Wednesday, February 19, 2014

एक लोकतंत्र मरा सा एक संसद मैली सी

 एक लोकतंत्र मरा सा एक संसद मैली सी
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फिर शर्मसार हुआ लोकतंत्र
इसके पहले भी हुआ था
उसके पहले कितनी बार हुआ
अर्थ खो चुकी शर्म
संसद की आँखों में धूल नहीं मिर्चें झोंकी
क्या होता जो नर्व गैस छोड़ी जाती
'शोको अशारा' छ़ोड़ चुका है टोक्यो की ट्रेनों में

संसद का प्रसारण / लाॅबी / द्वार बंद
आहत विचार लोकतंत्र बंद

इसे कहा इतिहास का काला दिन
संसद के स्याह सफ़ेद का हिसाब करें
जो बचा क्या उसी के हक़दार हैं हम

लोकतंत्र की हत्या हुई ख़ून बहा
बार बार मरा लोकतंत्र
कह रहे यह धब्बा है
विधायिका की चादर के काले धब्बे गिनो
चादर नज़र नहीं आती
टूटे माईक रोती कुर्सियाँ
अब कौन कहे
'दास कबीर जतन से ओड़ी ज्यों की त्यों धर दिनीं चदरिया'

( जापान में 'शोको अशारा' नामक व्यक्ति ने 'ओम शनरिक्यो' नामक संप्रदाय का गठन किया जिसनें टोक्यो की ट्रेनों में नर्व गैस छोड़कर अनेक व्यक्तियों की जान ली )

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