Saturday, February 6, 2016

अशोक का प्रायश्चित

अशोक का प्रायश्चित
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(जूनागढ़ गुजरात पर लिखी १३ वीं राजाज्ञा)

क्या कसूर था कलिंग का 
यही कि कलिंग गणतंत्र था
हर धर्म जाति के लोग
लोकतांत्रिक व्यवस्था
यही कसूर था कलिंग का.

अशोक ने युद्ध भूमी देखी
गलियों में नोचते गिद्ध देखे
लाख लोगों की मौत देखी
हर तरफ आगज़नी हाहाकार 
भागती महिलाएँ रोते बच्चे देखे.

उसे याद आई मैदान में बिलखती वह महिला
झकझोर कर पूछती उससे
क्या दोष था उन सबका 
क्यों उसके पिता पति पुत्र भेंट चढ़े
क्यों अजन्मे शिशु मरे
किसके लिये क्यों जिये 
अशोक उसे भी मार दे.

अतीत में खो गया अशोक
जब हथियाई थी सत्ता
सैकड़ों रानियों / मंत्रियों को मारा 
भाईयों को आग में झोंका 
किसी नें कुरूप कहा
उसे मौत के घाट उतारा.

साधु समुंद्र ने जगाई अंतरात्मा 
अब युद्ध नहीं प्रायश्चित होगा
अशोक ने बुद्ध का मार्ग पकड़ा
चालीस साल अहिसा की राह चला.

जूनागढ़ का गिरनार पर्वत
चट्टान पर राजाज्ञाएँ लिखी 
तेहरवीं राजाज्ञा में कबूल किया
गलत थी हत्याएँ / विस्थापन 
अमिट क्षमापत्र उकेर दिया चट्टान पर
बच्चों को लिखा अब युद्ध न हो मैदान पर
रणभेरी घोष नहीं धर्म घोष हो
दिग्विजय नहीं धर्मविजय हो
जीवन के मूल्य हैं सच्चाई दया सद्भावना
स्वनियंत्रण दान नैतिकता.

सदियों बाद भी प्रासंगिक हैं राजाज्ञाएँ
किसी की अंतरात्मा जागे 
हिंसक हवाओं के बीच क्षमा कोई माँगे 

🦉 जसबीर चावला



























अशोक का प्रायश्चित
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क्या कसूर था कलिंग का 
कलिंग गणतंत्र था
हर धर्म जाति के लोग
लोकतांत्रिक व्यवस्था
बस यही कसूर था उसका

अशोक ने युद्ध भूमी देखी
गलियों में नोचते चील गिद्ध देखे
एक लाख की मौत देखी
हर तरफ आगज़नी हाहाकार 
भागती महिलाएँ रोते बच्चे देखे 

मैदान में बिलखती वह महिला
झकझोर कर पूछती उससे
क्या दोष था उन सबका 
यह कैसा नरसंहार कैसी सत्ता 
क्यों उसके पिता पति पुत्र भेंट चढ़े
क्यों अजन्मे शिशु मरे
क्यों वह अब किसके लिये जिये 
अशोक उसे भी मार दे

याद कर हिल उठा अशोक
जब हथियाई थी सत्ता
सैकड़ों रानियों मंत्रियों को मारा 
आग में भाईयों को झोंका 
कुरूप कहने वाले को मौत के घाट उतारा 

अब प्रायश्चित होगा
साधू समुद्र ने भी जगा दी अंतरात्मा 
अब न युद्ध होगा 
अशोक ने बुद्ध का मार्ग पकड़ा
चालीस साल अहिसा की राह चला 
जूनागढ़ का गिरनार पर्वत
चट्टान पर राजाज्ञाएँ लिखी 
तेहरवीं राजाज्ञा में उसने कबूला 
गलत थी हत्याएँ विस्थापन 
अपना माफ़ीनामा उकेर दिया अमिट चट्टान पर
पुत्र प्रपौत्रों को भी लिखा युद्ध न हो मैदान पर
सद्भावना से जीतें
रणभेरी घोष नहीं धर्म घोष हो
दिग्विजय नहीं धर्मविजय हो
जीवन के मूल्य हैं सच्चाई दया 
स्वनियंत्रण दान और नैतिकता

सदियों बाद भी प्रासंगिक हैं राजाज्ञाएँ
लपलपाती हिंसक हवाओं के बीच
माफी माँगते ये हलफ़नामे

(* जूनागढ़ गुजरात में है)




















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