क्यों बदल गई कविता
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क्यों झील सी आँखों में डूबती नहीं
गालों के तिल पर अटकती नहीं
क्यों नहीं अधरों जुल्फों में उलझती
नहीं टाँकती जूड़े मे फूल
सहज प्रेम करना भूली
क्या बदल गई कविता ?
हाँ बदल गई कविता
कविता गुस्सा,गुबार,उलाहना बनी है
पाखँड की परतें उघेड़ रही
ताल ठोंक सरकार के खिलाफ खड़ी
व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करती उठी उँगली है
भिड़ने को तैयार है कविता
सशक्त गालियाँ हैं कविता
जब पेलेटगन अपना स्वभाव बदलेगी
लाठियाँ नहीं बरसेंगी
छर्रे चलेंगे नहीं रंग बरसेंगे
पत्थर नहीं फूल बरसेंगे
कविता फिर प्रेम करेगी
फिर से प्रेम गीत रचेगी
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