शूट आउट एट पेशावर : शकील का ख़त अम्मी के नाम
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अम्मी लो मैंने ज़िद छोड़ दी
अम्मी लो मैंने ज़िद छोड़ दी
नये बैग की
लंच बाक्स की
नई पानी की बोतल की
न चाहिये शार्पनर न इरेज़र
सब कुछ तो 'इरेज़' कर दिया 'तालिबान' ने
हाँ जरूर चाहिये ढेरों 'ब्लाटिंग पेपर'
ख़ून के धब्बे पड़े हैं 'इल्म की किताबों' पर
कुछ किताबों को रखवा देना मस्जिद में
पाक 'क़ुरान' के पास
मौलवी साहब को खास ताक़ीद करना
मदरसों में 'इन्हे' भी पढ़ाये
इंसानियत का पाठ पढ़ायें
शायद कोई सचमुच तालिबे इल्म बन जाये
'मलाला' आपा से कहना
'तालीम' की राह में अब वो अकेली नहीं रही
हमने भी गोलियाँ खाई हैं
बराबर के हकदार हैं उसके 'नोबल' में
और वो जो नये कपड़े कल ही सिल कर आये हैं
अब मुझे पहनाना
ठंडे पानी से अब जरा भी डर नहीं लगता
जितना जी चाहे नहलाना
* 'तालिबानी' मतलब विद्यार्थी
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