कबीर की लापता चादर
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'दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया'
इतनी ही पूँजी थी
फक्कड़ जुलाहे की
खुद ओढ़ता बिछाता
सबको ओढ़ाता
मन में तहा कर रखी चादर
फटनें न दी जीते जी चादर
अब खो गई है वह
ढूँढ रहे हम कबीर की लापता चादर
हिन्दुओं सिक्खों मुसलमानों में
काशी क़ाबा अयोध्या में
बाबाओं के धोबी घाटों में
गंदे कपड़ों के ढेर मिलते हैं
धर्म की दुकानें,घृणा मिलती है
सद्भाव नहीं मिलता
भाईचारा नहीं मिलता
खोई चादर नहीं मिलती
कबीर नहीं मिलता
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