उठी हुई उँगलियाँ
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सतत उठी हुई ऊँगलियाँ
फिर मुड़ आती है मेरी ओर
घूरने लगती निगाहें
माँगने लगती उत्तर
अभिशप्त हूँ
ज़ख़्म गहराते हैं
दनादन बोली की गोलीयां चलती
मार दी जाती मेरी आत्मा भी
पेशावर / पेरिस / बैंकाक के साथ
//जसबीर चावला//
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