अपाहिज हो गया हाकिम
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कहते है कि बहरा हो गया है हाकिम
तभी तो सबकी फ़रियाद नहीं सुनता
कर ली आयद पाबंदी उसने खुद पर
कहीं पर भी हो जुर्म वो नहीं बोलता
कुछ लोग चाहें जितनी एड़ियाँ रगड़ें
महंगा है इँसाफ़ सबको नहीं मिलता
जँहागीर के दरबार का घंटा भारी है
हर एक के हिलानें से नहीं हिलता
ज़लज़ला आये या डूबें कश्तियाँ
जुंबिश नहीं होती कदम नहीं उठता
सब लिखा है मुल्क के आईन में
सुना है बस हाकिम को नहीं दिखता
\☘/ जसबीर चावला
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