गांधी:आ अब लौट चलें - २
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अप्रासंगिक हुए गांधी
लद गये दिन गांधी बाबा के
विचार बिका
प्राण प्रतिष्ठा के पहले निष्प्राण हुआ
चौराहों पर गांधी बुत बन गये
नाम चला / भुन चुका
गांधी जुगाड़ू नहीं अब वोट कटवा है
वैश्विकरण की अाँधी
शोर में कौन सुनता है गाना
'पाई चवन्नी चाँदी की जय बोलो महात्मा गांधी की'
गांधी पुस्तक भंडार
गांधी का दर्शन नहीं बिकता
बिकता है लुगदी साहित्य
डूब गये गांधी संस्थान अपने ही भार से
महात्मा गांधी मार्ग भूल गये
अब एमजी रोड है
महात्मा गाधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज
एमजीएम है
मान्य हो गई दादागिरी
पैरोडी बनी गांधीगिरी
कुछ सर्वोदयी बेबस बूढ़े
आश्रम घर में अरण्य रोदन करते
गांधी की सुमरनी फेरते
तकली चरखा चलाते
अपने दिन गिनते
पहन बेच रहे खादी
सूत की गुंडी बनाते
गुंडों के गले डलती सूत की माला
बस ढो रहे हैं पालकी
गांधी बाबा के नाम की
गाँधी आ अब लौट चलें
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