Monday, January 18, 2016

और कितनें टोबा टेकसिंह

और कितने टोबा टेकसिंह
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ज़मीन बँट चुकी
मुल्क का सियासी बँटवारा पूरा हुआ
मंटो नें लिखा
उधर खरदार* तारों के पीछे हिंदुस्तान
इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान
दरमियाँ में ज़मीन का टुकड़ा 
जिसका कोई नाम न था
टोबा टेक सिंह पड़ा था
टोबा टेकसिंह याने बिशनू माने बिशनसिंह 
गाँव टोबा टेकसिंह का पागल किसान
पड़ा है आज भी दोनों मुल्कों के दरमियाँ
'नो मेन्स लेंड' में ढूँढ रहा अपनी पहचान

दोनों सरहदों के पार मुल्क और बँटे
मजहबी सियासी बँटवारे हुए
सूबेदारो के अपने इलाके
अपने कानून
ढेरों 'नो मेन्स लेंड'
कई टोबा टेकसिंह ढूँढ रहे अपनी बेटीयां
अपनी रूपकौर अपनी अायशा 
अपनी माई मुख्तार अपनी निर्भया
अपनी ज़मीन अपना आसमान ढूँढ रहे 
अजीबोग़रीब आवाज़ों में बड़बड़ा रहे
'औ पड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी लालटेन'
'हिंदुस्तान पाकिस्तान दुर फिटे मुंह'
'टोबा' तो सचमुच पागल था
ये सियासी मरीज़ बाँहें उठा रहे
गड्डमड्ड आवाज़ों में चीख रहे 
परचम लहराते मुल्क भर में चिल्ला रहे
'अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दी दाल ऑफ फ़िरक़ापरस्ती एंड घर वापसी'

क्या कभी कोई 'पागल' टोबा टेकसिंह आयेगा
इन मुल्कों के दरमियाँ 'लव जिहाद' चलायेगा


*खरदार-काँटेदार ( टोबा टेकसिंह : सआदत हसन मंटो की विशिष्ट कहानी )

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