Wednesday, December 4, 2013

खैंच रे राम्या खैंच

खैंच रे राम्या खैंच
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कस्बा खरगोन का तलाब चौक
खुरदरी पथरीली नंगी जमीन 
देख रहे तमाशबीन
जमीन पर अधलेटी महिला
निम्न वर्गीय एक युवक निर्ममता से खींचते पीट रहा
बाल पकड़ घसीट रहा
चीख रही महिला प्रतिरोध में
मर जाऊंगी
नहीं जाऊंगी नहीं रहूंगी तेरे घर में
हाथ से आंचल ढांकती साड़ी संभालती
लोलुप निगाहों से बचने की असफल कोशिश करती
बेबस कातर निगाहों से ताकती
मदद की अपेक्षा करती
अधेड़ वय का एक व्यक्ति बार बार चिल्ला रहा
मैं ससुर हूं लड़की का
खैंच रे राम्या खैंच राम्या खैंच
राम्या उसे घसीट उसे खींच
*
किसी एक ने की हिम्मत
उसे रोका टोका
मत मार छोड़ दे महिला को
तल्खी से बोला अधेड़
आप मत बोलो बाबूजी बीच में
यह उसकी बीबी है 
घर छोड़ आई
घर नहीं जा रही
मरद है यह उसका 
हक है उसका
चाहे पीटे मारे काटे
मरद लुगाई का मामला है
आपका कोई हक नहीं जो बोलो
खैंच रे राम्या खैंच
खैंच रे राम्या खैंच
*
बीते छै दशक जब मैं चश्मदीद था
क्या हम बदले 
आज भी चश्मदीद हैं
चुप हैं तमाशबीन है
आज भी ताक रही कातर सूनी निगाहें
आ रही आवाजें दाएँ बाएँ से
खैंच रे राम्या खैंच
खैंच...............!

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