे फूंक मारते 
मुट्ठी भर अँग्रेज़ तिनके सा उड़ जाते
आज शर्म है उनकी स्वार्थी चुप्पी पर

एक बड़ा सवाल
तब कहाँ थे मेरे दादा ?

आज मैं भी चुप्पा दादा हूँ
देश हुआ प्राइवेट 'पार्टी फंड कंपनी' 
चंद पूँजीपतियों का कब्जा हुआ 
बिछते हैं दिल्ली में रोज लाल कालीन 
शायद कभी शर्म से गुस्साए मेरे पड़पोते पूछें

एक बड़ा सवाल 
तब कहाँ थे मेरे दादा ?

🦉 जसबीर चावला
 

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