हम विषपाई जनम के
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चौथा स्तंभ गिरने के मूक दृष्टा हैं
न्याय की देवी को पट्टी हटाते देखा
संसद निस्तेज हुई
मछली बाजार बनी
सँविधान को मरते देखा
ढहते लोकतंत्र के तमाशबीन बने
अपनी आत्मा को मरते देखा
गुलाम होने के साक्षी बने
☘ जसबीर चावला
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