समुद्र मंथन तब
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अंततःअसुरों की हार हुई जो तय थी
अमरत्व के झाँसे छले गये
रणनीतिक साझेदार विष्णु कच्छप बने
वासुकि नाग रस्सी बना
मन्दराचल पर्वत मथानी बना
घोर गर्जन में चौदह रत्न निकलना तय था
कामधेनु को ऋषि
ऐरावत को इन्द्र ले गये
विष्णु को वरा लक्ष्मी ने
रंभा अप्सरा देवताओं को रिझाने गई इन्दर सभा
बाक़ी रत्नों का भी ‘देव न्याय’ हुआ
अमृतघट ताकत से असुरों के हाथ लगा
देवता बेचारे हताश हुए
भगवान मोहनी बन सामने आये
असुरों को फुसलाया नैन बाण चलाये
छल से सोमरस पिला मदहोश किया
चालाक राहू अमृत पाँत में बैठा
कंठ से अमृत न उतार पाया
भगवान का 'सुदर्शनचक्र' चला
धड़ से सिर कटवा बैठा
अब राहू केतु बन आकाश के किसी कोने में पड़ा है
प्रभु तेरी लीला अपंरम्पार
तेरी माया तू ही जानें
हम मूरख क्या जानें
🦉 जसबीर चावला
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