Tuesday, December 3, 2013

संध्या की बेला

संध्या की बेला

ता उम्र बोल कर रहे अबोले
संध्या की बेला
आ गले लग कुछ बोलें
कुछ रो लें
*
बाँटा सुख
पीड़ा की साँझी
तराज़ू ला हिसाब करें
अतीत में झाँके
कुछ तोलें
*
बहुत चले क़दम दर क़दम
पैर उठते नहीं मन भारी है
आँखें मूँदे
कुछ सो लें
*
रुमानियत में जिये
बदल देंगे ज़माना
क्रांतिवीर बन मुट्ठीयां तानी
रहे ख़ाली
कितने भोले
*
गुनाह न हो जाये
डर कर जिये
दिन ढल रहा
अनागत की आहट
आ कुछ पाप करें
कुछ पुण्य धो लें

   **

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