Monday, August 17, 2015

धर्म और धर्मग्रंथ

धर्म और धर्मग्रंथ 
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विज्ञान बढ गया
धर्म रेंग रहा 
छूट गया कोसों दूर
तकनीक की वैशाखी लिये
सहारा ढूँढ रहा 
चुनौती स्वीकारता नहीं
जूझनें का माद्दा नहीं 

गोटे में सजे धजे धर्म ग्रंथ 
कहीं बडबोले कभी चुप चुप धर्म ग्रंथ
अनंत काल से रुकी हुई किताबें 
ठहरा हुआ धर्म 
विवेक का गला घोंट रहा है
बाहर कितना शोर है
धर्म अब दम तोड रहा है


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