Saturday, November 28, 2015

अक्षर ज्ञान

अक्षर ज्ञान
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कुछ सोचो
कुछ पढो

न सोचने
न पढने से
आदमी शिक्षामंत्री बन जाता है 

जितेन्द्रिय

जितेन्द्रिय

इनकी आँखे देखती नहीं
ज़बान खुलती नहीं
चीख़ हो या रोना
कान सुनते नहीं
सांप्रदायिक गंध
नाक सूँघती नहीं
मोटी त्वचा पर स्पर्श नहीं होता 
लक्षण मरीज़ के हैं
गंभीर बीमार है
यह सरकार है 



लकड़बग्घे

लकड़बग्घे
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लकड़बग्घे तय करते हैं
किसकी उछालना टोपी
किसकी चबाना 
किसको पहनाना 
किसकी बदलना 
हँसते लकड़बग्घे
एकजुट होकर चल पड़ते
नये सिर तलाशते लकड़बग्घे 

🌿 जसबीर चावला

अतीत का खंडहर है धर्म

अतीत का खंडहर है धर्म
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धर्म क्या है
हथियार है धर्म
एक ढाल ओढ़ी हुई खाल है
उन्माद धमकी दबाव फ़साद है
धारदार कैंची छद्म मुखोटा है
झूठा दिलासा लालीपॉप है धर्म

न खत्म होनें वाली चुईंग गम है
मृग तृष्णा खुलती क़लई
अतीत के खंडहर हैं
जिल्दों में बँधे मुद्रित पन्ने
कुछ सजे सँवरे पत्थर
स्वर्ण जड़ित दीवारें
गड्ड मड्ड आवाज़ें है धर्म
अपनी अपनी ढपली है धर्म
हँकने को तैयार रेवड़
भीड का भगदड़ है


धर्म का क्या कोई धर्म है ?

Saturday, November 14, 2015

मांग और पूर्ति

मांग और पूर्ति 
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सुलभ हैं
चुनाव में 
दल को 
*
जैसे
सुलभ शोचालय 
सब को 

Monday, November 9, 2015

क्या है जंगलराज

जंगलराज
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जंगल की अपनी है आचारसंहिता
अपनी मर्यादा
सबकी आहार श्रृंखला 

शेर चीते शिकार करेंगे 
हिरणों को घास पत्ते मिलेंगे
पक्षियों को फल बीज
रीछ को शहद तितली को फूल
बाघ शिकारी होगा
हाथी शाकाहारी होगा
अलिखित कानून से तय है सबकी भूख
भूख से ज्यादा कोई नहीं खायेगा
सबको न्यायिक हिस्सा मिलेगा
बेवजह हिंसा नहीं होगी
यह जंगल का क़ानून है 
जंगल को बदनाम न करें
शहर में जंगलराज लाने का उपक्रम करें






Thursday, November 5, 2015

बिच्छू

बिच्छू 
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बिच्छूओं की बारात 
कौन सरदार

जिसकी पीठ पर रखो हाथ
वही सरदार

Monday, November 2, 2015

अब शर्म नहीं आती तो नहीं आती

अब शर्म नहीं आती तो नहीं आती
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लुप्त है यह चिड़ीया 
ढूँढने से नहीं मिलती 
इन्द्रप्रस्थ लुटियन का टीला
मोटी खाल ओढ़ चुका
लहूलुहान प्रजातंत्र 
अस्मत लुटे जनाजा उठे 
अब शर्म नहीं आती तो नहीं आती 

चुप

चुप

चुप था
पर गुपचुप था
बार बार कहा 
चुप्पी तोड़ो

अब मैं चुप नहीं हूं
अब भुगतो

बदबू

बदबू
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बस फैलानी है 
बदबू
संडास से
या
बकवास से
सब के रुबरू 

// जसबीर चावला //